Laalo Krishna Sada Sahaayate Review: न ओवरड्रामा... न शोर, दिल से जुड़ती है 'लालो', कमाल है फिल्म

गुजराती सिनेमा का जादू हिंदी सिनेमा की दुनिया में छा चुका है, ये कहना गलत नहीं होगा. 50 लाख को छोटे से बजट में बनी फिल्म ‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’ ने अकेले गुजरात में ही 100 करोड़ का कलेक्शन कर लिया. इसकी तारीफ नॉर्थ तक पहुंची तो हिंदी में रिलीज करने की मांग हुई. फिर क्या था, हमने भी देख ही लिया कि फिल्म में क्या खास है. आइये आपको भी बताते हैं.

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कितनी असरदार है 'लालो'? (Photo: Screengrab) कितनी असरदार है 'लालो'? (Photo: Screengrab)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 09 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:27 PM IST
फिल्म:‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’
3.5/5
  • कलाकार : करण जोशी, रीवा रछ, श्रुहद गोस्वामी
  • निर्देशक :अंकित सखिया

गुजराती सिनेमा से आई फिल्म ‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’ ने वो कर दिखाया है, जो बड़े-बड़े बजट वाली फिल्में भी नहीं कर पातीं. महज़ 50 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने गुजरात में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर इतिहास रच दिया है. अब फिल्म हिंदी में रिलीज़ हुई है और साफ है कि इसका असर भाषा की सीमा से कहीं आगे जाता है. ये बताती है कि एक अच्छी कहानी कैसे अपनी सीमाएं लांघना जानती है.

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श्रीकृष्ण का लाल 'लालो'

फिल्म की कहानी एक आम आदमी लालो के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पेशे से ऑटो ड्राइवर है. उसकी जिंदगी संघर्षों से भरी है, वो कर्ज में डूबा हुआ है, लेकिन बजाए उन मुश्किलों को दूर करने के वो तथाकथित दोस्तों के कहने पर 'घर का मर्द' बनने चला है. वो जिम्मेदारियों से भागता नहीं है, लेकिन उन्हें निभाना भी नहीं जानता. वो भटका हुआ है. बावजूद इसके लालो को श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास है- यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है.

'मर्द' बनने का उसका ये गुरूर तब टूटता है, जब वो एक वीरान घर में फंस जाता है. यहां उसकी मदद के लिए आगे आते हैं- यशोदा के लाल श्रीकृष्ण. वो महाभारत कृष्ण की तरह उसे राह दिखाते हैं, सच के रास्ते पर लाते हैं, उसकी असल ताकत का एहसास कराते हैं. 

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घर की शोभा 'तुलसी' के पास है हर समस्या का हल 

फिल्म लालो के अलावा और भी कई पहलू पर बात करती है. इसमें से एक है तुलसी यानी लालो की पत्नी का किरदार. पति के गायब हो जाने के बाद वो खुद को कोसती है, हर किसी के आगे मदद को हाथ फैलाती है, फिर जिंदगी से हारकर खुद की और बेटी की जिंदगी खत्म करने का फैसला करती है. लेकिन गिरिधर गोपाल उसे भी राह दिखाते हैं. एहसास दिलाते हैं कि किसी के चले जाने से जिंदगी खत्म नहीं होती, एक महिला अपने आप में अपना घर संभालने में सक्षम है.

डायरेक्शन का कमाल

फिल्म का निर्देशन अंकित सखिया ने किया है और ये उनकी डेब्यू फिल्म है. पहली ही फिल्म में उन्होंने सादगी और संवेदनशीलता के साथ कहानी कही है. न ओवरड्रामा है, न जरूरत से ज्यादा भावुकता. यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनती है. अंकित ने फिल्म में ऐसे सीन कैप्चर किए हैं, जिन्हें देख आप खुद वाह कह उठेंगे. वो बखूबी कहानी के जरिए ये बताते हैं कि जब इंसान ईमानदारी से मेहनत करता है और भरोसा बनाए रखता है, तो मुश्किल वक्त में कोई न कोई रास्ता जरूर निकलता है. फिल्म बिना किसी भारी-भरकम उपदेश दिए, सीधे दिल को छू लेने वाली बात कही है.

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फिल्म में बेवजह किसी सीन को नहीं डाला गया है. हर सीक्वेंस कहीं ना कहीं जाकर एक दूसरे से मेल खाता है. लालो का फंसा होना तकलीफ देता है, कहीं कहीं आपको राजकुमार राव की ट्रैप्ड की याद भी आएगी, लेकिन यहां कहानी कहने का लहजा यहां उससे कहीं अलग है. एनिमल-धुरंधर के दौर में सादगी भरी फिल्म बीच में थोड़ी लचर लग सकती है, लेकिन उसमें फिल्म की कोई गलती नहीं है. हमें ही तेज चलने की आदत हो चुकी है. 

तह तक जाती अदाकारी  

करण जोशी लालो के किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं. एक आम ऑटो ड्राइवर की बेबसी, ईमानदारी और भरोसे को उन्होंने बेहद सहज तरीके से निभाया है. मजे की बात ये है कि वो रियल लाइफ में स्टैंड-अप कॉमेडियन भी हैं, लेकिन फिल्म में हास्य उन्हें छूकर भी नहीं गुजरता. वो अपनी संजीदगी से दिल जीत लेते हैं.

लालो की पत्नी तुलसी के रोल में रीवा रछ गहरा असर छोड़ती हैं. उनका किरदार घर और हालात के बीच सटीक संतुलन बनाए रखता है. एक मां की बेबसी, एक पत्नी की लाचारगी, मां-बाप से दुत्कारी गई तुलसी के किरदार में रीवा कैसे सशक्त नारी बनकर उभरती हैं, वो काबिल-ए-तारीफ है.

श्रुहद गोस्वामी ने श्रीकृष्ण की भूमिका को इतनी शांति और गरिमा के साथ निभाया है कि आपको उनका स्क्रीन प्रेजेंस सुकून देता है. सोशल मीडिया की जानकारी कहती है कि वो महज 25-26 साल के हैं, लेकिन चेहरे के भाव ऐसे हैं जैसे किरदार को घोलकर पी लिया हो. 

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म्यूजिक और सिनेमैटोग्राफी

फिल्म का संगीत इसकी भावनात्मक गहराई को और मजबूत करता है. गाने कहानी का हिस्सा लगते हैं, न कि रुकावट. बैकग्राउंड स्कोर सीन के मूड को अच्छे से पकड़ता है और असर बढ़ाता है. मन मोहन, मनोरथ जीव तो मेरे पर्सनल फेवरेट बन गए हैं. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी सादा लेकिन प्रभावशाली है. गुजरात की गलियां, आम लोगों की जिंदगी, मुर्तियों की चोरी जैसे छोटे-बड़े पल बड़े ही नैचुरल तरीके से दिखाए गए हैं. 

क्यों देखें?

अगर आप पॉजिटिव मैसेज वाली फिल्में पसंद करते हैं, अगर आप आस्था और संघर्ष की सच्ची कहानी देखना चाहते हैं, अगर आप बिना शोर-शराबे वाली, दिल से जुड़ने वाली फिल्म चाहते हैं, तो ‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’ जरूर देखें. ये फिल्म साबित करती है कि कंटेंट ही असली हीरो होता है और यही वजह है कि लालो आज करोड़ों दिलों की आवाज बन चुका है.

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