पाकिस्तान से आई सीमा हैदर का मामला तूल पकड़ रहा है. कथित तौर पर ऑनलाइन गेम खेलते हुए उन्हें भारतीय युवक सचिन से प्यार हो गया, और वे सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देते हुए देश आ गईं. इस बीच बहुत से एक्सपर्ट मान रहे हैं कि कहानी उतनी सीधी या मोहब्बत से भरी हुई नहीं है, बल्कि युवती पाकिस्तानी जासूस हो सकती है. ऐसा होना असंभव भी नहीं. जासूसी में हनीट्रैप एक बड़ा गुर है, जिसके बारे में मौर्य साम्राज्य के महामंत्री चाणक्य ने भी बात की थी. अपनी किताब कौटिल्य अर्थशास्त्र में उन्होंने जासूसी की कैटेगरी तक बताई.
मौर्य काल में गुप्तचर बहुत कॉमन थे
कौटिल्य यानी चाणक्य का मानना था कि राजा की पहुंच भीतर तक रहे, इसके लिए जासूस सबसे जरूरी सोर्स हैं. तब माइक्रोस्कोप या हिडेन कैमरा लिए स्पाई नहीं होते थे. वे लोग आम लोगों की तरह दिखते और उन्हीं में घुलमिलकर सारे राज निकाल लेते थे. यहां तक कि कौटिल्य ने जासूसों के लिए वेतन और बढ़िया लाइफस्टाइल की भी बात की ताकि वे संतुष्ट रहें और राजा का काम होता रहे.
इस-इस तरह के होते थे भेदिए
गुप्तचरों को उन्होंने दो मोटे भागों में बांटा. एक स्थाई गुप्तचर होते हैं, जो एक ही जगह पर रहकर काम करते. दूसरी श्रेणी भ्रमणशील जासूसों की, जो यहां से वहां घूमते हुए राज निकाला करते थे. इनकी भी कई सब-कैटेगरी होती.
रूप बदलकर रहा करते थे लोगों के बीच
कापटिक गुप्तचर के नाम से ही जाहिर है कि वो कपट यानी धोखे से काम बनाता. ये आमतौर पर प्रजा और व्यापारियों के हर वर्ग में होते. खूब बात करके लोगों को अपना बनाते, और उनके मन की बात जान लेते थे. इनका काम ये भी पता लगाना था कि प्रजा राजा को लेकर क्या सोच रखती है, या क्या राजा के खिलाफ कोई षड्यंत्र हो रहा है.
किसानों के बीच भी जासूस होते थे
गृहपतिक श्रेणी में वे जासूस होते थे, जो सीधे-सादे, आमतौर पर किसान के रूप में होते. गांव से लेकर पूरे राज्य में ये फैले होते. इनका काम किसानों के दुख-दर्द मंत्री या फिर सीधे राजा तक पहुंचाना था. ये जासूस परिवार में रहते और भेद लेना ही नहीं, राजा के लिए किसानों में अच्छी भावनाएं जगाना भी इनके जिम्मे होता.
एक कैटेगरी तापस गुप्तचर कहलाती
ये साधु के भेष में रहते. ऐसे लोगों के पास आम और खास दोनों तरह के लोग आते. ऐसे में तापस ध्यान देते कि कहां, क्या चल रहा है. लोगों में अपनी तपस्वी वाली इमेज बनाने पर भी इनका फोकस रहता. वे सबके सामने मुट्ठी भर अनाज या फल खाते. परिवार से दूर रहते. लेकिन बीच-बीच में छिपकर सामान्य जीवन जीने की भी इन्हें इजाजत थी.
ज्योतिष के जानकार भी करते जासूसी
जासूसों की एक खास श्रेणी वो थी, जिसमें ज्योतिष, तंत्र-मंत्र के जानकार रहा करते. ये जासूस अक्सर राजमहल या राजपरिवार के बीच रहते हुए राजा के लिए भेदिए का काम करते. सत्री गुप्तचरों में स्त्रियां भी होती थीं. वे गीत, नृत्य की कला जानतीं. उन्हें लोगों को अपनी बातों और चेहरे-मोहरे से वश में करना आता था. अक्सर राजपरिवार में ही राजा के कई दुश्मन होते थे, सत्री का काम ऐसे लोगों को पहचानकर उन्हें सजा दिलवाना था.
