सफेद दाग की दवा खोजने वाले वैज्ञानिक को मिला साइंटिस्ट ऑफ द ईयर का अवार्ड

डॉ. हेमन्त कुमार डीआरडीओ की पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) स्थित प्रयोगशाला रक्षा जैव ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (डीआईबीईआर) में वरिष्ठ वैज्ञानिक पद पर तैनात हैं. इस संस्थान में वह लगभग 25 सालों से हिमालय क्षेत्र की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं. हालांकि, वह 6 दवाओं और हर्बल उत्पादों की खोज कर चुके हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी खोज सफेद दाग यानी ल्यूकोडर्मा की दवा ल्यूकोस्किन की खोज करना है.

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सफेद दाग की दवा ल्यूकोस्किन खोजने वाले वैज्ञानिक को मिला साइंटिस्ट आफ द ईयर का अवार्ड सफेद दाग की दवा ल्यूकोस्किन खोजने वाले वैज्ञानिक को मिला साइंटिस्ट आफ द ईयर का अवार्ड

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 9:01 PM IST
  • DRDO ने साइंटिस्ट ऑफ़ द ईयर अवार्ड से किया सम्मानित
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डॉ. हेमन्त कुमार को प्रदान किया यह सम्मान
  • 25 सालों से हिमालय क्षेत्र की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं डॉ. हेमन्त

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने सफेद दाग की प्रभावी दवा जैसे कई हर्बल उत्पाद को बनाने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हेमन्त कुमार को साइंटिस्ट ऑफ द  ईयर अवार्ड से सम्मानित किया है. वहीं, डीआरडीओ भवन के एक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डॉ. हेमन्त कुमार को यह सम्मान प्रदान किया. साथ ही पुरस्कार स्वरूप दो लाख रुपये की राशि और प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया. 

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इन दिनों डॉ. हेमन्त कुमार डीआरडीओ की पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) स्थिति प्रयोगशाला रक्षा जैव ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (डीआईबीईआर) में वरिष्ठ वैज्ञानिक पद पर तैनात हैं. इस संस्थान में वह लगभग 25 सालों से हिमालय क्षेत्र की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं. हालांकि, वह 6 दवाओं और हर्बल उत्पादों की खोज कर चुके हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी खोज सफेद दाग यानी ल्यूकोडर्मा की दवा ल्यूकोस्किन की खोज करना है.

जानकारी के मुताबिक, हिमालयी जड़ी-बूटियों से तैयार हुई ये दवा सफेद दाग की समस्या के लिए काफी प्रभावशाली है जो जल्द से जल्द इस समस्या से छुटकारा दिलाती है. इस तकनीक को कुछ साल पहले नई दिल्ली की एमिल फार्मास्युटिकल को हस्तांतरित किया गया था. मौजूदा समय में यह ल्यूकोस्किन एक प्रभावी दवा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है.

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बताया जा रहा है कि ल्यूकोस्किन को हिमालयी क्षेत्र में दस हजार फुट की ऊंचाई पर पाए जाने वाले औषधीय पौधे विषनाग से तैयार किया गया है. यह खाने और लगाने वाली, दोनों स्वरूपों में उपलब्ध है. अब तक डेढ़ लाख से अधिक लोगों का इससे उपचार किया जा चुका है.  

विश्व में वैसे तो एक से दो फीसदी लोग सफेद दाग की समस्या से प्रभावित हैं लेकिन भारत में ऐसे लोग तीन से चार फीसदी होने का अनुमान है. इस हिसाब से यह संख्या लगभग पांच करोड़ बैठती है. यह आटो इम्यून डिसआर्डर है जिसमें त्वचा के रंग के लिए जिम्मेदार कुछ सूक्ष्म कोशिकाएं निष्क्रिय हो जाती हैं. हालांकि, इसका शरीर की क्षमता पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता है.  

डॉ ने इसके अलावा खुजली, दांत दर्द, रेडिएशन से बचाने वाली क्रीम, हर्बल हेल्थ जैसे उत्पाद आदि भी उन्होंने तैयार किए हैं. इनमें से ज्यादातर उत्पादों की तकनीक हस्तांतरित हो चुकी है.

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