लता मंगेशकर के जाने के साथ तनावमुक्त आवाज भी चली गई, मोहन भागवत की श्रद्धांजलि

देश की दिग्गज सिंगर लता मंगेशकर हाल ही में निधन हुआ है. लता दीदी की याद में पुणे में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था, जिसमें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी पहुंचे. भागवत ने यहां कहा कि मैं सिर्फ एक बार उनसे मिला लेकिन उस मुलाकात से मुझे ऊर्जा मिली थी.

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मोहन भागवत पुणे में लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे थे. मोहन भागवत पुणे में लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे थे.

पंकज खेळकर

  • मुंबई,
  • 28 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 7:36 AM IST
  • संघ प्रमुख मोहन भागवत ने लता मंगेशकर को दी श्रद्धांजलि
  • पुणे में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे थे भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत (RSS Mohan Bhagwat) ने लता मंगेशकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके जाने के साथ ही दुनिया से तनावमुक्त करने वाली आवाज भी चली गई.

मोहन भागवत पुणे में लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे थे. उन्होंने कहा, लता दीदी के परिवार को दिलासा देना कठिन है, क्या कहें कुछ समझ नहीं आ रहा. महान लोग जाते हैं, तो ऐसा ही होता है. 

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मोहन भागवत ने कहा, मैं लता मंगेशकर के सबसे कम संपर्क में रहा. सिर्फ एक बार उनसे मिला. लेकिन उस मुलाकात से मुझे ऊर्जा मिली थी. संघ प्रमुख ने कहा, लता दीदी को कठिन जीवन गुजारना पड़ा. लेकिन उन्होंने धैर्य से काम लिया. उनके जाने से दुनिया से तनावमुक्त आवाज चली गई, यह आवाज फिर आना असंभव है. 
 
गणेश कला क्रीड़ा रंगमंच ने पुणे में भारतरत्न लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया था. इस दौरान मोहन भागवत ने कहा लता दीदी के जाने से जो हानि हुई वह तो हुई, उनके अस्तित्व की निशानी उनके आचरणों से लेनी चाहिए. लता दीदी के गाने तारीफ से परे थे. भले ही लता दीदी ज्यादा पढ़ी नहीं थीं, लेकिन अगर पढ़ती तो दुनिया मे सबसे शिक्षित लोगों की लिस्ट में होती. देश मे कोई भी उनका स्थान नहीं ले सकता. 

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इस दौरान आशा भोसले ने कहा कि अभी कुछ ही दिन हुए हैं. हम सब यहां उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आए हैं. मुझे लगा नहीं कि इतनी जल्दी मुझे ऐसी सभा में बोलना पड़ेगा. दीदी के बारे में क्या कहें, समझ में नहीं आ रहा, लता दीदी अगर ज़्यादा पढ़ी होती तो वह देश की प्रधानमंत्री बनती, इतनी वह महान थीं.

आशा भोसले ने कहा कि इसी पुणे में उनके पिताजी का 1942 में देहांत हुआ था, तब दीदी 12 वर्ष की थी. उस समय पिताजी को एम्बुलेंस भी नसीब नहीं हुई थी. तभी दीदी ने ठान लिया था कि कुछ भी हो जाए, पुणे में एक अस्पताल बनाना है और उन्होंने वह बनाया. दीदी को मंगेशकर सरनेम का काफी अभिमान था. आपके लिए लता मंगेशकर गई हैं, लेकिन हमारे लिए सब समाप्त हो गया. 


 

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