2004 में इंडिया शाइनिंग भी वाजपेयी सरकार को नहीं दिला सकी थी जीत, क्यों बना यह फ्लॉप शो

पहले गैर-कांग्रेसी नेता के रूप में लगातार 5 साल सरकार चलाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने 2004 में इंडिया शाइनिंग का नारा दिया और इसके प्रचार में करोड़ों रुपए भी फूंक डाले, बावजूद इसके उनकी पार्टी को हार मिली. आखिर क्यों?

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अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो) अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 8:24 AM IST

साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सत्ता में वापसी के लिए इंडिया शाइनिंग का नारा दिया और इसके प्रचार अभियान के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने और दुनियाभर में देश की छवि चमकाने के बावजूद आम चुनाव में हार मिली और वाजपेयी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा.

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अति आत्मविश्वास में आने की वजह से सहयोगी दलों से बदले व्यवहार और लोगों की जमीनी हालत में बदलाव न होने के बावजूद इंडिया शाइनिंग जैसे अभियान चलाना, वाजपेयी सरकार की हार की दो मुख्य वजह माने जाते हैं.

फ्लॉप साबित हुआ इंडिया शाइनिंग अभियान

साल 2004 में आम चुनाव के पहले इंडिया शाइनिंग अभियान के पीछे बीजेपी के तत्कालीन 'चाणक्य' प्रमोद महाजन की सोच मानी जाती है और इसे ग्रे वर्ल्डवाइड ऐडवर्टाइजिंग कंपनी के निर्विक सिंह के नेतृत्व में साकार किया गया था. इंडिया शाइनिंग के जरिए भारत को एक ओर उभरता और चमकदार देश बताया जा रहा था, तो दूसरी ओर जमीनी पर आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे थे.

इस अभियान के पिछले तीन साल में भारत की जीडीपी में बढ़त क्रमश: 4.4 फीसदी (2000-01), 6 फीसदी (2001-02) और 3.8 फीसदी (2002-03) ही थी. बीजेपी ने इंडिया शाइनिंग के प्रचार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए. इस अभियान के द्वारा यह बताने की कोशिश की गई कि बीजेपी सरकार में देश की काफी तरक्की हुई और लोगों के जीवन में भारी बदलाव आया है.

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लेकिन इंडिया शाइनिंग सिर्फ बड़े कारोबारियों और शेयर मार्केट को ही पसंद आया, जनता को नहीं. सच तो यह है कि अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ रही थी. बेरोजगारी चरम पर थी. गरीबों की हालत बेहद खराब थी. संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में भारत और नीचे चला गया था. पेयजल, बुनियादी ढांचे, शिक्षा और बिजली जैसी मूल जरूरतों पर सरकारी खर्च घट रहा था.

बीजेपी विरोधियों ने इस नारे का इस्तेमाल कर वोटरों से कहा कि क्या वे वास्तव में महसूस करते हैं कि भारत शाइन कर रहा है? क्या उनके घर चमक रहे हैं...? भारत में जबर्दस्त गरीबी है...किसानों की अपनी समस्याएं हैं...भारत कहां चमक रहा है?'

सहयोगी दलों से बेरुखी

'इंडिया शाइनिंग' के नारे से आत्ममुग्ध बीजेपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने तीन ऐसे महत्वपूर्ण सहयोगी दलों से नाता तोड़ लिया था, जिन्होंने सन 1999 में उसे सत्ता में पहुंचाया था. उन क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक की ताकत को बीजेपी ने तब नजरअंदाज कर देने की गलती कर दी थी.

इसका नतीजा यह हुआ कि अटल सरकार सन 2004 में सत्ता से बाहर हो गई. तब बीजेपी अपनी जीत के प्रति इतना आश्वस्त थी कि उसने समय से पहले चुनाव करा लिया. बीजेपी के बेरुखी की वजह से साल 2004 के आम चुनाव से पहले डीएमके, इंडियन नेशनल लोकदल और लोजपा जैसे दल एनडीए से बाहर हो गए. इन तीनों दलों के अलग हो जाने के कारण एनडीए को लोकसभा की 55 सीटों का नुकसान हो गया.

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2004 में एनडीए को कुल 185 सीटें मिली थीं. इन दलों का साथ रहता तो उसे 240 सीटें मिल जातीं. बीजेपी की सीटें भी 1999 के 182 के मुकाबले 2004 में घटकर 138 ही रह गईं.

चुनाव के बाद खुद बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि एनडीए अति आत्मविश्वास और 'इंडिया शाइनिंग' जैसे गलत नारों के चलते 2004 का आम चुनाव हारा.  उन्होंने कहा कि अति विश्वास और इंडिया शाइनिंग जैसे गलत नारों का इस्तेमाल करने के कारण हम हार गए.

गुजरात दंगे का भी हुआ नुकसान

साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों का भी तत्कालीन एनडीए सरकार को नुकसान उठाना पड़ा. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा 'द कोअलिशन इयर्स 1996-2012' में लिखा है, 'गुजरात में 2002 में हुए दंगे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर संभवत: सबसे बड़ा धब्बा थे और इसके कारण ही 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा था.'

मुखर्जी ने लिखा, 'वाजपेयी एक उत्कृष्ट सांसद थे. भाषा पर उम्दा पकड़ के साथ वह एक शानदार वक्ता भी थे, जिनमें तत्काल ही लोगों के साथ जुड़ जाने और उन्हें साथ ले आने की कला थी. राजनीति में वाजपेयी को लोगों का भरोसा मिल रहा था और इस प्रक्रिया में वह देश में अपनी पार्टी, सहयोगियों और विरोधियों सभी का सम्मान अर्जित कर रहे थे. वहीं, विदेश में उन्होंने भारत की सौहार्द्रपूर्ण छवि पेश की और अपनी विदेश नीति के जरिए देश को दुनिया से जोड़ा.'

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मुखर्जी के अनुसार , 'एनडीए के इंडिया शाइनिंग अभियान का नजीता बिल्कुल उलटा निकला था और बीजेपी में निराशा की लहर छा गई थी, जिसके कारण वाजपेयी ने दुखी होकर कहा था कि वह कभी भी मतदाता के मन को नहीं समझ सकते.'

2004 के आम चुनाव अक्टूबर में होने थे, लेकिन बीजेपी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में मिली जीत को देखते हुए छह महीने पहले ही चुनाव करा लिए थे. मुखर्जी ने कहा, 'महत्वपूर्ण राज्यों में जीत के कारण बीजेपी में खुशी की लहर थी. हालांकि कुछ लोगों ने इन परिणामों को राष्ट्रीय रुझान समझने की भूल न करने की सलाह भी दी थी.'

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