सर्दी से देश की राजधानी भले ठिठुर रही हो लेकिन संसद में चल रहे शीतकालीन सत्र की वजह से रायसीना हिल्स का पारा चढ़ा हुआ है. चर्चा करने के लिए बनी देश की सर्वोच्च विधायी निकाय हंगामे की वजह से खुद चर्चा में है. कई मामले हैं, जिसने संसद के ताप को बढ़ा दिया है. उसमें से एक विपक्षी पार्टियों के द्वारा राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस जारी करना है.
ये भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहला मौका है जब राज्यसभा के अध्यक्ष के खिलाफ महाभियोग लाने का नोटिस दिया गया है. इसका सरकार विरोध कर रही है.
आज आपको बताते हैं कि जब जवाहर लाल नेहरू के पीएम रहते स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था, तब उन्होंने संसद में क्या बात कही थी. हालांकि, तब राज्यसभा के स्पीकर को नहीं बल्कि लोकसभा के स्पीकर को हटाने के लिए तत्कालीन विपक्ष महाभियोग लेकर आया था.
'देश की गरिमा का सवाल'
बिहार के सोशलिस्ट पार्टी के नेता और सांसद विग्नेश्वर मिसिर, लोकसभा के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर के खिलाफ सदन में साल 1954 अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, जिस पर दो घंटे तक चर्चा हुई थी. लेकिन बहस के बाद उसे खारिज कर दिया गया था.
इसपर चर्चा के दौरान, नेहरू ने संसद में कहा था कि पार्टी के किसी भी नेता को व्हिप या किसी तरह का निर्देश नहीं दिया गया है. वो अपनी इच्छानुसार वोट करेंगे. क्योंकि ये किसी पार्टी का नहीं बल्कि सदन की उच्च गरिमा का मामला है. उन्होंने आगे कहा था कि हम इसे एक पार्टी के मुद्दे के रूप में नहीं बल्कि इससे ऊपर उठकर सोचने का प्रयास करें. इस मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने बहस के लिए विपक्ष को अधिक समय देने का भी आग्रह किया था ताकि वे अपनी बात ठीक से रख सकें.
1966 और 1985 में भी आया था अविश्वास प्रस्ताव
लोकसभा के सभापति के खिलाफ 1954 के बाद 1966 और 1985 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. साल 1966 में सांसद मधु लिमये तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे. सोशलिस्ट नेता मधु लिमये के बारे में कहा जाता था कि जब वो हाथों में कागज लेकर सदन में प्रवेश करते थे तो ट्रेज़री बेंच पर बैठने वालों की हवा निकल जाती थी.
हालांकि मधु लिमये द्वारा भी लाया गया अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया था. वहीं 1985 में सांसद और देश के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी तत्कालीन स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे. ये अविश्वास प्रस्ताव भी रद्द हो गया था. फिर दो दशक बाद वहीं सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष बन गए थे.
उप-राष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात तो विपक्षी नेताओं से मॉनसून सत्र के दौरान ही सुनने को मिली थी, जिसको लेकर शीत सत्र के दौरान विपक्ष और गंभीर हो गया है.
व्यंकेटेश पांडेय