दिल्ली के महरौली में हुए श्रद्धा हत्याकांड की जांच कर रही पुलिस को आरोपी आफताब अमीन पूनावाला के नार्को टेस्ट कराने की इजाजत मिल गई है. नार्को टेस्ट से पुलिस को जांच में मदद मिलती है, लेकिन इस टेस्ट से हमेशा चौंकाने वाले खुलासे नहीं हुए हैं. अभी तक स्टाम्प पेपर स्कैम केस, कसाब और आरुषि केस में नार्को टेस्ट कराया गया था. आइए इन पर एक नजर डालते हैं.
1- अब्दुल करीम तेलगी (स्टाम्प पेपर स्कैम)
महाराष्ट्र की राजनीति में तहलका मचाने वाले स्टाम्प पेपर रैकेट मामले में इसके सरगना अब्दुल करीम तेलगी का नार्को टेस्ट कराया गया था. तेलगी ने टेस्ट के दौरान आरोप लगाया था कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार, तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल ने उससे रुपये लिए थे. हालांकि जब तेलगी ने चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया तो उसमें पवार या भुजबल का कोई उल्लेख नहीं था. साल में 2003 में कराए गए नार्को टेस्ट को साल 2006 में टीवी चैनलों पर प्रसारित किया गया था, जिसमें तेलगी ने शरद पवार और छगन भुजबल को भुगतान करने का दावा किया था.
2. 26/11 मुंबई आतंकी हमला केस
26/11 के मुंबई हमले में भी जिंदा बचे एकमात्र आतंकी अजमल कसाब का नार्को टेस्ट किया गया था ताकि वह अपनी पूछताछ में कबूल कर सके और पाकिस्तान की धरती से रची जा रही साजिश के बारे में और भी जानकारी मिल सके. नार्को टेस्ट में कसाब ने प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के बारे में बताया था. उसके अलावा मुंबई में हमले की योजना के बारे में भी जानकारी दी थी. कसाब के नार्को टेस्ट ने लश्कर और उसके संस्थापक हाफिज सईद के शामिल होने और मास्टरमाइंड के बारे में आइडिया दिया. इसके अलावा गरीब लोगों और उनके परिवारों को अपने कैडर में शामिल करने के लिए आतंकवादी ग्रुप द्वारा प्रचार किया गया था. सुरक्षा एजेंसियां टेस्ट के साथ आगे बढ़ीं.
3. आरुषि तलवार मर्डर केस
सीबीआई ने आरुषि के माता-पिता नूपुर और राजेश तलवार का नार्को टेस्ट कराया था, जिसमें कोई नतीजा नहीं निकला था. इससे एजेंसी को कोई ठोस सुराग हासिल नहीं हुआ था, जिससे आरुषि मर्डर केस की जांच कर रही सीबीआई को केस सुलझाने में कोई मदद मिल सके. जांच एजेंसी ने साल 2010 में दंपति और अन्य का नार्को टेस्ट कराया था जबकि 2009 में तलवार दंपति का ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट किया था.
डेंटिस्ट कपल को 15-16 मई, 2008 की रात अपनी 14 वर्षीय बेटी आरुषि और उनके घरेलू नौकर हेमराज की हत्या करने का दोषी पाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. सीबीआई की पहली टीम को शक था कि शायद नौकर ने अपराध किया हो, लेकिन सीबीआई के तत्कालीन डायरेक्टर अश्विनी कुमार सबूतों की कमी के कारण सहमत नहीं थे. सीबीआई की दूसरी टीम ने घटनाओं के बारे में बताते हुए एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की. आरुषि के मर्डर में तलवार दंपति की भूमिका का संकेत भी दिया गया, लेकिन उनके खिलाफ सीबीआई कोई फोरेंसिक सबूत पेश नहीं कर सकी.
साकेत कोर्ट ने दी नार्को टेस्ट की इजाजत
दिल्ली की साकेत कोर्ट ने चर्चित श्रद्धा मर्डर केस में आरोपी आफताब पूनावाला के नार्को टेस्ट की इजाजत दे दी है. दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में कहा कि आरोपी लगातार गुमराह कर रहा है और सबूतों के बारे में कुछ भी सही नहीं बता रहा है. इस केस में आरोपी ने सभी सबूत मिटा दिए थे, इसलिए ये केस दिल्ली पुलिस के लिए पहेली बनता जा रहा है या कहें कि इस केस में दिल्ली पुलिस उलझती चली जा रही है.
क्या होता है नार्को टेस्ट?
नार्को टेस्ट को ट्रूथ सीरम भी कहा जाता है. कई अहम केसों में पहले भी इसका इस्तेमाल हो चुका है. इस टेस्ट में इंजेक्शन में एक तरह की साइकोएक्टिव दवा मिलाई जाती है. इसमें सोडियम पेंटोथल नाम का केमिकल होता है, जो जैसे ही नसों में उतरता है, शख्स कुछ मिनट से लेकर लंबे समय के लिए बेहोशी में चला जाता है. इसके बाद जागने के दौरान अर्धबेहोशी की हालत में वो बिना किसी लागलपेट के वो वह सच भी बोल जाता है, जो सामान्य स्थिति में वह नहीं बताता.
जांच एजेंसी तभी इस टेस्ट का इस्तेमाल करती हैं, जब अन्य सबूत उसके हाथ नहीं लगते. नियमों के मुताबिक, नार्को टेस्ट से पहले आरोपी की अनुमति भी जरूरी होती है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर फैसला सुनाया था कि नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना नहीं किए जा सकते.
नार्को टेस्ट के दौरान दिया बयान, कोर्ट में सबूत के तौर पर मान्य नहीं
हालांकि, नार्को टेस्ट के दौरान दिया गया बयान कोर्ट में जांच एजेंसी द्वारा सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में इसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, जब कोर्ट को लगता है कि मामले के तथ्य और प्रकृति इसकी अनुमति देती है. जांच एजेंसी डॉक्टरों की टीम की उपस्थिति में इस टेस्ट को करती हैं. इस दौरान आरोपी जो बयान देता है, उन्हें वीडियो रिकॉर्ड किया जाता है. सबूतों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाती है. यह पूरी प्रक्रिया किसी सरकारी अस्पताल में होती है.
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