इस तरह की महिलाएं बनती थीं जासूस
महिला जासूसों की बात करें तो कौटिल्य के दौर में परिव्राजिका भी हुआ करती थीं. ये आमतौर पर बाल-विधवाएं होतीं, जो अच्छे कुल से जुड़ी होती थीं. ये बड़े-बड़े लोगों के बीच उठते-बैठते हुए उनके भेद भी जान लेती थीं. कई बार घरों में साफ-सफाई, पानी भरने, केश सज्जा करने, या रसोई पकाने का काम करने वाली महिलाएं भी जासूसी का काम करतीं. लेकिन इनका राजा से सीधा संपर्क नहीं होता था, बल्कि मंत्री इनकी बात सुनते थे.
कौन होती थीं विषकन्याएं
कौटिल्या अर्थशास्त्र में चाणक्य ने राजा को विषकन्याओं को रखने की भी सलाह दी. ये वे महिलाएं होती थीं, जिनपर जहर का असर नहीं होता था, लेकिन जो अपने-आपमें काफी घातक होती थीं. ये महिलाएं गीत-नृत्य, भंगिमाओं में काफी आकर्षक होतीं. विषकन्याएं आम लोगों के बीच काम नहीं करती थीं, बल्कि उनके टारगेट बड़े होते थे, जैसे दुश्मन देश के मंत्री, सेनापति.
कई गुप्तचर खुद को दिव्यांग दिखाकर भी जासूसी करते
वे अंधे, बहरे, या गूंगे होने का दिखावा करते हुए लोगों से संवेदना पाते, उनके बीच रहते. ऐसे लोगों को कोई खतरनाक नहीं मान पाता था, और आसानी से राज की बात निकल जातीं. हालांकि इस तरह का जासूस होना आसान नहीं था. शरीर के सही-सलामत होने के बाद भी कोई अंग खराब होने की एक्टिंग के लिए जासूसों को ट्रेनिंग भी मिलती.
एक खास श्रेणी में वो जासूस होते, जो दूसरे राज्यों या देशों में काम करते. उन्हें उभयवेतन कहा जाता था. ये दूसरी जगह काम करते हुए वहीं के होने का दिखावा करते, लेकिन असल में ये डबल एजेंट की तरह होते थे.
कोड लैंग्वेज में होता था इंफॉर्मेशन-एक्सचेंज
हर श्रेणी के जासूसों के लिए एक अलग संस्था थी. इसमें अधिकारी होते, जो बाकी स्टाफ पर नजर रखते. यही उन्हें वेतन भी देते. अगर कोई जासूस किसी काम का नहीं है, या फिर लगातार गलत सूचना ला रहा हो तो उसे नौकरी से भी हटाया जा सकता था. कौटिल्य के अर्थशास्त्र की मानें तो तब भी जासूसों के पास एक खास स्क्रिप्ट होती थी, जिसे उनके विभाग के अलावा कोई समझ न सके. ये आजकल की कोड लैंग्वेज की तरह ही है. हालांकि ये लिपि क्या थी, इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता.
इस तरह तैयार होती थीं घातक महिला जासूस
थोड़ी जानकारी विषकन्याओं पर भी लेते चलें. इसके लिए राज्य की सबसे खूबसूरत बच्चियों को छांटा जाता था. ये वे बच्चियां होती थीं जो राजाओं की अवैध संतानें होती थीं, जैसे दासियों से साथ मेल से आई संतानें. या फिर अनाथ बच्चियां. इन्हें राजमहल के ही एक हिस्से में रखकर देखाभाला जाता. नृत्य-गीत और पहनने-ओढ़ने की सबसे अच्छी ट्रेनिंग मिलती. साथ में रोज खाने के साथ थोड़ी मात्रा में जहर दिया जाता. धीरे-धीरे जहर की मात्रा बढ़ाई जाती थी.
इस प्रक्रिया में कई बच्चियां विकलांग भी हो जातीं. उन्हें छोड़कर बाकी स्वस्थ लड़कियों को ट्रेनिंग मिलती रहती, जब तक कि वे घातक न बन जाएं. कहा जाता है कि युवा होते-होते वो इतनी जहरीली हो जातीं कि उनके शरीर का स्पर्श भी जानलेवा हो जाया करता. इन्हीं से जासूसी करवाई जाती.
जहरीला बनाने की प्रोसेस को मिथ्रिडायटिज्म कहते हैं
इसमें शरीर में धीरे-धीरे जहर डालकर उसे जहर के लिए इम्यून बनाते थे. लेकिन ये प्रोसेस हर कोई या हर तरह के विष के साथ नहीं होती थी. ट्रेंड वैद्य ही कुछ खास तरह के जहर से इसकी शुरुआत करते. कहते हैं कि ग्रीक राजा सिकंदर जब दुनिया जीतने निकला था तो उसके गुरु अरस्तू ने उसे भारत की विषकन्याओं के बारे में आगाह किया था.
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