गुजरात में चुनावी मौसम चल रहा है, पहले चरण की वोटिंग के लिए चुनाव-प्रचार खत्म हो गया है. प्रदेश के 19 जिलों में पहले चरण की वोटिंग होगी. चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों को किसानों की याद आती है. सौराष्ट्र इलाका अपने कपास और मूंगफली उत्पादन के लिए जाना जाता है. आजतक ने यहां के किसानों से बात की है, उनसे पूछा है कि वो बीजेपी सरकार से नाराज हैं या उनका गुस्सा शांत हो गया है.
किसानों ने बताया कि इस बार मूंगफली की फसल की बुवाई में देरी हुई है, जोकि दीवाली के बाद होनी चाहिए थी. मोरबी के पास टंकारा जिले में किसान गुजरात में सत्तारूढ़ सरकार से नाराज दिख रहे हैं. कपास को लेकर राज्य में किसानों के मुद्दे सामने आते रहते हैं.
खेत में मौजूद किसान ने बताया कि कपास के बाद गेहूं को नहीं लगा सकते क्योंकि दीवाली के बाद अगर 15 दिन निकल जाएं तो फसल अच्छी से नहीं होती. कपास के बाद गेहूं या फिर चना की फसल होती है. गुजरात के सौराष्ट्र में पानी के सॉर्स और आपूर्ति में हमेशा समस्याएं रहती हैं. गुजरात के किसान पानी और बिजली की समस्या से अधिक परेशान हैं. चाहे चना या फिर मूंग की फसल हो, किसानों को पानी की जरूरत होती है.
हमने एक किसान रमेश भाई पटेल से पूछा कि क्या पाटीदारों के आंदोलन का गुस्सा ठंडा हो गया है. उन्होंने कहा कि गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. यहां पर पिछले 6-7 महीने से 8-12 बार बिजली की कटौती होती है. सिर्फ 8 घंटे बिजली आती है और 10 बार जाती है. उन्होंने कहा कि बीते दो साल से प्रधानमंत्री किसान बीमा योजना लागू थी, एक और लाए हैं. वो भी लागू नहीं हुआ. पीएम मोदी ने बीते पांच महीनों में प्रदेश की जितनी रैलियों को संबोधित किया है, उन सभी में कहा कि नर्मदा के पानी को सौराष्ट्र में सिंचाई और पीने के लिए यूज किया जाएगा और राज्य को आज 24 घंटे बिजली मिल रही है.
रमेश भाई पटेल ने बताया कि यहां नर्मदा का पानी पंपिंग से आता है, जब तक प्राकृतिक प्रवाह से नहीं आता तब तक खेत में पूरा नहीं पड़ता. यहां ड्रिप सिंचाई नहीं है. खुला पानी छोड़ना पड़ता है. प्राकृतिक स्रोत नहीं है. सिर्फ कल्पसर योजना के तहत जब छोटे बांध बनाएंगे जाएंगे दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र में.. तब पानी आएगा. 52 साल से गीत गा रहे हैं, हम पिछले चार साल से लड़ रहे हैं.
सौराष्ट्र में कपास और मूंगफली गुजरात की प्रमुख नकदी फसलें हैं. प्रदेश में मूंगफली और कपास की कीमतें 500 और 3000 रुपये की औसत कीमतों से अधिक है, जिसकी वजह घरेलू और विदेशी मांग है. गुजरात भारत का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राज्य भी है. गुजरात में कृषि क्षेत्र में 60 फीसदी रोजगार है, जबकि प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 15 योगदान देता है.
गुजरात में डीएपी की एक बोरी की कीमत 1350 रुपये है, जोकि 5 साल पहले 600 रुपये थी. इसके अलावा बीते साल एक क्विंटल कपास चुनने का लेबर चार्ज 750 रुपये था. हंसराज भाई पटेल ने कहा कि उर्वरक सस्ता नहीं ज्यादा महंगा है, सरकार हर साल बढ़ा देती है. डीएपी ₹350 बढ़ाया गया, अब ₹1350 का 45 किलो का बैग मिलता है.
साल 2001 से 2015 तक गुजरात के सीएम रहने वाले पीएम नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2020 में किसान सूर्योदय योजना की शुरुआत की थी, जिसमें किसानों को दिन के समय बिजली आपूर्ति की योजना है. पश्चिम गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (PGVCL) सौराष्ट्र के 11 जिलों और कच्छ व उत्तरी गुजरात के कुछ हिस्सों में बिजली वितरित करती है. कंपनी ने बीते साल अक्टूबर में किसान सूर्योदय योजना के तहत मिलने वाली बिजली को निलंबित कर दिया था. इस दौरान रमेश ने बताया कि आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में बढ़ोतरी होगी, सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश है. आप को सीट नहीं मिलेगी, लेकिन वोट शेयर बढ़ेगा.
एक युवा किसान हार्दिक पटेल ने कहा कि वह इस चुनावी मौसम में मतदान नहीं करेंगे. पटेल ने कहा कि सीसीआई होने के बाद भी कपास किसान का नुकसान हो रहा है. सीसीआई नहीं था तो भी ज्यादा दाम मिल रहा था. चुनाव आ रहा है. फिर कोई नहीं देखेगा. मैं तो वोट ही नहीं करूंगा.
गुजरात के लिए भाजपा के घोषणापत्र में कृषि बुनियादी ढांचे के लिए 10,000 करोड़ रुपये और अगले पांच वर्षों में सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाने के लिए 25,000 करोड़ रुपये का वादा किया गया है. इस बीच, कांग्रेस किसानों को दिन के समय 10 घंटे बिजली देने का वादा कर रही है, जिसके लिए उनसे प्रति यूनिट के बजाय प्रति दिन के हिसाब से शुल्क लिया जाएगा, जबकि आप सत्ता में आने पर 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा कर रही है, लेकिन कुछ किसान झिझक रहे हैं.
मिलन शर्मा