हिमालय पर गहमागहमी

पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना (पीएलए) की घुसपैठ और दोनों तरफ से सेनाओं के भारी जमावड़े का नतीजा यह हुआ कि 50 साल में पहली बार एलएसी पर हालात बेहद विस्फोटक हो गए हैं

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हमेशा तैयार सेना प्रमुख जनरल नरवणे (बाएं से दूसरे) अग्रिम मोर्चे के दौरे के वक्त रेचिन ला में हमेशा तैयार सेना प्रमुख जनरल नरवणे (बाएं से दूसरे) अग्रिम मोर्चे के दौरे के वक्त रेचिन ला में

संदीप उन्नीथन

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2021,
  • अपडेटेड 9:26 PM IST

वर्ष 2020 में भारत के सामने आने वाली चुनौतियों में केवल कोविड की महामारी ही नहीं थी बल्कि पूर्वी लद्दाख की सीमा पर राष्ट्रीय सुरक्षा भी बड़ी चुनौती रही. पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की ओर से बार-बार होने वाला अतिक्रमण 1962 के युद्ध के बाद से 1,597 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को बलपूर्वक बदलने का सबसे बड़ा प्रयास रहा है. पीएलए के सैनिक देपसांग के मैदानी इलाके और तीन अन्य जगहों पर अपना दावा जताने के लिए आगे बढ़ आए.

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इन जगहों में बूमरैंग के आकार वाली सुंदर पैंगांग झील के किनारे भी शामिल हैं. इन घुसपैठों के कारण 15 जून को गलवान घाटी में हिंसक झड़प हो गई, जिसमें कमांडिंग अफसर कर्नल संतोष बाबू समेत 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे. इस झड़प में पीएलए के भी अज्ञात संख्या में सैनिक मारे गए. 1967 में नाथू ला और सिक्किम में चो ला में हुई झड़पों के बाद यह सबसे बड़ा टकराव था. इसके बाद अगस्त महीने के आखिर में भारतीय सेना के विशेष बलों, जिनमें तिब्बती फाइटर्स शामिल थे, जवाबी कदम के तौर पर झील के दक्षिणी छोर पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊंचाई वाली जगहों पर कब्जा जमा लिया, जहां से चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी.

आठ महीने से दोनों सेनाएं आमने-सामने हैं. दोनों ही सेनाओं में लगभग एक लाख सैनिकों को 12,000 फुट की ऊंचाई पर तैनात कर दिया गया है. कुछ जगहों जैसे रेचिन ला, जहां सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे ने हाल ही में दौरा किया था, में सैनिक टुकड़ियां और टैंक महज कुछ सौ मीटर की ही दूरी पर हैं.

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नई दिल्ली के लिए अचंभे की बात यह थी कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बेल्ट ऐंड रोड परियोजना से अलग रहने और चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का विरोध करने के बावजूद दोनों देशों के संबंध पहले के मुकाबले बेहतर बने हुए थे. इसकी वजह शायद यह थी कि जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कई बैठकें हो चुकी थीं.

दोनों के बीच ममल्लपुरम में दूसरी मुलाकात मई में हुए अतिक्रमण से महज सात महीना पहले ही हुई थी. सरकार के एक प्रमुख अधिकारी का मानना है कि चीन की इस आक्रामकता का मकसद पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में अपने हितों की रक्षा करना था क्योंकि वह नई दिल्ली को यह दिखाना चाहता था कि एशिया में वह सबसे बड़ी ताकत है.

भारत ने संकेत दे दिया है कि वह अप्रैल 2020 की जमीनी स्थिति को बहाल करने से कम पर बिल्कुल भी राजी नहीं है. उसने भारतीय बाजार में चीन की पैठ पर लगाम लगाने के कई कदम उठाकर जवाबी कार्रवाई की है जैसे स्मार्टफोन के ऐप्स से लेकर चीन में बने टेलीकम्युनिकेशन के उपकरणों पर रोक लगाना. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और चीन के बीच संबंधों को ''काफी क्षतिग्रस्त'' बताया और कहा कि ये संबंध दोबारा तभी बेहतर हो सकते हैं जब चीन सेना को पीछे हटा ले. हालांकि दोनों ही पक्ष कड़ाके की सर्दियों में अभी खामोश हैं, लेकिन यह देखना होगा कि अगले साल कौन पहले पलक झपकाता है.

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