कोरोना वायरस महामारी ने भारत में जमकर कहर ढाया. मार्च 2020 में महामारी की शुरुआत के बाद से भारत में हर दिन औसतन 840 लोगों की मौत हुई. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या देश में दर्ज कुल दैनिक मौतों (कोरोना से अलग हुई मौतों) का लगभग तीन प्रतिशत है. सिर्फ 5 राज्यों की पड़ताल में कोरोना से मौत के सरकारी आंकड़े और कुल जान गंवाने वालों की संख्या के बीच 1 लाख से ज्यादा का फासला नजर आता है.
ऐसे में क्या यह आंकड़ा पिछले 15 महीनों में दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश पर कोरोना वायरस के प्रभाव को दर्शाता है? इसे जानने के लिए आजतक ने अलग-अलग डेटा के माध्यम से पड़ताल की.
सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा लोगों ने जान गंवाई!
दरअसल, अप्रैल और मई के बीच जब देश में कोरोना रोज हजारों लोगों की जान ले रहा था, तब वायरस से जान गंवाने वालों का जो नंबर अलग-अलग राज्यों में बताया गया, उस पर देश से लेकर विदेश के मीडिया तक ने सवाल उठाए. इस आरोप के साथ कि सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा लोगों ने जान गंवाई है.
जांच के लिए आजतक ने कई सरकारी दस्तावेज खंगाले
इसीलिए आजतक ने कई सरकारी दस्तावेज खंगाले और उन्हीं पन्नों में दर्ज मौत के नंबरों की पड़ताल करके ये रिपोर्ट तैयार की, जो बताती है कि कोरोना से देश में नागरिक मरे ज्यादा हैं, लेकिन गिने कम गए हैं. पता चला है कि कोरोना की दूसरी लहर से हुई मौतों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक है.
ये जानकारी हासिल करने के लिए आजतक ने हर तरह की मृत्यु का एक-एक लेखा जोखा रखने वाले सिविल रजिस्ट्रेशन प्रणाली अस्पतालों से कोविड प्रोटोकॉल के तहत अंतिम संस्कार को भेजे गए शवों, नगर निकायों से मांगे गए मृत्यु प्रमाण पत्रों की गहन जांच की.
दिल्ली में कोरोना से मौत की गिनती
सबसे पहले हमने भारत की राजधानी दिल्ली में कोरोना से मौत की गिनती और उस दौरान मृत्यु के आंकड़ों के बीच के सच को समझने की कोशिश की. यहां अप्रैल से मई के बीच यानी वो वक्त जब दिल्ली के श्मशान घाटों और विद्युत शवदाह गृहों के बाहर कोविड प्रोटोकॉल से अंतिम संस्कार की लंबी लाइन लगी दिखती थी, लेकिन मृत्यु के असली नंबर सरकार के पन्नों में कम दिखते हैं.
इसी साल अप्रैल-मई के बीच दिल्ली सरकार के हेल्थ बुलेटिन में कोरोना से जान गंवाने वालों की संख्या 13,021 बताई गई है, जबकि उन्हीं दो महीनों में श्मशान घाटों पर कोरोना के कारण जान गंवाने वालों के शवों के अंतिम संस्कार का आंकड़ा 19715 बताया गया. तो क्या अकेले दिल्ली में ही 2 महीने के भीतर कोरोना से जान गंवाने वाले 6,694 लोगों को गिना ही नहीं गया?
इस सवाल को बल मिलता है, जब आजतक की टीम दिल्ली के नगर निगमों से जारी दो साल के डेथ सर्टिफिकेट की तुलना करती है. अप्रैल और मई में जितने डेथ सर्टिफिकेट इस साल दिल्ली के तीन नगर निगमों ने जारी किया. वो पिछले साल के अप्रैल-मई महीने के मुकाबले ढाई सौ फीसदी ज्यादा हैं. इतने ज्यादा लोगों की जान उसी वक्त जाना, जब कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर थी और सरकारी दस्तावेज में कोरोना से मृत्यु की संख्या कम आने से एक सवाल उठाता है.
इस साल अप्रैल-मई के महीने में दिल्ली के तीनों नगर निगमों ने जहां 34,750 लोगों का डेथ सर्टिफिकेट जारी किया. वहीं अप्रैल-मई 2020 में सिर्फ 5475 लोगों का मृत्यु प्रमाण पत्र इश्यू किया गया था.
