E-Agenda Aaj Tak: जानिए- कोरोना से लड़ाई में प्लाज्मा थेरेपी कैसे कारगर, क्या रहा है इतिहास?

आज तक के ई-एजेंडा कार्यक्रम के दूसरे सत्र ‘जान है तो जहान है’ में डॉ. नरेश त्रेहन, सीएमडी, मेदांता, डॉ. राजेश पारिख, डायरेक्टर, मेडिकल रिसर्च, जसलोक अस्पताल, डॉ. अरविंद कुमार, चेयरमैन, इंस्टीट्यूट ऑफ रोबोटिक सर्जरी, सर गंगाराम अस्पताल, शामिल हुए. जानिए- इस सेशन में बताया गया प्लाज्मा थेरेपी का इतिहास.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 1:41 PM IST

आज तक के ई-एजेंडा कार्यक्रम के दूसरे सत्र ‘जान है तो जहान है’ में डॉ. अरविंद कुमार, चेयरमैन, इंस्टीट्यूट ऑफ रोबोटिक सर्जरी, सर गंगाराम अस्पताल ने कहा कि आज सबसे ज्यादा प्लाज्मा थेरेपी पर बात हाे रही है. लेकिन आपको बता दें कि प्लाज्मा थेरेपी का इतिहास सौ साल पुराना है.

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उन्होंने इसके लिए नोबल प्राइज पाने वाले वैज्ञानिक के बारे में भी बताया. बताया कि जर्मन वैज्ञानिक एमिल वॉन बेरिंग ( Emil von Behring) ने इसकी शुरुआत की थी. इसके लिए उन्होंने खरगोश में डिप्थीरिया का वायरस डाला,उसमें एंटीबॉडीज डाली गई फिर वो एंटीबॉडीज बच्चों में डाली गई. इसीलिए एमिल को सेवियर ऑफ चिल्ड्रेन कहा जाता है. बता दें कि दिल्ली में अब तक चार कोरोना मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया गया है, जिसका पर‍िणाम सकारात्मक रहा है.

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जानें कैसे होता है इस थेरेपी से इलाज

ज‍िस व्यक्त‍ि को एक बार कोरोना हो जाता है इलाज के बाद उसके रक्त में एंटीबॉडीज आ जाएगी. डॉक्टर ने बताया कि अब उसके ब्लड से प्लाज्मा न‍िकालकर वो कोरोना पेशेंट को दिया जाए तो वो उसे ठीक होने में हेल्प करेगा. इस तरह ठीक हो गए पेशेंट से बीमार को देकर उसे ठीक कर सकते हैं.

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यूएस में भी हो रहे ट्रायल

ये ट्रीटमेंट स्ट्रेटजी अमेरिका के दो सेंटर में ट्राई की गई, इंडिया में भी इस पर काम हो रहा है. इसमें सबसे जरूरी है कि ठीक हो गए लोगों को आगे आना चाहिए.

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ये होगी पूरी प्रक्र‍िया

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अगर कोई स्वेच्छा से रक्तदान के लिए आता है तो सबसे पहले उनका टेस्ट होगा. ये देखा जाएगा कि उनके खून में किसी प्रकार का संक्रमण तो नहीं है. मसलन शुगर, एचआइवी या हेपेटाइट‍िस तो नहीं है. अगर ब्लड ठीक पाया गया तो उसका प्लाज्मा निकालकर आईसीयू के पेशेंट को दिया जाए तो वो ठीक हो सकता है.

जानें- इस सेशन में किसने क्या कहा

सर गंगा राम अस्पताल के डॉ. राजेश पारिख ने कहा कि लॉकडाउन के बाद भी अगले कई महीने तक सोशल डिस्टेंसिंग, फेस कवरिंग का विशेष ध्यान रखना होगा. डॉक्टर अरविंद कुमार ने कहा कि अगर 40 के ऊपर के तापमान में कोरोना वायरस जिंदा नहीं रहता तब भी खतरा कम नहीं होगा क्योंकि हम में से ज्यादातर लोग 40 डिग्री तापमान से कम गरम माहौल में अपने घरों-दफ्तरों या दुकान में रहते हैं. ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और हाथ धोने से ही पूरी तरह बचाव संभव है.

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इस सेशन में डॉ. नरेश त्रेहन ने कहा कि मरीजों की संख्या अब कम बढ़ रही है, लॉकडाउन को चरणों में खोलना चाहिए. चरणों में लॉकडाउन खोलने से हालात की जानकारी मिलेगी. उन्होंने कहा कि रेड जोन में अभी पूरी तरह पाबंदी रहनी चाहिए. रेड जोन जब तक ग्रीन जोन में न बदल जाएं वहां कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए.उन्होंने कहा कि जनता का व्यवहार अगर सही है को लॉकडाउन खोलना चाहिए. हालांकि, हॉटस्पॉट इलाकों में अभी लॉकडाउन रहना चाहिए.

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