केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के चुनाव नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार बनाती दिख रही है. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध ताजा आंकड़ों के मुताबिक 70 विधानसभा सीटों वाले दिल्ली में बीजेपी 42 सीटें जीत चुकी है और छह सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. आम आदमी पार्टी 20 सीटें जीत चुकी है और दो सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं.
बीजेपी दिल्ली की सत्ता से 27 साल लंबा वनवास समाप्त कराने में सफल रही है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार, बीजेपी की जीत के निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं और सवाल अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली पार्टी के भविष्य को लेकर भी उठ रहे हैं. सवाल उठ रहे हैं कि दिल्ली चुनाव में हार के बाद 'आप' का क्या होगा जनाबे आली?
AAP के फ्यूचर पर क्यों उठ रहे सवाल
दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के फ्यूचर पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. विविधताओं वाले देश में जहां हर राज्य की राजनीति का मिजाज एक से भिन्न है, राष्ट्रीय स्तर पर जोड़े रखने का काम दो में से कोई एक फैक्टर ही करता है- मजबूत हाईकमान, विचारधारा. कांग्रेस जैसी पार्टी तमाम दुश्वारियों के बावजूद खड़ी है, उत्तर के हिमाचल प्रदेश और दक्षिण के कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में सरकार चला पा रही है तो उसके पीछे कहीं ना कहीं मजबूत हाईकमान का होना है. बीजेपी जैसी पार्टी को हरियाणा से महाराष्ट्र और कर्नाटक तक विचारधारा एक सूत्र में जोड़े रखती है. विचारधारा की बात करें तो यही लेफ्ट को भी केरल से पश्चिम बंगाल तक जोड़े रखता है.
आम आदमी पार्टी की बात करें तो पार्टी कट्टर ईमानदारी, कट्टर देशभक्ति और इंसानियत को अपनी विचारधारा बताती रही है. दिल्ली में शराब घोटाले और शीश महल जैसे मुद्दों से पार्टी की कट्टर ईमानदारी पर डेंट लगा. कट्टर देशभक्ति की पिच पर पहले से ही बीजेपी जैसा मजबूत प्रतिद्वंद्वी है. विचारधारा के स्तर पर आम आदमी पार्टी उतनी मजबूत रही नहीं, दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के हाईकमान की साख पर भी बट्टा लगा है. जहां से पार्टी पूरे देश की सियासत में छा जाने के ख्वाब देखने लगी थी, अब वहीं सरकार नहीं रही.
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पंजाब में जरूर आम आदमी पार्टी की सरकार जरूर है लेकिन सवाल ये भी है कि वहां की सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर हाईकमान अब कितना होल्ड रख पाता है. पंजाब की जीत को आम आदमी पार्टी दिल्ली मॉडल और ब्रांड केजरीवाल की जीत बताती आई है लेकिन उस दिल्ली मॉडल को अब दिल्ली की जनता ने ही नकार दिया है. अरविंद केजरीवाल खुद अपनी सीट भी नहीं जीत सके. ऐसे में हाईकमान का होल्ड पार्टी की पंजाब ही नहीं, अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी कमजोर् पड़ सकता है. अब भगवंत मान, अरविंद केजरीवाल या राघव चड्ढा की सुनने की जगह पंजाब की सियासत के लोकल सेंटीमेंट्स को तरजीह देकर ब्रांड मान की रणनीति पर चलें, इसकी संभावनाएं अधिक जताई जा रही हैं.
पार्टी की एकजुटता बड़ी चुनौती
दिल्ली में हार के बाद आम आदमी पार्टी के सामने बड़ी चुनौती पंजाब, गोवा, गुजरात से लेकर अन्य राज्यों तक पार्टी को एकजुट बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी. जिक्र जनता दल, असम गण परिषद (एजीपी) जैसे दलों का भी होने लगा रहै जो बड़े ही जोर-शोर से अस्तित्व में आए, सरकारें भी बनाईं लेकिन फिर बिखर गए. जनता दल में विघटन का मुख्य कारण विचारधारा या मजबूत हाईकमान, संगठन को जोड़े रखने वाले इन दो में से किसी भी एक फेविकोल का अभाव बताया जाता है.
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जनता दल में तब हाईकमान कमजोर पड़ा और नतीजा ये हुआ कि जिस राज्य में जो नेता मजबूत था, उसने अपनी पार्टी बना ली. कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा ने जनता दल (सेक्यूलर), हरियाणा में देवीलाल ने इंडियन नेशनल लोक दल, बिहार में लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल, चंद्रशेखर ने समाजवादी जनता पार्टी बना ली. यूपी की सपा, बिहार की जनता दल (यूनाइटेड) जैसी पार्टियों की जड़ें भी जनता दल परिवार से ही जुड़ी हुई हैं. एजीपी की बात करें तो इस पार्टी का उदय भी आम आदमी पार्टी की ही तरह आंदोलन से ही हुआ था. एजीपी असम की सत्ता के शीर्ष तक भी पहुंची, सरकार भी चलाई और एक बार जब हार कर सत्ता से बाहर हुई, दोबारा खड़ी नहीं हो पाई.
बिकेश तिवारी