विशेषांकः पर्यावरण हितैषी बिल्डर

यह भारतीय हवेलियों और छतरियों की स्थापत्य कला का नया स्वरूप है. उसमें आंगन और प्राकृतिक वेंटिलेशन के लिए ट्रांजिशन स्पेस और सामाजिक मेलजोल की व्यवस्था है.

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सचिन रस्तोगी सचिन रस्तोगी

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 8:36 PM IST

नई नस्ल 100 नुमाइंदे/उद्यमी

सचिन रस्तोगी, 38 वर्ष
संस्थापक डायरेक्टर, जीरो एनर्जी डिजाइन लैब, नई दिल्ली

जब हर ओर अति का बोलबाला हो, सचिन रस्तोगी का आर्किटेक्चर और इंटीरियर डिजाइन स्टूडियो जेड (जीरो एनर्जी डिजाइन) लैब अलहदा नजर आता है. उसकी खासियत नेट-जीरो बिल्डिंग है. सचिन का दर्शन सीधा-सादा है, ''संसाधन की खपत को कम करके लोगों के अनुभव को बेहतर करना.’’ रस्तोगी की इमारत की डिजाइन में जलवायु, स्थान, संदर्भ और पर्यावरण का खास ख्याल रखा जाता है.

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यहां तक कि उन्हें भविष्य की डिजाइन के लिए स्थानीय देसी वास्तुकला से प्रेरणा मिलती है और इस तरह वे तारीफ हासिल करते हैं. मिसाल के तौर पर, गुरुग्राम में सेंट एंड्रयूज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट के हॉस्टल ब्लॉक की डिजाइन मॉडल की तरह है, जिसमें पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊपन, ऊर्जा संरक्षण और न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन का ध्यान रखा गया है. उसे आरटीएफ ग्रीन बिल्डिंग अवॉर्ड और एल्ड्रोक बेस्ट ग्रीन बिल्डिंग अवार्ड समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. 

उनकी एक और दिलचस्प कृति करनाल में हाउस अंडर शैडो है. यह भारतीय हवेलियों और छतरियों की स्थापत्य कला का नया स्वरूप है. उसमें आंगन और प्राकृतिक वेंटिलेशन के लिए ट्रांजिशन स्पेस और सामाजिक मेलजोल की व्यवस्था है.

रस्तोगी स्कूल ऑफ प्लानिंग ऐंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली और आर्किटेक्चरल एसोसिएशन स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर, लंदन के पूर्व छात्र हैं. उनके पास यूरोप, पश्चिम एशिया और न्यूजीलैंड में 10 से अधिक वर्षों का अंतरराष्ट्रीय अनुभव है.
—रिद्धि काले

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खेल में भी रमे रस्तोगी क्रिकेट के दीवाने हैं और जब भी मौका मिलता है, मैच खेलते हैं. उन्हें फुटबॉल भी पसंद है और खेलकूद में राज्य-स्तर के कई पुरस्कार जीत चुके हैं.

''सचिन ने मिसाल पेश कर आगे बढ़ने की हिम्मत दिखाई. उनका काम अलग तरह का और उकसाने वाला है, जैसी कि असली डिजाइन होनी चाहिए’’
प्रो. मनोज माथुर, स्कूल ऑफ प्लानिंग ऐंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली
 

दूरदर्शी चश्मा
पीयूष बंसल, 37 वर्ष, अमित चौधरी, 35 वर्ष, सुमीत कपाही, 34 वर्ष
सह-संस्थापक, लेंसकार्ट, नई दिल्ली

अपने उद्यमों, सर्चमाइकैंपसडॉटकॉम और वाल्यो टेक्नोलॉजीज की थोड़ी सफलता ने पीयूष बंसल को 2010 में अमेरिका से भारत लौटने तथा चश्मों का स्टार्ट-अप शुरू करने के लिए प्रेरित किया. अपने दोस्तों अमित चौधरी, रमणिक खुराना और सुमीत कपाही की मदद से उन्होंने लेंसकार्ट को स्थापित किया.

लेंसकार्ट ने हाइब्रिड मॉडल को अपनाया है—ऑनलाइन और पारंपरिक स्टोर भी. बंसल को यकीन था कि भारतीय बाजार उन्हें सीढ़ी मुहैया कराएगा. कॉन्टैक्ट लेंस से शुरू करते हुए, लेंसकार्ट के आज करीब 600 खुदरा स्टोर हैं. दावा है कि 4,000 से अधिक प्रकार के चश्मों (आईवियर) और अन्य नेत्र देखभाल उत्पादों के साथ हर महीने 1,00,000 से अधिक ग्राहकों को सेवा मुहैया कराया जाता है.

सॉफ्टबैंक के 27.5 करोड़ डॉलर (2,080 करोड़ रुपए) के निवेश के बाद 2019 में लेंसकार्ट 1.5 अरब डॉलर (11,355 करोड़ रुपए) की कंपनी हो गई थी. बंसल, चौधरी और कपाही ने इसके संचालन को सुव्यवस्थित करने के लिए कड़ी मेहनत की है. दिल्ली में उनका केंद्र एक महीने में 3,00,000 ग्लास का उत्पादन कर सकता है; करीब 20 फीसद फ्रेम चीन के झेंगझाउ में बनते हैं.

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कपाही सप्लाई का ध्यान रखते हैं जबकि चौधरी संगठनात्मक विकास के विशेषज्ञ हैं. और, बंसल निश्चित रूप से लेंसकार्ट के दिमाग जैसे हैं.

प्रशिक्षण पाया अमेरिका में वैल्यू टेक्नोलॉजीज उद्यम के जरिए बंसल ने चश्मों के कारोबार का व्यावहारिक अनुभव हासिल किया

''अत्याधुनिक फर्म खड़ी करने के लिए जरूरी है कि बाजार या निवेशकों के मानकों में न बह जाएं, बल्कि अपने मानक स्थापित करें’’
—पीयूष बंसल..

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