बिहार: 252 साल से धुलंडी में रंग की जगह फूलों से खेली जाती है होली, देश-विदेश से देखने आते हैं लोग

समस्तीपुर के भिरहा गांव की होली देश-विदेश में प्रसिद्ध है. साल 1836 से भिरहा में ब्रज की तर्ज पर होली का उत्सव मनाना शुरू किया गया है. इस गांव में खेले जाने वाले होली को लेकर राष्ट्रकवि दिनकर ने इसे बिहार का वृंदावन कहा था. होली में यहां बड़े-बड़े कलाकार अपना डांस और संगीत का जलवा दिखाते हैं.

Advertisement
बिहार में वृंदावन जैसी होली बिहार में वृंदावन जैसी होली

जहांगीर आलम

  • समस्तीपुर,
  • 07 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 9:01 PM IST

बिहार के समस्तीपुर में होली का जलवा कुछ ऐसा है कि यहां देश ही नहीं, विदेश से भी लोग इसे देखने आते हैं. यहां धुलंडी के दिन रंग से नहीं फूलों से होली खेली जाती है. भिरहा गांव में खेले जाने वाले होली को देखकर राष्ट्रकवि दिनकर ने इसे बिहार का वृंदावन कहा था. 

यहां जगह-जगह पर रात के अंधेरे में चमकीली लाइट से टेंट पंडाल सजाए जाते हैं. साथ ही भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इसमें कई जगहों से आकर बड़े-बड़े कलाकार अपना जलवा दिखाते हैं. मामला रोसड़ा थाना क्षेत्र के भिरहा गांव का है.

Advertisement

होली का जलवा ऐसा है कि यहां देश के कोने-कोने से आए लोगों की भीड़ जमा हो जाती है. गांव के लोगों की मानें तो इस भिरहा की होली में करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं. भिरहा गांव की होली के बारे में स्थानीय ग्रामीण ने बताया कि ब्रज के तर्ज पर यहां होली मनाई जाती है.

तीन टोला में होती है होली में आगे निकलने की होड़

यहां आज भी ब्रज की तर्ज पर होली खेलने की परंपरा जीवित है. गांव के तीन टोला (मुहल्ला) हैं. ये एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में सजावट के साथ-साथ अच्छे से अच्छा बैंड पार्टी और नर्तकी लाते हैं.

1835 में गांव के बुजुर्गों ने वृंदावन की होली देख शुरू की थी परंपरा

होली से एक दिन पहले होलिका दहन की संध्या से ही पूरब, पश्चिम और उत्तर टोले में निर्धारित स्थानों पर अलग अलग नर्तकियों का डांस जारी रहता है. कहा जाता है कि साल 1835 में गांव के कई बुजुर्ग होली देखने वृंदावन गए थे. वहां से लौटने के बाद ग्रामीणों के लिए गए फैसले पर साल 1836 से भिरहा में ब्रज की तर्ज पर होली का उत्सव मनाना शुरू किया गया.

Advertisement

देश-विदेश से देखने आते हैं होली 

लगातार 105 सालों तक एक साथ होली मनाने के बाद साल 1941 में घनी आबादी वाला यह गांव तीन भागों में बंटकर होली मनाने लगा. अब तो भिरहा में काफी संख्या में लोग देश-विदेश से होली देखने के लिए आते हैं.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement