इनारितू: सिनेमा का एक सुंदर अध्याय

आज जिस इनारितू को 52 की उम्र में द रेवेनेंट के लिए ऑस्कर मिला है, वे अपनी पहली ही फिल्म अमोर्स पेरोस के लिए ऑस्कर नामांकन पा चुके थे (विदेशी भाषा की फिल्म वाली श्रेणी में).

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द रेवेनेंट का एक सीन द रेवेनेंट का एक सीन

सूरज पांडेय / शिवकेश मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2016,
  • अपडेटेड 10:22 AM IST

अलेहांद्रो गोंजालेज़ इनारितू तब 37 बरस के थे. मेक्सिको सिटी में अरसे तक एक रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर रहने और कुछेक फिल्मों में संगीत देने के बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाई थी 'अमोर्स पेरोस'.

कुओं की लड़ाई को पृष्ठभूमि में रखते हुए उन्होंने मैक्सिको सिटी में सतह के नीचे खदबदाते असंतोष और तनावपूर्ण रिश्तों को पैनी नजर से पकड़ा था. फिल्म का नाम स्पैनिश की बजाए अंग्रेजी में कर देने से उन्होंने साफ इनकार कर दिया. अनुवाद करें तो उस शीर्षक का ढीला-ढाला अर्थ था इश्क कमीना.


रिलीज होते ही फिल्म ने हंगामा मचा दिया. कुत्तों और मनुष्यों के रिश्तों में गुंथा मैक्सिकन ङ्क्षजदगी का इतना सच्चा, ग्राफिकल और जज्बाती किस्सा! फिल्म देखने के बाद हॉलीवुड के शीर्ष अभिनेताओं में से एक शॉन पेन ने बधाई देने के लिए इनारितू को फोन लगाया, 'हाय, दिस इज़ शॉन पेन.' शॉन पेन और मुझे फोन! इस मैक्सिकन निर्देशक के लिए यह पूरी तरह से अप्रत्याशित था. उनको लगा कि जरूर कोई मजाक कर रहा है. उन्होंने लहजे में जवाब ठोंका, 'श्योर, ऐंड आइ एम मर्लन ब्रांडो.'

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दोनों की इस बातचीत और फिर बनी दोस्ती का नतीजा यह निकला कि इनारितू की अगली फिल्म 21 ग्राक्वस में शॉन पेन अभिनय कर रहे थे. किसी मनुष्य के मरने पर उसका वजन 21 ग्राम ही कम होता है. यानी आत्मा का बस इतना वजन? 21 देखते हुए आप इसकी परतें महसूस कर सकते हैं.


आज जिस इनारितू को 52 की उम्र में द रेवेनेंट के लिए ऑस्कर मिला है, वे अपनी पहली ही फिल्म अमोर्स पेरोस के लिए ऑस्कर नामांकन पा चुके थे (विदेशी भाषा की फिल्म वाली श्रेणी में). अपनी इस छठी फिल्म में उन्होंने शून्य से भी नीचे के तापमान वाले बैकड्रॉप में प्रतिशोध का, ऊष्मा से भरा ऐसा किस्सा रचा है कि देखते हुए आपकी रूह कांप उठे.

मरे घोड़े की आंतें निकालने के बाद उसमें घुसकर बैठे लियोनार्डो डिकैप्रियो के सीले, गंदले चेहरे पर आप मनुष्य के प्राण रक्षा कर पाने के उपक्रम से मिले सुकून को साफ महसूस कर सकते हैं.

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यह महसूसियत अनायास नहीं थी. युवावस्था में सात्र्र और दूसरे अस्तित्ववादियों को घोंटने-पीने वाले इनारितू की रगों में वह जज्बा समाया हुआ था. पूरी फिल्म इनारितू की जिद के एक अलग किस्से को बयान करती है. एक दृश्य में आदिम लोगों से बचकर अमेरिकी फर ट्रैपर्स की टोली नाव पर भागती है. एक नदी पर इस दृश्य को फिल्मा भी लिया गया.

लेकिन इनारितू को बार-बार लगता रहा कि दृश्य में नदी और आसपास के परिवेश में भव्यता और एक तरह की शांति तारी है. वहां कोई दुश्वारी, कोई चुनौती नहीं महसूस हो रही, जो कि कथानक की मांग थी. पूरे दृश्य को उन्होंने कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के एक निहायत चुनौती भरे इलाके में जाकर, बजट बढ़ जाने की कीमत पर भी दोबारा फिल्माया.

जबरदस्त होती है इनारितू की किस्सागोई
इनारितू की किस्सागोई का अंदाज निराला रहा है. उनकी फिल्मों में तीन-चार कथानक चलते हुए एक ङ्क्षबदु पर आकर मिल जाते हैं. ये सभी एक ही कहानी का हिस्सा और साथ ही साथ एक स्वतंत्र किस्से की तरह भी होते हैं.

थोड़ा आसान भारतीय संदर्भों में समझना हो तो आप रामचरित मानस को देख सकते हैं, जिसमें शिव पार्वती को, याज्ञवल्क्य भारद्वाज को और कागभुसुंडि गरुड़ को राम का चरित्र सुनाते हैं. ये सब मानस के सूत्रधार भी हैं और उसकी कथा में गहरे धंसे किरदार भी. इनारितू की यह शैली अलग से लिखे जाने की मांग करती है.

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मैक्सिको से निकलकर सिनेमा के विश्व नागरिक बन चुके इस फिल्मकार के अगले किस्से का अब दुनिया भर के सिनेप्रेमी बेसब्री से इंतजार करेंगे.

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