Good Luck Jerry review in Hindi: ड्रग्स सप्लायर बनीं Janhvi Kapoor, आपके 'गुड लक' की है खास जरूरत

Good Luck Jerry: गोलमोल कहानी में फंसी जाह्नवी कपूर की यह फिल्म भी दर्शकों के बीच कुछ खास कमाल न दिखा सकी. हालांकि, एक्टिंग स्किल्स में थोड़ा इम्प्रूवमेंट दिखा, लेकिन कहानी एकदम फूस्स. फिर भी अगर फिल्म देखना चाहते हैं, तो अपने मनोरंजन के लिए देख सकते हैं, लेकिन सावधान, पहले रिव्यू पढ़ लें...

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गुड लक जेरी, जाह्नवी कपूर गुड लक जेरी, जाह्नवी कपूर

खुशबू विश्नोई

  • नई दिल्ली,
  • 30 जुलाई 2022,
  • अपडेटेड 5:00 PM IST
फिल्म:कॉमेडी- थ्रिलर- ड्रामा
2.5/5
  • कलाकार : जाह्नवी कपूर, मीता वशिष्ठ, दीपक डोब्रियाल, सुशांत सिंह, नीरज सूद
  • निर्देशक :सिद्धार्थ सेन

Good Luck Jerry review: एक कहावत है, जिंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा. जाह्नवी कपूर की फिल्म 'गुड लक जेरी' इसी लाइन पर बनी है. परिवार को पालने और मां का लंग कैंसर का इलाज करने के लिए जेरी (जाह्नवी कपूर) उस खाई में कूद पड़ती हैं, जहां से सिर्फ दो ही तरह से निकला जा सकता है. या तो पुलिस गोली मारकर हत्या कर दे या फिर ड्रग पेडलर. फिल्म का नाम इसलिए 'गुड लक जेरी' है, क्योंकि जेरी को सच में आपके गुड लक की जरूरत पड़ने वाली है. 

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क्या है कहानी?
फिल्म की शुरुआत होती है मोमोज से. हां, पढ़ने में अटपटा लगेगा, लेकिन यह सच है. नाम 'गुड लक जेरी' और कहानी में मोमोज! कहानी की शुरुआत में एक बहुत सही चीज बताई गई है. मोमोज हैं दार्जिलिंग के, बना बिहारी रहे हैं और बेल पंजाबी रहे हैं. और अगर आप इसे बनाने की फिल्म में प्रक्रिया देख लेंगे, तो शायद ही इसका स्वाद आगे चखने का मजा लूट पाएं. पैरों से जाह्नवी कपूर मैदा मलती नजर आती हैं. मां खांस रही होती है, फिर भी मोमोज बनाती रहती हैं. सड़क पर ये गिर जाते हैं, फिर भी बेच देती है. और फिर आता है कहानी में ट्विस्ट. जेरी की मां शरबती को हो जाता है लंग कैंसर. 

कहते हैं न बुरे काम का बुरा ही नतीजा. पैसा नहीं, फिर इलाज कैसे हो. डॉक्टर ने भी 20-30 लाख की कीमोथेरेपी बता दी. अब जेरी पैसा कहां से लाए. ऐसे में वह मजबूरी में बनती है ड्रग पेडलर. और बस इसी खाई में नीचे ही चलती चली जाती है. गलती से एक ड्रग पेडलर को पुलिस में पकड़वा देती है. जेंट्स टॉयलेट में उस शख्स ने ड्रग्स छिपाए होते हैं. जेरी ड्रग पेडलर के मालिक के हाथ लग जाती है और जेंट्स टॉयलेट से उन्हें ड्रग्स निकालकर लाकर देती है, लेकिन मैगी वाले टिफिन में. मैगी वाले टिफिन में इसलिए, क्योंकि जेरी ड्रग्स को 'मेदा' बोलती है.

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ड्रग्स टॉयलेट से निकालकर लाकर देना शायद जेरी को आसान लगा था, लेकिन जब करने पर आई तो डर और जान जाने की चिंता, जेरी को फंसा ले गई. शुरुआत में जेरी मां की बीमारी के लिए पैसा कमाती है. ड्रग्स को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाती है, लेकिन कमबख्त इश्क एक ऐसी चीज होती है जो अच्छे-अच्छों का दिमाग फेर देती है. ड्रग्स पेडलर के मालिक को जेरी से प्यार हो जाता है. जेरी यहां काम छोड़ने का सोचती है, लेकिन प्यार और ड्रग्स सप्लाई के जाल में फंस जाती है. सिर्फ खुद ही नहीं, पूरे परिवार को जेरी इसमें फंसा देती है. जेरी के साथ अब परिवार पर भी जान जाने की तलवार लटकी है. 

100 किलो ड्रग्स को अगर जेरी सही जगह पर डिलीवरी कर देती है तो वह खुद के साथ परिवार को भी बचा सकती है, लेकिन जेरी यहां खेल जाती है. 100 की जगह 10 किलो ड्रग्स ही वह डिलीवर करती है. अब जेरी की जान पर और खतरा मंडराने लगाता है. जेरी आखिर वह 90 किलो ड्रग्स कहां छिपाती हैं, क्यों छिपाती है और अपने साथ परिवार की जान कैसे बचाती है, इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. फिल्म की कहानी थोड़ी गोलमाल है, लेकिन कॉमेडी का तड़का आपको कहीं न कहीं बांधे रखेगा.  

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कैसा था डायरेक्शन और किरदार?
डायरेक्शन के मामले में सिद्धार्थ सेन ने कुछ खास काम नहीं किया है. कहानी एकदम बिखरी हुई और साधारण सी नजर आई है. जबरदस्ती के भी कुछ किरदारों को इसमें डाला गया है, जिसकी जरूरत महसूस सी नहीं हुई. इतनी आसानी से आखिर कोई कैसे ड्रग पेडलर बन सकता है, बात हजम नहीं होती. और फिर इससे बाहर निकलना भी तो इतना आसान नहीं, जितना फिल्म में दिखाया है. किरदार में दीपक डोबरियाल ने कुछ कॉमेडी डालने की कोशिश की है, वरना बाकी तो बहुत ही साधारण से लगे हैं. किसी से दिल जीतने वाली एक्टिंग नहीं की है.

स्टाइलिंग
स्टाइलिंग भी कुछ खास नहीं रही. जाह्नवी कपूर ने चिकनकारी और प्रिंटेड सूट पहने हैं. बिना मैचिंग का दुपट्टा कैरी किया है. मीता वशिष्ठ उर्फ शरबती ने कॉटन की साड़ियां पहनी हैं. साफ तौर पर एक मिडिल क्लास कल्चर दिखाया गया है. 

क्यों देखनी चाहिए फिल्म?
अगर इस वीकेंड जाह्नवी कपूर की 'गुड लक जेरी' देखने की प्लानिंग कर रहे हैं तो देख सकते हैं. फिल्म के अंत में आपको एक अच्छी सीख जरूर मिल सकती है. वह यह कि डर से बस दो-तीन कदम आगे ही दुनिया है, जहां जाने के लिए न तो रिक्शा की जरूरत होती है और न ही ऑटो की. सिर्फ जरूरत होती है तो थोड़ी सी हिम्मत की. और जब एक बार आप वहां पहुंच गए, तो कसम से मजा आ जाता है.

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