ट्रिपल तलाक कानून के समर्थन में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड, कहा- सरकार जल्द करे इंप्लीमेंट ताकि जिंदगियां न हो खराब

कोई तीन लाख बार भी तलाक-तलाक-तलाक भी बोल दे तो तलाक नहीं होता है. शिया धर्म गुरु और शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव यासूब अब्बास ने आगे कहा कि तलाक लेने का अधिकार हर किसी को है. बच्चियां भी इसी अधिकार के तहत तलाक ले सकती हैं.

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तीन तलाक कानून. तीन तलाक कानून.

सत्यम मिश्रा

  • लखनऊ,
  • 28 जून 2023,
  • अपडेटेड 5:30 PM IST

जहां एक तरफ ऑल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) तीन तलाक की प्रथा को अपराध मानने वाले प्रस्तावित विधेयक का विरोध कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AISPLB) इसका समर्थन कर रही है. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के समर्थन के पीछे का कारण महिलाओं के साथ हो रहे गलत ढंग से तलाक का विरोध करना है.

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वहींं, ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी और शिया धर्म गुरु मौलाना यासूब अब्बास ने तीन तलाक बोल कर तलाक देने का विरोध करते हुए कहा कि ट्रिपल तलाक को लेकर शिया पर्सनल लॉ बोर्ड इसकी पूरी मजम्मत (निंदा) करता है क्योंकि जिस तरीके से बच्चों की जिंदगी सिर्फ तीन लफ्ज (तलाक-तलाक-तलाक) बोलकर तलाक दे दिया जा रहा है तो मैं बताना चाहता हूं कि कोई तीन लाख बार भी तलाक-तलाक-तलाक भी बोल दे तो तलाक नहीं होता है.

तो नहीं होगी बच्चियों की जिंदगी खराब: यासूब अब्बास

शिया धर्म गुरु और शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव यासूब अब्बास ने आगे कहा कि तलाक लेने का अधिकार हर किसी को है. बच्चियां भी इसी अधिकार के तहत तलाक ले सकती हैं. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता और महासचिव ने ये भी कहा कि सरकार ने कानून तो बना दिया, लेकिन इसका इंप्लीमेंट वह नहीं कर रही है. इसके चलते बच्चियों की जिंदगियां तीन तलाक बोल देने से खराब हो रही है, इसलिए एक सख्त कानून की जरूरत है ताकि बच्चियों की जिंदगियों को बचाया जा सके.

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SC ने तीन तलाक को घोषित किया था असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने 22 अगस्त 2017 को अपने फैसले में ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. SC ने 1400 साल पुरानी प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार से कानून बनाने के लिए कहा था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाते हुए एकसाथ तीन बार तलाक बोलकर या लिखकर निकाह खत्म करने को अपराध की श्रेणी में लाया था. इस अपराध के लिए अधिकतम तीन साल कैद की सजा का प्रावधान भी है.

याचिका में बताया गया है गैर इस्लामिक

इस कानून को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुई हैं. याचिकाकर्ताओं ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा है कि यह गैर-इस्लामिक है. संविधान के अनुच्छेद 13, 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन है.

 

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