ऑपरेशन ब्लू स्टार के 34 साल पूरे हो चुके हैं. लेकिन 5 जून 1984 की उस रात की टीस अब भी महसूस की जा सकती है जब देश में पहली बार आस्था के सबसे बड़े मंदिर को आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए सेना हथियारबंद होकर पहुंची और इतिहास ने हमेशा हमेशा के लिए करवट बदल ली.
(5 जून 1984, समय शाम 7 बजे )
सेना का मिशन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों के चंगुल से छुड़ाना था. मंदिर परिसर के बाहर दोनों ओर से रुक-रुक कर गोलियां चल रही थीं. सेना को जानकारी थी कि स्वर्ण मंदिर के पास की 17 बिल्डिंगों में आतंकवादियों का कब्जा है.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत सेना ने सबसे पहले स्वर्ण मंदिर के पास होटल टैंपल व्यूह और ब्रह्म बूटा अखाड़ा में धावा बोला जहां छिपे आतंकवादियों ने बिना ज्यादा विरोध किए समर्पण कर दिया.
(रात साढ़े 10 बजे)
शुरुआती सफलता के बाद सेना ऑपरेशन ब्लू स्टार के अंतिम चरण के लिए तैयार थी. कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल के एस बराड़ ने अपने कमांडोज को उत्तरी दिशा से मंदिर के भीतर घुसने के आदेश दिए. लेकिन यहां जो कुछ हुआ उसका अंदाजा बराड़ को नहीं था.
चारों तरफ से कमांडोज़ पर फायरिंग शुरू हो गई. मिनटों में 20 से ज्यादा जवान शहीद हो गए. जवानों पर अत्याधुनिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड से हमला किया जा रहा था. अब तक साफ हो चुका था कि बरार को मिली इंटेलिजेंस सूचना गलत थी.
(देर रात 12.30 बजे)
आधी रात तक सेना मंदिर के अंदर ग्राउंड फ्लोर भी साफ नहीं कर पाई थी. बराड़ ने अपने दो कमांडिंग अफसरों को आदेश दिया कि वो किसी भी तरह पहली मंजिल पर पहुंचने की कोशिश करें. सेना की कोशिश थी किसी भी सूरत में अकाल तख्त पर कब्जा जमाने की, जो हरमिंदर साहिब के ठीक सामने है. यही भिंडरावाले का ठिकाना था.
लेकिन सेना की एक टुकड़ी को छोड़ कर कोई भी मंदिर के भीतर घुसने में कामयाब नहीं हो पाया था. अकाल तख्त पर कब्जा जमाने की कोशिश में सेना को एक बार फिर कई जवानों की जान से हाथ धोना पड़ा. सेना की स्ट्रैटजी बिखरने लगी थी.
(देर रात 2 बजे)
इस बीच मेजर जनरल के एस बराड़ के एक कमांडिंग अफसर ने बराड़ से टैंक की मांग की. बराड़ ये समझ चुके थे कि इसके बिना कोई चारा भी नहीं है. सुबह होने से पहले ऑपरेशन खत्म करना था क्योंकि सुबह होने का मतलब था और जाने गंवाना.
(सुबह 5 बजकर 10 मिनट)
5 बजकर 21 मिनट पर सेना ने टैंक से पहला वार किया. आतंकवादियों ने अंदर से एंटी टैंक मोर्टार दागे. अब सेना ने कवर फायरिंग के साथ टैंकों से हमला शुरू किया, चारों तरफ लाशें बिछ गईं.
(सुबह के 7.30 बजे)
अब तक अकाल तख्त सेना के कब्जे से दूर था और सेना को जानमाल का नुकसान बढ़ता जा रहा था. इसी बीच अकाल तख्त में जोरदार धमाका हुआ. सेना को लगा कि ये धमाका जानबूझकर किया गया है, ताकि धुएं में छिपकर भिंडरावाले और उसका मिलिट्री मास्टरमाइंड शाहबेग सिंह भाग सकें.
(सुबह 11 बजे)
अचानक बड़ी संख्या में आतंकवादी अकाल तख्त से बाहर निकले और गेट की तरफ भागने लगे लेकिन सेना ने उन्हें मार गिराया. उसी वक्त करीब 200 लोगों ने सेना के सामने आत्मसमर्पण किया.
इसके बाद सेना अकाल तख्त के भीतर पहुंची, जहां 40 समर्थकों की लाश के बीच भिंडरावाले, उसके मुख्य सहयोगी मेजर जनरल शाहबेग सिंह और अमरीक सिंह की लाश पड़ी थी. 6 तारीख की शाम तक स्वर्ण मंदिर के भीतर छिपे आतंकवादियों को मार गिराया गया था लेकिन इसके लिए सेना को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. सिखों की आस्था का केन्द्र अकाल तख्त नेस्तनाबूद हो चुका था. इस वक्त तक किसी को अंदाज़ा नहीं था कि ये घटना पंजाब के इतिहास को हमेशा के लिए बदलने वाली है.