'तुंबाड' फिल्म को पांच साल पूरे हो चुके हैं. हालांकि इस फिल्म को बनाने की जर्नी बहुत ही दिलचस्प रही थी. सात साल में बनकर तैयार हुई इस फिल्म में प्रोड्यूसर व एक्टर ने अपने कई दूसरे प्रोजेक्ट्स तो हाथ से गंवाए, साथ ही कई फाइनैंसियल दिक्कतें भी उन्हें झेलनी पड़ी. इस पूरी जर्नी पर एक्टर सोहम शाह हमसे एक्सक्लूसिव बातचीत की है.
मैं इसे हॉरर फिल्म नहीं मानता
इंडिया के टॉप हॉरर फिल्म की लिस्ट में शुमार हो चुके फिल्म तुंबाड के एक्टर और प्रोड्यूसर इसे हॉरर फिल्म नहीं मानते हैं. सोहम कहते हैं, 'मैं हमेशा यही सोचता था कि तुंबाड एक बहुत ही यूनीक सब्जेक्ट है. इसे लोगों का प्यार मिलेगा. हालांकि मैं इसे पूरी तरह से हॉरर फिल्म नहीं मानता हूं. हॉरर इसमें महज एक एलिमेंट है. अगर आप फिल्म का कोर देखें, तो यह दादी मां की लोक कहानियों की तरह लगती है. हमारे यहां लोक-साहित्य बनती ही नहीं है. मैं हमेशा से सोचता था कि हमारे देश में दादी-नानियों की कहानियां नहीं चलेगी, तो फिर क्या चलेगी.'
कई बार सोचता था फिल्म बीच में बंद कर दूं
दर्शकों से मिले प्यार पर सोहम कहते हैं, 'मैंने बिलकुल भी इस तरह के रिस्पॉन्स की उम्मीद नहीं की थी. मैंने इस फिल्म को जिंदगी के सात साल दिए हैं. मेरे लिए यह काफी टफ फिल्म थी. मैं कई बार सोचता था कि अब इसे बंद कर दूंगा. हालांकि पता नहीं अंदर एक कॉन्फिडेंस भी रहता था कि यार अगर मैं इसे नहीं बनाऊंगा, तो कौन बनाएगा. यही कारण भी है कि मैं इस सात साल की जर्नी को पूरा कर पाया. हालांकि एक एक्टर के तौर पर मैंने कई प्रोजेक्ट्स भी मिस किए हैं. इन सात सालों में केवल तुंबाड को ही वक्त दिया और नतीजा देखें, फिल्म के पांच साल बाद भी लोग इसके बारे में बात कर रहे हैं. आज जहां फिल्मों की शेल्फ लाइफ इतनी कम होती है, वहां तुंबाड को आज भी डिसकस करते हैं.'
सात सालों में हर तरह की तकलीफों को झेला
इन सात सालों में सोहम को किस तरह के पापड़ बेलने पड़े थे? इसके जवाब में वो कहते हैं, 'अरे पूछो मत, पूरी पापड़ की फैक्ट्री खोल दी थी. बहुत से चैलेंजेस से गुजरना पड़ता था. हम स्वीडन से वीएफएक्स टेक्निकल एक्सपर्ट को अप्रोच कर रहे थे, लेकिन उन्हें लगता था कि पता नहीं शायद हम कोई फ्रॉड लोग हैं, उनके पैसे देंगे भी या नहीं. मैं चार छ महीने तक उस इंसान को अप्रोच करता रहा. फिर बहुत मनाने पर उन्होंने कहा कि वो कान्स फिल्म फेस्टिवल में आ रहे हैं. तो मैं अपनी प्रोडक्शन टीम के साथ वहां पहुंचा. उन्हें एडवांस पैसे दिए और अपना काम समझाया. फिर फिल्म की एडिट भी साढ़े तीन घंटे की लंबी थी. शूट बहुत लंबा था कि केवल मॉनसून में ही शूट कर सकते थे. उस वक्त हम लोग इममैच्यॉर थे, लेकिन हमारा लक्ष्य बहुत बड़ा था. पहले हम प्रॉस्थेटिक का इस्तेमाल कर रहे थे, जो काम नहीं कर रहा था. फिर उसे ड्रॉप करना पड़ा. इतने छोटे-छोटे पड़ाव थे कि पूछो मत. आखिर के तीन साल तो ऐसा था कि हम चार लोग बैठकर फिल्म बना रहे थे. मैं, मेरा को-डायरेक्टर, एडिटर और प्रणव ठक्कर ही बचे थे. उस वक्त किसी भी कास्ट को यकीन ही नहीं था कि फिल्म रिलीज होगी. उन्हें लगता था कि डिब्बा बंद हो जाएगी.'
प्रॉपर्टी तक बेच डाली थी
सोहम आगे बताते हैं, 'फिल्म बनाते-बनाते, तो मैं फाइनैंसियली खत्म हो चुका था. मुझे इन सात सालों में अपना फ्लैट बेचना पड़ा फिर कुछ और प्रॉपर्टी बिकी और आखिर में कार तक बेच डाली थी. मैं जब छोटा था, तो अक्सर सुना करता था कि राजकपूर फिल्म बनाने में अपना घर बेच चुके हैं, तो सच कहूं यकीन नहीं होता था. लगता था कि कोई पीआर स्टोरी होगी. हालांकि अब मैं पूरी तरह मानता हूं कि ऐसा हो सकता है. फिल्म बनाने के दौरान वो आपके बच्चे की तरह हो जाती है और आप अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं.'
नेहा वर्मा