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भारत

...इन 5 कारणों से विपक्षी नेता भी करते थे वाजपेयी का सम्मान

अमित कुमार दुबे
  • 16 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 5:49 PM IST
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अटल बिहारी वाजपेयी का देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसे विशाल व्यक्तित्व वाले राजनेता के रूप में सम्मान किया जाता है, जिनकी व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता है. वाजपेयी ने राजनीतिक विरोधियों को गले लगाया. दुनियाभर की विचारधारा वाले लोगों को अपने साथ जोड़ा.

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1. अटल जी की लोकप्रियता एक दिन में नहीं बढ़ी, आजादी के बाद पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने. इसी दौरे में अटल बिहारी पहली बार संसद में पहुंचे तो उनका भाषण सुनकर नेहरूजी ने कहा था- यह नौजवान नहीं, मैं भारत के 'भावी प्रधानमंत्री' का भाषण सुन रहा हूं. नेहरू का ये बयान आज भी याद किया जाता है कि उन्होंने पहले भाषण में अटल बिहारी का व्यक्तित्व पहचान लिया था.

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2. बड़ी बात ये है कि वे कांग्रेस के तमाम नेताओं को भी उतने ही प्रिय हैं जितने अपनी पार्टी को. अटल के बुलावे पर जॉर्ज फर्नांडीज उनकी सरकार में शामिल हो गए. इस कड़ी में ममता बनर्जी का भी नाम आता है. आज भी ममता मोदी सरकार को अटल जी की दुहाई देती हैं. अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति एकमात्र व्यक्ति हैं जिनके पास शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे लोग भी मौजूद थे तो जॉर्ज जैसे तुनकमिजाज भी उन्हें अपना गुरु मानते थे.

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3. वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने एक कॉलम में अटल जी के बारे में लिखा था, 'अटल आदमी अच्छे हैं मगर गलत पार्टी में हैं.' इसके जवाब में वाजपेयी ने कहा, 'अगर मैं सचमुच में अच्छा आदमी हूं तो गलत पार्टी में कैसे हो सकता हूं और अगर गलत पार्टी में हूं तो मैं अच्छा आदमी नहीं हो सकता. उन्होंने यह भी कहा कि अगर फल अच्छा है तो पेड़ खराब नहीं हो सकता.

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4. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी निस्संदेह आज एकमात्र ऐसे जननेता रहे जो सम्पूर्ण भारत में लोकप्रिय हैं. कविताओं और संवेदनाओं की परिधि में आजीवन खड़े इस जननायक ने जब 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में जब पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके राष्ट्रवाद के भाव को क्षितिज पर पहुंचाया तब सम्पूर्ण विश्व खिलाफ हो गया था. लेकिन उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया और वैश्विक समुदाय को भारत की शक्ति का निर्विवाद परिचय दिया. इसके बाद अटल लोगों में और लोकप्रिय हो गए. 

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5. चाहे प्रधानमंत्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष, अटल जी नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं, उनकी टिप्पणी इतनी सटीक होती थी कि विपक्ष भी चाहकर जवाब नहीं दे पाता था. नरसिम्हा राव कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को तब विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से काफी सियासी प्रहार झेलने पड़ते थे. एक बार तो मनमोहन सिंह ने नाराज होकर वित्त मंत्री के पद से इस्तीफे तक का मन बना लिया था. इसके बाद नरसिम्हा राव वाजपेयी के पास पहुंचे और उन्हें नाराज मनमोहन से मिलकर उन्हें समझाने की अपील की. वाजपेयी भी मनमोहन सिंह के पास गए और उन्हें समझाया कि इन आलोचना को खुद पर न लें, वह तो बस विपक्षी नेता होने के नाते सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं. जिसके बाद मनमोहन मान गए.

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