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जानें, क्या है कॉर्बन डेटिंग, SC ने अयोध्या केस में क्यों किया जिक्र

मानसी मिश्रा
  • 16 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 1:46 PM IST
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रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मामले में बीते 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई हो रही है. 16 अगस्त को दोपहर के बाद कोर्ट में कार्बन डेटिंग पर बहस छिड़ गई. कोर्ट ने एक पक्ष से मूर्ति की कार्बन डेटिंग पर पूछा है, जिसके जवाब में दूसरे पक्ष ने कहा है कि मूर्ति के अलावा दूसरी चीजों की कार्बन डेटिंग हुई थी. आखिर कोर्ट मूर्ति की कार्बन डेटिंग में इतना इंटरेस्ट क्यों ले रही है. आइए जानें, ऐसे मामलों में कैसे मदद करती है विज्ञान की ये खास खोज.

फाइल फोटो: राम मंदिर अयोध्या

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सुप्रीम कोर्ट में रामलला विराजमान की तरफ से कहा गया  कि मूर्ति को छोड़ दूसरे मेटेरियल का कार्बन डेटिंग हुआ था. इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि उन्होंने मूर्ति की कार्बन डेटिंग के बारे में पूछा है. वहीं मुस्लिम पक्ष ने कहा कि ईटों की कार्बन डेटिंग नहीं हो सकती है. कार्बन डेटिंग तभी हो सकती है जब उसमें कार्बन की मात्रा हो. रामलला के वकील की तरफ से भी कहा गया कि देवता की कार्बन डेटिंग नहीं हुई.

Image Credit: PTI

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अब आपको ये जानकर हैरानी होगी कि विज्ञान आज अपने आधुनिकतम दौर में है. वैज्ञानिक तमाम तरीकों से इंसान की उम्र से लेकर जीव, वनस्पति की अनुमानित आयु पता लगाने में सक्षम हैं. इस तकनीक को कार्बन डेटिंग के अलावा रेडियो कार्बन डेटिंग भी कहा जाता है. कार्बन डेटिंग के जरिये वैज्ञानिक लकड़ी, चारकोल, बीज, बीजाणु और पराग, हड्डी, चमड़े, बाल, फर, सींग और रक्त अवशेष और पत्थर व मिट्टी से भी उसकी बेहद करीबी वास्तविक आयु का पता लगा सकते हैं. ऐसी हर वो चीज जिसके कार्बनिक अवशेष हैं जैसे शैल, कोरल, बर्तन से  लेकर दीवार की चित्रकारी की उम्र भी पता लगा लेते हैं.
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क्या होती है विधि

वैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो कार्बन डेटिंग के जरिये कार्बन-12 और कार्बन-14 के बीच अनुपात निकाला जाता है. कार्बन-14 एक तरह से कार्बन का ही रेडियोधर्मी आइसोटोप है, इसका अर्धआयुकाल 5730 साल का है. कार्बन डेटिंग को रेडियोएक्टिव पदार्थो की आयुसीमा निर्धारण करने में प्रयोग किया जाता है.

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विवादों में भी रही है ये विधि

न्याय प्रणाली में कार्बन काल विधि के माध्यम से तिथि निर्धारण होने पर इतिहास एवं वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलती है. लेकिन,  तमाम वजहों से ये विवादों में रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक रेडियो कॉर्बन का जितनी तेजी से क्षय होता है, उससे करीब 28 प्रतिशत तेज इसका निर्माण होता है. इससे संतुलन की अवस्था प्राप्त होना मुश्किल है. ऐसा भी माना जाता है कि प्राणियों की मृत्यु के बाद भी वे कार्बन का अवशोषण करते हैं और अस्थिर रेडियोएक्टिव तत्व का धीरे-धीरे क्षय होता है.

प्रतीकात्मक फोटो

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60 साल पहले हुआ था अविष्कार

रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक का आविष्कार 1949 में शिकागो विश्वविद्यालय के विलियर्ड लिबी और उनके साथियों ने किया था. 1960 में उन्हें इस कार्य के लिए रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने कार्बन डेटिंग के माध्यम से पहली बार लकड़ी की आयु पता की थी. इसे एब्सोल्यूट डेटिंग भी कहते हैं लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि ये सिर्फ अनुमानित आयु ही बता सकते हैं.

फाइल फोटो:बाबरी मस्जि‍द के बाहर प्रदर्शनकारी

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ये विधि पर्यावरण विज्ञान, पुरातत्व और मानव विज्ञान में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है. इसमें भूगोल में कुछ अनुप्रयोग भी शामिल हैं. कार्बनिक पदार्थों के डेटिंग में इसका महत्व पर्याप्त रूप से कम करके आंका नहीं जा सकता है. सबसे पहले पुरातत्त्वविदों ने पुराने शासनकाल की गणना करने के लिए इन डेटिंग विधियों का उपयोग किया था.

फाइल फोटो: अयोध्या की एक तस्वीर

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