Movie Review: सपनों को जिंदा रखने की कहानी है निल बटे सन्नाटा

स्वरा भास्कर की फिल्म 'निल बटे सन्नाटा' आज रिलीज हो गई है. लड़की की शिक्षा और मां-बेटी के संबंधों को लेकर बनी इस फिल्म का रिव्यू...

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नरेंद्र सैनी / पूजा बजाज

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  • 22 अप्रैल 2016,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

रेटिंगः 4 स्टार

डायरेक्टरः अश्विनी अय्यर तिवारी

कलाकारः स्वरा भास्कर, रत्ना पाठक शाह, रिया शुक्ला और पंकज त्रिपाठी

पंजाबी कवि पाश की कुछ पंक्तियां हैः 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना.' अगर सपने मर जाएं तो इनसान कुछ नहीं है. इनसान के सपनों के मर जाने से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. अगर उस सपने को जिंदा करने में हमारी मां हमारा सहारा बन जाए और प्रेरणा बन कर सामने आएं तो उससे हसीन कुछ नहीं. जिंदगी की हकीकत से रू-ब-रू कराती ऐसी ही फिल्म है 'निल बटे सन्नाटा'. ये सिखाती हैं कि जिंदगी में कभी भी सपनों को निल न होने दें.

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बॉलीवुड अक्सर ऐसी फिल्में कम ही बनाता है, जिसमें वह हकीकत के धरातल पर रहकर सपनों को पाने की बात करे. 'निल बटे सन्नाटा' में एक कामकाजी गरीब मां स्वरा भास्कर है. वह जी-जान लगाकर अपनी बच्ची रिया शुक्ला की शिक्षा को जारी रखना चाहती है. वह रत्ना के घर पर काम करती है और वह हमेशा स्वरा को अपनी बेटी की शिक्षा के लिए प्रेरित करती रहती है. लेकिन बिटिया तो अपनी मां को देखकर इसी फंडे पर टिकी है कि जो मां-बाप होते हैं बच्चे वही करते हैं, उसी तरह वह काम करने वाली की बेटी है तो काम करने वाली ही बनेगी. स्वरा के लिए यह सबसे बड़ा शॉक है. अपनी बच्ची के मर चुके ख्वाब को जिंदा करने के लिए स्वरा भास्कर जी-जान से जुट जाती है. इस तरह फिल्म की खासियत इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट है. कुल मिलाकर लड़कियों की शिक्षा और मां-बेटी के संबंधों को लेकर बहुत ही मीठी-सी कहानी है.

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स्वरा भास्कर ने कमाल की एक्टिंग की है. उन्होंने कैरेक्टर में जान डाल दी है और सिद्ध कर दिया है कि एक्टिंग करने का हुनर उनके पास है. वह अपने कैरेक्टर में गहरे तक उतर जाती हैं और ख्वाबों से भरी एक मां नजर आती हैं. रत्ना शाह पाठक और रिया ने भी अच्छी एक्टिंग की है. पंकज त्रिपाठी भी फिल्म में जमे हैं. स्वरा भास्कर ने सिद्ध कर दिया है कि कंटेंट बेस्ड फिल्म चलाने का वह माद्दा रखती है और इसके लिए उन्हें किसी बड़ी स्टारकास्ट की जरूरत नहीं है.

फिल्म की खास बात यह है कि यह कहीं भी संदेश देते हुए नहीं लगती है. फिर इसके कई पड़ाव ऐसे हैं जो हमें अपने बचपन की याद दिला देते हैं. गणित के खौफ को जिंदा कर देते हैं. फिर अक्सर हमारे नंबर कम आने पर मां-बाप का चेहरा उतर जाना याद आता है और कई बार पिटाई भी. कुल मिलाकर 'निल बटे सन्नाटा' उथल-पुथल भरी फिल्म है, जिसे हर किसी को एक बार देखना ही चाहिए.

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