आयुष्मान खुराना की फिल्म ड्रीम गर्ल सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. इस फिल्म का इंतजार फैंस को काफी समय से था. फिल्म के ट्रेलर, प्रोमो और गानों को जनता का खूब प्यार मिला. इतना ही नहीं बॉलीवुड के सेलेब्स ने भी इस फिल्म को देखने के बाद इसकी खूब तारीफ की. इतनी तारीफ सुनने और दिलचस्प ट्रेलर और प्रोमो देखने के बाद फिल्म को देखने के उत्साह का बढ़ना लाजमी है.
लेकिन आयुष्मान खुराना की फिल्म ड्रीम गर्ल देखने से पहले आपके लिए कुछ बातें जानना जरूरी है. इस फिल्म में बहुत सी कमियां हैं, जो इस फिल्म को उम्मीद से थोड़ा खराब बनाती हैं. आइए आपको बताते हैं इनके बारे में-
खराब स्क्रीनप्ले और ट्रीटमेंट
फिल्म की लोकेशन से लेकर रफ्तार और राइटिंग सब चीजों में कमी साफ दिखती है. धीमी रफ्तार से शुरू हुई ये फिल्म कभी भी एक पेस नहीं पकड़ पाती. कभी ये तेज चलती है तो कभी धीमी पड़ जाती है. इतना ही नहीं बहुत सी जगह पर ये फालतू का ज्ञान भी देती है. इसके अलावा कुछ सीक्वेंस कहीं से कहीं पहुंच जाते हैं. एक सीन के बीच में गाने का आ जाना काफी अजीब लगता है. इसके अलावा फिल्म का क्लाइमेक्स बिल्कुल भी मजेदार नहीं था. इसमें उलझन, उथल-पुथल और मजा दिखाने की कोशिश की गई लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ.
अच्छे एक्टर्स की बर्बादी
अन्नू कपूर, राजेश शर्मा और अभिषेक चैटर्जी बॉलीवुड के कुछ बढ़िया एक्टर्स में से एक हैं. हम सभी ने अन्नू कपूर और आयुष्मान खुराना की जोड़ी को फिल्म विक्की डोनर में कमाल करते देखा भी है. लेकिन इस बार अन्नू के किरदार को उतने बढ़िया ढंग से पेश नहीं किया गया. अन्नू कपूर को जो स्क्रीन टाइम मिला उसमें उन्होंने कमाल जरूर किया. अभिषेक बैनर्जी और राजेश शर्मा को भी हम सभी ने अच्छा काम करते देखा है. ऐसे में इन दोनों को थोड़ा और स्क्रीन टाइम दिया जाता तो कमाल हो जाता.
ह्यूमर
आयुष्मान खुराना की फिल्मों को उनके बढ़िया ह्यूमर और कॉमेडी की वजह से ही जाना जाता है. फिल्म बधाई हो के सुपरहिट होने का कारण उनकी बढ़िया कॉमेडी ही थी. इसके अलावा हम सभी ने आयुष्मान को पिछले काफी समय में बढ़िया फिल्मों को चुनते हुए देखा है. लेकिन ड्रीम गर्ल उनकी बाकी सभी फिल्मों से अलग है. इस फिल्म में आपको अच्छे जोक्स तो मिलेंगे लेकिन इसके साथ आपको सेक्सिएस्ट जोक्स और कुछ बेहूदा बातें भी देखने को मिलेंगी. इसके अलावा बहुत सी बार ऐसा भी हुआ है जब फिल्म आपको हंसाने की नाकाम कोशिश भी करती है. यही बातें इस फिल्म को एंटरटेनिंग कम और सिर दर्द ज्यादा बनाती हैं.
स्टीरियोटाइप
इस फिल्म में भी वही कमी है जो बहुत सी फिल्मों में हम देखते आए हैं. इसमें लोगों को और चीजों को स्टीरियोटाइप किया गया है. एक मुस्लिम इंसान से प्यार करने लगे तो अपना धर्म बदल लेंगे, उर्दू बोलने लगेंगे, कुर्ता पायजामा पहनकर सफेद साफा डाल लेंगे, घर को हरा रंगा लेंगे और इत्र की दुकान खोल लेंगे. क्योंकि नॉर्मल मुस्लिम इंसान ऐसा ही होता है, हैं ना? यही बातें इस फिल्म को निराशाजनक बनाती हैं.
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