अदीब चेतन भगत की तरह जो लोग अंग्रेजी को एक नई जाति व्यवस्था के निर्माण का दोषी ठहराते हैं, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और समान अवसर की भाषा होने के नाते अंग्रेजी ने पिछली तीन सदियों से हिंदुस्तान के अपने देशज जाति उत्पीडऩ, राजनैतिक निरंकुशता और धार्मिक रूढ़िवाद से लडऩे में अहम भूमिका अदा की है.
उन्हें पूरी विनम्रता से अपने आप से पूछना चाहिए कि करोड़ों दलितों ने हिंदू और मुसलमान, दोनों हुक्मरानों के अधीन दो हजार साल से चले आ रहे अत्याचारों से मुक्ति के लिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर के नेतृत्व में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी उदारवाद की शरण क्यों ली? कई दलित आज भी अंग्रेजी को अपनी शिक्षा की देवी मानते हैं. इसी तरह वे 1830 के दशक में अंग्रेजी को भारत में लाने वाले विक्टोरिया काल के विद्वान लॉर्ड मैकॉले की इज्जत करते हैं और उनके जन्मदिन 25 अक्तूबर को अंग्रेजी दिवस के रूप में मनाते हैं.
मैकॉले विचारधारा के तकाजों की बजाए व्यावहारिक मकसदों से ज्यादा प्रेरित थे. ब्रितानी हुक्मरानों को तमिलनाडु, बंगाल और महाराष्ट्र सरीखे अलग-अलग भाषाओं वाले क्षेत्रों में हुकूमत करने के लिए एक संपर्क भाषा की जरूरत थी. तकरीबन दो सदियां बीतने के बाद भी अंग्रेजी की वह प्रशासनिक अनिवार्यता न सिर्फ आज भी कायम है, बल्कि पहले से ज्यादा बढ़ गई है. केंद्र सरकार 70 साल से हिंदी को बढ़ावा देने के लिए जोरदार अभियान चलाती रही है. इसके बावजूद आज भी भारत की आधी से कम आबादी हिंदी बोलती है और देश के दक्षिणी तथा उत्तर-पूर्वी इलाकों में वह अंग्रेजी से ज्यादा पराई भाषा है.
क्या भारत में अंग्रेजीभाषी लोगों का एक कुलीन तबका है, जो दूसरों का दमन करता है? अगर आप हिंदुस्तान के आधुनिक इतिहास को देखें, तो सचाई इसके उलट है. मैकॉले ने तभी यह सही-सही अनुमान लगा लिया था कि अंग्रेजी की बदौलत हिंदुस्तानी लोग विज्ञान, चिकित्सा और टेक्नोलॉजी में होने वाली वैश्विक प्रगति की मालूमात कर सकेंगे. वक्त ने उन्हें सही साबित किया है. आज स्कैंडेनेविया से लेकर चीन तक तमाम देश अंग्रेजी को अपनी उच्च शिक्षा की भाषा के तौर पर अपना रहे हैं.
मैकॉले ने यह भी देख लिया था कि अंग्रेजी भारत में उदार राजनैतिक और आर्थिक विचार फैलाएगी और आखिरकार हिंदुस्तानियों को अपने ब्रितानी हुक्मरानों की राजनैतिक बराबरी में ला खड़ा करेगी. इतिहास ने फिर उन्हें सही साबित किया. यही वजह थी कि पश्चिमी शिक्षा में पले-बढ़े वकीलों ने भारत को आजादी दिलाई और सेकुलर जम्हूरियत के तौर पर कायम किया. यहां तक कि उन्होंने वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित संसद को स्वीकार किया.
भारत के औपनिवेशिक काल से पहले के इतिहास में मैग्ना कार्टा सरीखी घटना दूसरी नहीं है. अंग्रेजी नहीं होती, तो भारत के लिए कानून की हुकूमत को अपनाना काफी मुश्किल होता, क्योंकि इससे पहले मुल्क में इस अवधारणा की कोई वाकफियत ही नहीं थी. उस वक्त मनमाने दस्तूरों और धार्मिक निषेधों की व्यवस्था लागू थी, जो कानून की हुकूमत से बिल्कुल अलहदा थी. इसी तरह, कानून के आगे सभी की बराबरी पर आधारित न्यायिक व्यवस्था भी नहीं होती, क्योंकि यह भी उतनी ही विदेशी अवधारणा है.
