यासीन मलिक की सजा से उपजी आशंका

यासीन जैसे व्यक्ति में विरोध करने का ऐसा माद्दा था कि 1994 में जब उग्रवाद अपने चरम पर था, वे अपने ही लोगों के खिलाफ खड़े हो गए. शांति का रास्ता अपनाने वाला अब जेल में है

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गांधीवादी या उग्रवादी? यासीन मलिक अदालत ले जाती पुलिस गांधीवादी या उग्रवादी? यासीन मलिक अदालत ले जाती पुलिस

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मई 2022,
  • अपडेटेड 11:50 AM IST

मोअज्जम मोहम्मद

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक को 25 मई को जब सजा सुनाई जानी थी तो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने आतंकवाद से लेकर अलगाववादी गतिविधियों को हवा देने तक के आरोपों का हवाला देते हुए उन्हें मौत की सजा देने की मांग की थी. यासीन ने इन आरोपों से इनकार करने की कोशिश नहीं की. उन्होंने फैसला अदालत पर छोड़ते हुए कहा, ''मैं किसी बात के लिए याचना नहीं करूंगा...'' आगे उनका कहना था कि भारतीय खुफिया विभाग अगर साबित कर दे कि वे 28 वर्षों से किसी प्रकार की हिंसा में लिप्त रहे हैं तो वे फांसी पर झूलने के लिए तैयार हैं. यासीन के मुताबिक, उन्होंने महात्मा गांधी के बताए रास्ते का अनुसरण किया है.

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बहरहाल, अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुना दी. पुलवामा में आत्मघाती हमले के बाद जब कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की धरपकड़ शुरू हुई तो इस 56 वर्षीय नेता को फरवरी 2019 में गिरफ्तार कर लिया गया. शुरू में उन पर जेऐंडके पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट के तहत आरोप लगाया गया था. फिर एक महीने बाद यासीन को एनआइए की हिरासत में भेज दिया गया. 2017 में खोला गया मामला तब केंद्रबिंदु बन गया. उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाया गया.

यासीन, एचएजेवाइ नाम के उस संगठन के एक सदस्य थे जिसने 1989 में कश्मीर में उग्रवाद शुरू किया. वे अप्रैल 1990 से लेकर उथल-पुथल वाले उसी वर्ष 8 अगस्त को अपनी गिरफ्तारी तक जेकेएलएफ के स्थानीय प्रमुख बने रहे. 1994 में रिहा होने के बाद अपने साथियों के खिलाफ जाते हुए उन्होंने 'युद्धविराम' की घोषणा कर दी जिसके कारण जेकेएलएफ में टूट हो गई. हिंसा का रास्ता छोड़कर शांति का रास्ता चुना—इसीलिए उन्होंने अदालत में गांधीवादी तरीकों का हवाला दिया था. वे अपने उद्देश्य पर कायम रहते हुए अलगाववादी आंदोलन की अगुआ मानी जानी वाली तिकड़ी का हिस्सा बन गए. इस तिकड़ी के दो अन्य नेता थे—सैयद अली शाह गिलानी, जिनका निधन हो चुका है और मीरवायज उमर फारूक. गिलानी की मौत के बाद यासीन तिहाड़ जेल में हैं और मीरवायज अपने निगीन निवास में नजरबंद हैं. जाहिर है इसके बाद मुख्यधारा के अलगाववादी नेतृत्व की जगह खत्म हो सकती है. बहुत से लोगों को लगता है कि इससे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का खामोशी के साथ अंत हो जाएगा. 1993 में अस्तित्व में आया हुर्रियत कॉन्फ्रेंस दर्जन भर से ज्यादा सामाजिक और राजनैतिक संगठनों का एक समूह है. हुर्रियत ने उग्रवाद को एक राजनैतिक चेहरा प्रदान किया था.

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यासीन मलिक के खिलाफ अदालत के फैसले से पहले आखिरी विरोध प्रदर्शन कब हुआ था? लगभग हर कोई, जिसमें यासीन के साथी भी शामिल हैं, इस बारे में बातचीत से बचना चाहते हैं. यासीन के एक साथी रूखेपन से कहते हैं, ''कोई भी जेल में सड़ना नहीं चाहता है.'' 

श्रीनगर के एक छोटे से घर में, जहां केवल यासीन की मां और एक बहन रहती हैं, पहले की तरह आने जाने वाले लोग बहुत दुर्लभ हो गए हैं. उनके एक रिश्तेदार याद करते हैं कि यासीन पहले जब जेल में होते थे तो लोग किस तरह आगंतुकों के लिए बना-बनाया खाना और चाय लाया करते थे. वह सब अब बंद हो गया है. एक रिश्तेदार का कहना है, ''येति चु वारया खुऔफ ते प्रेशर. नौकरी मांज मालाजिमन कदां (यहां बहुत ज्यादा दबाव और डर है. लोगों को नौकरी से निकाल दिया जाता है).''

जम्मू-कश्मीर की पुरानी स्थिति बहाल करने की मांग करने वाले पांच पार्टियों के मंच पीपल्स एलायंस फॉर गुपकर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) की ओर से सिर्फ इतना ही कहा गया कि इस फैसले से ''अनिश्चितताएं और भी जटिल'' हो जाएंगी. इससे इस्लामाबाद और लंदन, जहां 1970 के दशक के शुरू में जेकेएलएफ का जन्म हुआ था, में जरूर विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्देश जारी किए जा सकते हैं. लेकिन नई दिल्ली की वास्तविक चिंता किसी और बात को लेकर है. यासीन जैसे व्यक्ति में विरोध करने का ऐसा माद्दा था कि 1994 में जब उग्रवाद अपने चरम पर था, वे अपने ही लोगों के खिलाफ खड़े हो गए. शांति का रास्ता अपनाने वाला अब जेल में है. ऐसे में आशंका है कि यहां अब बंदूक एकमात्र विकल्प न बन जाए. 

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