राज्यपाल कलराज मिश्रा: मृदुभाषी नेता, जिनके CM गहलोत से भी मधुर संबंध रहे

राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र समन्वय और संवाद के मास्टर माने जाते हैं. हर एक कार्यकर्ता को नाम से पहचानना और बुलाना यह कलराज की पहचान रही है. राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ उनके संबंध मधुर रहे हैं और मुख्यमंत्री उनसे मिलने जाते रहे हैं.

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राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्रा (पीटीआई) राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्रा (पीटीआई)

कुमार अभिषेक / शरत कुमार

  • लखनऊ/जयपुर,
  • 27 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 7:06 PM IST

  • शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय में माहिर
  • गोरखपुर से 1963 में की सामाजिक जीवन की शुरुआत
  • बिना काम के भी राजभवन जाते रहे CM अशोक गहलोत

कलराज मिश्रा वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल हैं, लेकिन इस वक्त सियासत की दृष्टि से देशभर के नेताओं और कानूनी जानकारों की पैनी निगाहों के बीचो बीच खड़े हैं. तमाम निगाहें कालराज मिश्रा पर टिकी हैं कि आखिर उनका अगला कदम क्या होगा क्योंकि उनके फैसले से न सिर्फ राजस्थान बल्कि देश की एक बड़ी सियासत भी तय होगी.

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कौन हैं कलराज मिश्र

उत्तर प्रदेश के बड़े सियासतदानों में शुमार कलराज मिश्रा की पहचान एक मृदभाषी राजनेता, एक जानकर प्रशासक की है जो अपने फैसले पर टिके रहने के लिए जाने जाते हैं. उत्तर प्रदेश में बीजेपी को खड़ा करने का श्रेय कलराज मिश्र को भी जाता है.

कलराज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पदाधिकारी के तौर पर काम किया और जब जनसंघ में आए तो सड़कों पर स्कूटर से घूम घूम कर पार्टी खड़ी की, बाद में जनता पार्टी से राज्यसभा सदस्य भी बने.

कलराज मिश्र समन्वय और संवाद के मास्टर माने जाते हैं. कार्यकर्ताओं से संवाद करना लंबी-लंबी बातचीत करना हर एक कार्यकर्ता को नाम से पहचानना और बुलाना यह कलराज मिश्र की पहचान रही है.

पार्टी में संकटमोचक की भूमिका

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शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय का काम कालराज मिश्र बखूबी करते रहे. पार्टी संगठन में जब भी नाराजगी होती कलराज मिश्र को संकटमोचक के तौर पर काम पर लगाया जाता, जिसमें वह हमेशा सफल रहे.

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लेकिन फैसले की घड़ी में कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह और लालजी टंडन की तरह आक्रामक फैसले के लिए नहीं जाने जाते थे. यही वजह है कि उनके बारे में यही धारणा रही कि वह मौके पर चूक जाते हैं.

1999 में जब बीजेपी लगभग विभाजन के कगार पर थी कल्याण सिंह और कल्याण सिंह के खिलाफ पार्टी का दूसरा गुट आमने-सामने था तब राजनाथ सिंह और लालजी टंडन मुखर होकर कल्याण सिंह के खिलाफ पार्टी के साथ आक्रामक तरीके से खड़े थे जबकि कलराज समन्वय और बातचीत की राह पर थे.

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हालांकि पार्टी के साथ वह भी रहे लेकिन इस पूरे विवाद में राजनाथ सिंह और लालजी टंडन नेतृत्व करते दिखाई दिए जबकि कलराज मिश्र पार्टी के साथ.

कल्याण सिंह के साथ राजनीति के रिश्ते भी धूप छांव की तरह रहे. कभी वह कल्याण सिंह के बेहद करीबी माने जाते तो कभी उनसे दूर हो जाते थे. दरअसल पार्टी और व्यक्ति के बीच की दुविधा उनके साथ हमेशा बनी रही.

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यही वजह है कि जिस तरीके से कल्याण सिंह बड़े और बेबाक फैसले के लिए जाने जाते रहे वहीं कलराज मिश्र फैसले के पहले सब को साथ लेने की वकालत करने वाले शख्स के तौर पर.

काम को प्रचारित करने में नाकाम

उनके करीबी मानते हैं कि कलराज मिश्र काम करने में तो धुनी आदमी है, लेकिन अपने काम को प्रचारित करने में वह छुप जाते हैं, यही वजह रही कि मोदी सरकार में मंत्री रहते हुए कलराज मिश्रा अपने किए कामों को नहीं समझा सके.