जानिए राजस्थान का हाल
सरकारी दावों में जलती चिताओं और हकीकत में घरों के भीतर पसरे मातम के बीच का फासला सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है. राजस्थान के 4 म्यूनिसिपिल कॉर्पोरेशन में दर्ज मौत के आंकड़ों की पड़ताल भी आजतक ने की है. जहां श्मशान घाटों में हुए अंतिम संस्कार, सरकारी दफ्तर में मृत्यु प्रमाण पत्र और सरकार के पन्नों में दर्ज कोरोना से मौत के आंकड़े आपस में मेल नहीं खाते.
अकेले जयपुर में अप्रैल और मई के बीच नगर निगम में मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आए आवेदन पिछले साल के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ गए. लेकिन उन डेथ सर्टिफिकेट की तुलना में जयपुर में कोरोना से जान गंवाने वालों की संख्या सरकारी दस्तावेज में कम दिखती है.
जयपुर, जोधपुर, बीकाने और उदयपुर के म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन दफ्तर की फाइल बताती है कि अप्रैल-मई 2020 में 7263 लोगों की मृत्यु हुई. इन्हीं दो महीनों के बीच 2021 में जब महामारी चारों तऱफ फैली तब मरने वालों का आंकड़ा 23,300 पहुंच जाता है. लेकिन राज्य सरकार कहती है कि कोरोना से तो सिर्फ अप्रैल-मई में 2143 लोग ही मारे गए.
तो क्या बाकी 21157 लोगों की मृत्यु सामान्य थी. अगर पिछले साल के आधार पर सामान्य मृत्यु भी गिन लें तो भी राजस्थान के सिर्फ चार बड़े शहरों में 13894 लोगों का उसी वक्त में दम तोड़ना जब कोरोना फैला था लेकिन मृत्यु का कारण कोरोना सिस्टम ना मानें, ये बात पचना मुश्किल है.
गुजरात में कोरोना से मौत की गिनतियों पर उठते सवाल
राजस्थान के बाद अब गुजरात में कोरोना से मौत की गिनतियों पर उठते सवालों पर हमने पड़ताल की. गुजरात में कोरोना की दोनों लहरों में 31 मई तक 9833 मौत का आंकड़ा सरकारी दस्तावेज बताता है. जबकि कांग्रेस का आरोप है कि कोरोना की दूसरी लहर में ही 24000 लोगों की जान कोरोना से जाने का दस्तावेज उसके पास है, जो कांग्रेस के मुताबिक जान गंवाने वाले लोगों से ऑनलाइन फॉर्म भरवाकर इकट्ठा किया गया है.
दक्षिण के राज्यों का सच
दक्षिण के राज्यों तक भी सच जानने हम पहुंचे. कर्नाटक में 1 जनवरी से 19 जून के बीच सिविल रजिस्ट्रेशन रजिस्टर के पन्ने बताते हैं कि 2018 में 2.44 लाख लोगों की मृत्यु हुई. 2019 में 2.35 लाख लोगों की जान गई.
वहीं 2021 में इसी दौरान मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर 3 लाख 30 हजार हो जाता है. लेकिन कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग सिर्फ 21,667 लोगों की जान जाने की वजह ही कोरोना को मानता है.
जिनसे ये सवाल उठता है कि जब पिछले वर्ष के मुकाबले दम तोड़ने वाले 90 हजार से ज्यादा बढ़ जाते हैं तो क्या सिर्फ एक चौथाई की मृत्यु का कारण कोरोना बताकर बाकी को सामान्य मौत के रजिस्टर में चढ़ा दिया जा रहा है?
तमिलनाडु तक आजतक की इनवेस्टिगेशन
तमिलनाडु तक आजतक की इनवेस्टिगेशन बताती है कि जनवरी से मई 2018 के बीच सिविल रजिस्ट्रेशन रजिस्टर के मुताबिक 2.36 लाख लोगों की मृत्यु हुई. 2019 में इन्हीं 5 महीने के दौरान 2.50 लाख लोगों की जान जाती है यानी 20 हजार ज्यादा.
लेकिन 2021 में इन्हीं पांच महीने के दौरान जहां एक दस्तावेज में मौत का आंकड़ा 68 हजार बढ़कर 3 लाख 18 हजार पहुंच जाता है. तब भी सरकार तमिलनाडु में मई तक 12,907 लोगों की मृत्यु ही दर्ज करते बताती है.
सिर्फ 5 राज्यों की पड़ताल में कोरोना से मौत के सरकारी आंकड़े और कुल जान गंवाने वालों की संख्या के बीच 1 लाख से ज्यादा का फासला नजर आता है. अब आप सोचिए अगर ये सत्य यही है तो सरकारी अव्यवस्थाओं ने किस तरह महामारी में मृत्यु की सही गिनती पर पर्दा डाल दिया है.
आजतक ब्यूरो
रिपोर्ट- स्नेहा मोरदानी, कुमार कुणाल, शरत कुमार
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