उत्तराखंड की सियासत में कुछ ऐसे मिथक हैं, जो अब तक टूट नहीं पाए हैं. हर विधानसभा चुनाव में सियासी दलों के नेता मिथक टूटने का दावा करते है लेकिन ये मिथक जस के तस हैं. एक सरकार के दोबारा वापसी ना कर पाने का चर्चित किस्सा तो हर चुनाव की सुर्खियों में रहता ही है, लेकिन शिक्षा मंत्री और गंगोत्री-चम्पावत सीट को लेकर भी कुछ ऐसा ही है.
उत्तराखंड राज्य का जबसे गठन हुआ है तब से जो विधायक शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर बैठा है वो जीत नहीं पाया. सूबे में अब तक 6 शिक्षा मंत्री बने हैं लेकिन कोई भी शिक्षा मंत्री अगली दफे चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच पाया है. वहीं, गंगोत्री और चम्पावत सीट की बात करें तो जो विधायक यहां से चुनकर आता है उसी की पार्टी सत्ता में रहती है. इसी तरह रानीखेत सीट से भी एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा है. यहां से जिस पार्टी का विधायक चुना जाता है, उस दल को विपक्ष में बैठना पड़ता है. ऐसे में ये सियासी मिथक 2022 के चुनाव में टूटते हैं या नहीं, ये तो 10 मार्च की तारीख ही बताएगी.
जो विधायक शिक्षा मंत्री बने, वो जीत नहीं पाए
उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री को लेकर एक ऐसी परंपरा बन गई है जो एक ऐतिहासिक रूप ले रही है. जब से उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तब से अब तक शिक्षा मंत्री को लेकर एक मिथक बरकरार है. परंपरा है कि उत्तराखंड में जो भी विधायक शिक्षा मंत्री बने, वो दोबारा विधानसभा नहीं पहुंच पाए. साल 2000 में भाजपा की सरकार में तीरथ सिंह रावत शिक्षा मंत्री बने, लेकिन 2002 के चुनाव में वो विधानसभा नहीं पहुंच पाए. इसके बाद साल 2002 में एनडी तिवारी सरकार में नरेंद्र सिंह भंडारी शिक्षा मंत्री बने, जो 2007 के विधानसभा चुनाव में हार गए.
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वहीं, 2007 में जब बीजेपी सत्ता में आई तो इस बार गोविंद सिंह बिष्ट और खजान दास शिक्षा मंत्री बने और दोनों ही नेताओं को 2012 के चुनाव में शिकस्त झेलनी पड़ी. 2012 में फिर कांग्रेस सत्ता में लौटी और देवप्रयाग से विधायक रहे मंत्री प्रसाद नैथानी शिक्षा मंत्री बने और वो भी ये मिथक नहीं तोड़ पाए. इसके बाद 2017 में बीजेपी की सरकार बनी तो तीन मुख्यमंत्री बने, लेकिन शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ही रहे. हालांकि मौजूदा शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे का कहना है कि इस बार ये मिथक टूटेगा और वो ऐतिहासिक जीत दर्ज करेंगे.
20 सालों से चम्पावत और गंगोत्री सत्ता में हैं!
उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री विधानसभा और चम्पावत सीट को लेकर भी दिलचस्प किस्सा है. यहां से जिस विधायक ने फतह किया, उसकी पार्टी की सरकार सत्ता में रही. 2002 और 2012 में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने इन दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी तब उनकी सरकार सूबे में बनी थी. वहीं, 2007 और 2017 में बीजेपी के खाते में दोनों सीटें गईं तो प्रदेश में कमल खिला और पार्टी ने अपना परचम लहराया. ऐसे में आप कह सकते हैं कि बीते 20 सालों से गंगोत्री सत्ता में है.
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इसी तरह रानीखेत सीट के साथ एक खास बात जुड़ी है. इस विधानसभा से जिस पार्टी का विधायक चुना जाता है, उसकी पार्टी सत्ता से बाहर रही है. 2002 और 2012 में इस सीट पर बीजेपी जीती तो सरकार कांग्रेस की बनी, जबकि 2007 और 2017 में कांग्रेस जीती तो सरकार भाजपा ने बनाई. ऐसे में इन तीनों सीटों हॉट सीट पर सियासी दलों की खास नजरें बनी हुई हैं.
उत्तराखंड में दोबारा नहीं लौटी सरकार
उत्तराखंड के 20 साल के सियासी सफर में प्रदेश को 11 मुख्यमंत्री मिले हैं. सभी मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ कांग्रेस के पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी ही अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए थे. वहीं, सरकार की बात करें तो 2002 से 2007 तक कांग्रेस सत्ता में रही. फिर 2007 में सत्ता परिवर्तन हुआ तो बीजेपी की सरकार बनी. 2012 में कांग्रेस ने फिर वापसी की और दो मुख्यमंत्री दिए. इसके बाद 2017 में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई और 5 साल में तीन मुख्यमंत्री के चेहरे दे दिए. मुख्यमंत्री रहते चुनाव लड़ने वाले अब तक सत्ता में दोबारा वापसी नहीं कर पाए हैं. हर विधानसभा चुनाव में जनता ने सत्ता बदली है. ऐसे में देखना होगा कि वर्तमान सीएम पुष्कर सिंह धामी ये मिथक तोड़ पाते हैं कि नहीं.
(रमेश चंद्रा के इनपुट के साथ)
टीके श्रीवास्तव / रमेश चन्द्रा