बोपैया से यूं ही नहीं डरी कांग्रेस, 8 साल पहले 16 विधायकों को बता दिया था अयोग्य

मौजूदा प्रोटेम स्पीकर के.जी बोपैया बीएस येदियुरप्पा के नजदीकी माने जाते हैं. अतीत में भी वो येदियुरप्पा का साथ निभा चुके हैं. 2008 में भी वह प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किए गए थे.

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प्रोटेम स्पीकर के.जी बोपैया प्रोटेम स्पीकर के.जी बोपैया

जावेद अख़्तर

  • बेंगलुरु/नई दिल्ली,
  • 19 मई 2018,
  • अपडेटेड 11:57 AM IST

बहुमत न होने के बावजूद कर्नाटक के राज्यपाल ने जब बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ के लिए आमंत्रित किया तो कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया. इसके बाद जब राज्यपाल ने के. जी बोपैया को विधानसभा का प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया, तो इस फैसले के खिलाफ भी कांग्रेस रात में ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. लेकिन सुप्रीम ने अपने फैसले में कहा कि बोपैया प्रोटेम स्पीकर बने रहेंगे. 

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दरअसल, आज येदियुरप्पा को विधानसभा में बहुमत साबित करना है, लेकिन इससे पहले ही कांग्रेस प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति रद्द कराना चाहती थी. माना जा रहा है कि कांग्रेस के इस विरोध की वजह के.जी बोपैया का अतीत है, जिससे कांग्रेस खौफ में है. दूसरी वजह ये भी कि आज विधानसभा में अगर कांग्रेस के विधायक बगावत करते हैं, तो ऐसे में स्पीकर की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी.

येदियुरप्पा के करीबी

मौजूदा प्रोटेम स्पीकर के. जी बोपैया बीएस येदियुरप्पा के नजदीकी माने जाते हैं. अतीत में भी वो येदियुरप्पा का साथ निभा चुके हैं. 2009 से 2013 तक वह कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर रहे हैं और इससे पहले 2008 में वह प्रोटेम स्पीकर भी नियुक्त किए गए थे.

अवैध खनन मामले में 12 अक्टूबर 2010 को जब बीजेपी के विधायक सदन के अंदर अपनी ही सरकार का विरोध कर रहे थे, तब बतौर स्पीकर बोपैया ने 11 बागी विधायकों और 5 निर्दलीय विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था. इस फैसले से येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार बच गई थी. हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बोपैया के उस फैसले को गलत ठहराया था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बोपैया ने पक्षपात किया और स्वाभाविक न्याय तक का उल्लंघन किया.'

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2008 में भी बने थे प्रोटेम स्पीकर

फिलहाल, सरकार बनाने को लेकर जो खींचतान दिखाई दे रही है, ऐसी ही स्थिति 2008 में भी पैदा हुई थी. 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 110 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन उसे अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं हुआ था. कांग्रेस के पास 80, जेडीएस के पास 28 और 6 निर्दलीय विधायक थे. निर्दलीय विधायकों की मदद से बीजेपी की सरकार बनी और येदियुरप्पा सीएम बने. विधानसभा में के.जी बोपैया ने ही बतौर प्रोटेम स्पीकर विधायकों को शपथ दिलाई थी.

येदियुरप्पा ने निर्दलीयों के साथ मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन उनके सहारे वह पूरी पारी नहीं खेलना चाहते थे. इसलिए येदियुरप्पा ने विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए 7 विपक्षी विधायकों पर डोरे डाले. ये विधायक अगर सीधे बीजेपी में आते तो दल-बदल कानून में इनकी सदस्यता चली जाती. इसलिए पहले इन्होंने इस्तीफा दिया फिर बीजेपी में शामिल हो गए. इसके बाद उपचुनाव में ये सभी सात बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और उनमें से 5 ने जीत दर्ज की. इस हिसाब से येदियुरप्पा के पास 115 विधायक हो गए.

कांग्रेस ने बोपैया के पुराने फैसलों को आधार बनाते हुए ही सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति को चुनौती दी थी. यहां तक कि सुनवाई के दौरान कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में ये कहा कि बोपैया का इतिहास दागदार रहा है और कोर्ट के सामने ऑपरेशन लोटस का जिक्र किया. हालांकि, कोर्ट ने अंतत: बोपैया को ही बहुमत साबित कराने का आदेश दिया.

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