और आखिर मेः आम जबान की तौर पर अंग्रेजी के जरिए मुल्क को जोडऩे वाली औपनिवेशिक हुकूमत नहीं होती, तो राजनैतिक इकाई के तौर पर हिंदुस्तान का कोई वजूद नहीं होता. ज्यादा मुमकिन यही था कि यह उपमहाद्वीप आपस में झगड़ते सूबों में बंटा होता, जिनमें से कुछ में जरूर शायद जम्हूरियत होती. हिंदुस्तान के महानतम इतिहासकारों में से एक के.एम. पणिक्कर के लफ्जों को मैकॉले की विरासत पर अंतिम फैसला माना जा सकता है. उन्होंने लिखा है, ‘‘यह इसी शख्स की महान प्रतिभा का नतीजा है कि आधुनिक भारत मौजूदा शक्ल अख्तियार कर सका. वे हिंदुस्तान के नए मनु थे, आधुनिक कानून के जिस्म में रूह की तरह.’’
आज के अंग्रेजीभाषी कुलीन, पुराने ब्राह्मणों और क्षत्रियों से उलट हिंदुस्तानी समाज का ऐसा हिस्सा हैं जो जोरदार तरीके से फैल रहा है और काबिलियत पर जोर देता है. आबादी में इनकी तादाद तकरीबन 12 फीसदी है, जो हमारे तेजी से बढ़ते मध्य वर्ग के कमोबेश बराबर है. गरीब परिवारों के लिए अंग्रेजी सफेदपोश नौकरियों के लिए पासपोर्ट का काम कर रही है. अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई अब एक छोटे-से, वंशानुगत सत्ताधारी तबके की बपौती नहीं रह गई है, बल्कि कामकाजी तबके के परिवार विकल्प की तौर पर इसे अपना रहे हैं.
इसका भी कोई सबूत नहीं है कि अंग्रेजी देसी भाषाओं को नुक्सान पहुंचा रही है. अंग्रेजी बोलने वाले ज्यादातर हिंदुस्तानी अपनी घरेलू जिंदगी में ‘‘देसी’’ भाषाओं का प्रयोग करते हैं. उनकी अंग्रेजी भी प्राचीन औपनिवेशिक कुलीनों की मूल अंग्रेजी से काफी अलग है. इसीलिए इसे हिंग्लिश कहा जाता है. यह बिल्कुल आम बोलचाल के लहजे में बोली जाती है और उस खौफनाक संस्कृतनिष्ठ हिंदी की तरह नहीं है जिसे 20वीं सदी के मध्य में बनावटी तरीके गढ़कर हम पर थोप दिया था.
हमारी अंग्रेजी की विरासत की जो सबसे बेशकीमती चीज है, ठीक उसी की वजह से इसे धार्मिक और सांस्कृतिक कट्टरपंथियों के हमलों का शिकार होना पड़ता है. अंग्रेजी जबान उदार, सेकुलर और वैज्ञानिक विचारों को शक्ल देती है. इसमें वैसा बोझ्लि और बेढंगा शब्दाडंबर भी नहीं है, जो हिंदीवालों को हमारे संविधान की बुनियादी बातों को समझाने के लिए गढऩा पड़ा था.
अंग्रेजी दुनिया भर की हलचलों, विचारों और टेक्नोलॉजी की तरफ खुलने वाली हमारी खिड़की है और संकीर्ण राष्ट्रवाद तथा स्वेच्छाचारी हुकूमत के खिलाफ हमारा सुरक्षाकवच भी. आज असली खाई अंग्रेजीभाषी और गैर-अंग्रेजीभाषी हिंदुस्तानियों के बीच नहीं है, बल्कि उदार, विश्व-बंधु और आधुनिक समाज तथा हमें अंधकार के युग में वापस ले जाने पर आमादा हिंदू तथा मुस्लिम धार्मिक उग्रवादों के बीच है.
(ज़रीर मसानी मैकॉलेः पायनियर ऑफ इंडियाज मॉर्डनाइजेशन के लेखक हैं.)
ज़रीर मसानी