चूंकि कलराज मिश्र में लंबे समय तक विधान परिषद के सदस्य रहे. राज्यसभा के मेंबर रहे. विधान परिषद और संसद दोनों का बड़ा अनुभव उनके साथ हैं. राज्य और केंद्र में मंत्री का अनुभव उनके पास है. ऐसे में उनके पास बड़ा संवैधानिक अनुभव है और यही अनुभव राजस्थान में इस वक्त के संवैधानिक संकट में काम आ रहा है.

कलराज मिश्र के बारे में मशहूर है कि वह पार्टी के यस मैन हैं यानी नेतृत्व जो तय करेगा, वह उसी लाइन पर चलेंगे, राजस्थान के संवैधानिक संकट में उनके जानने वाले बताते हैं कि कलराज मिश्र मर्यादा का तो पूरा ख्याल रखेंगे, लेकिन संवैधानिक नेतृत्व की लाइन ही उनके फैसले का आधार होगा.

सबसे कम उम्र के राज्यसभा सदस्य

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कलराज मिश्र का जन्म एक जुलाई 1941 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सैदपुर के मलिकपुर गांव में हुआ था. उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत गोरखपुर से 1963 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में की थी.

पहले जनसंघ फिर जनता पार्टी और जब भारतीय जनता पार्टी बनी तो वही इनका घर हो गया. इन्हें सबसे पहले जनता पार्टी की सरकार में मार्च 1978 को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया. उस समय कलराज मिश्र सबसे कम उम्र के राज्यसभा सदस्य थे.

इसके बाद 1986 से वर्ष 2002 तक तीन बार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं. प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने पर वर्ष 1997 से 2000 के बीच कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री पद पर रह चुके हैं.

2002 से 2012 तक दो बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए. इसी बीच वर्ष 2012 में कलराज ने लखनऊ पूर्वी विधानसभा क्षेत्र के विधानसभा का चुनाव लड़ा. चुनाव में जीतकर वह विधानसभा में पहुंच गए. 2014 में देवरिया से सांसद चुने गए.

हिमाचल प्रदेश के भी राज्यपाल रहे

कलराज मिश्र इससे पहले हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रह चुके हैं और मोदी सरकार में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री भी रहे हैं.

राजस्थान में कलराज मिश्रा 19 सितंबर 2019 को राज्यपाल बने थे, जब कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल के पद से हटे थे. राज्यपाल कलराज और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच काफी सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं. बिना कोई काम और बिना कोई वजह भी अशोक गहलोत जाकर राजभवन कलराज मिश्र से मिलते रहे हैं.

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राजस्थान में कुलपतियों की नियुक्ति हो या फिर विश्वविद्यालय के सिंडिकेट की बैठक हो, कलराज मिश्र के आने के बाद कभी भी राजस्थान सरकार और राजभवन के बीच टकराव नहीं रहा जबकि कल्याण सिंह के समय अक्सर टकराव होता था.

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अशोक गहलोत और कलराज मिश्र के बीच सब कुछ ठीक चल रहा था जब मौजूदा राजनीतिक संकट के दौरान मामला विधानसभा बुलाने का नहीं आया. कलराज मिश्र इससे पहले शॉर्ट टर्म नोटिस पर 2 बार विधानसभा का सत्र बुला चुके हैं मगर इस बार कोई न कोई मजबूरी है जो कह रहे हैं कि 21 दिन का नियम जरूरी है. राजनीतिक संकट के बीच 12 दिन में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कलराज से चार बार मुलाकात की है.

राजस्थान से पुराना नाता

कलराज मिश्र का राजस्थान से राज्यपाल बनने से पहले से रिश्ता रहा है. जब वसुंधरा राजे राजस्थान में मुख्यमंत्री थी तो बीजेपी के प्रभारी के रूप में कलराज मिश्र राजस्थान का प्रभार संभाल रहे थे.

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कहा जाता है कि उस वक्त कलराज मिश्र और वसुंधरा राजे में खूब बनती थी. यह बात वसुंधरा के विरोधी बीजेपी के केंद्रीय नेताओं को पसंद नहीं आई और केंद्रीय नेतृत्व से कहकर कलराज मिश्र की राजस्थान के प्रभारी पद से विदाई करवा दी गई थी.

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कलराज मिश्र जब से राजभवन में आए हैं. उत्तर प्रदेश के लोगों का राजस्थान बीजेपी में सक्रियता बढ़ी है. इससे पहले जब वह प्रभारी थे तब भी यूपी में बीजेपी से जुड़े कई लोग राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहते थे.

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