Swami Vivekanand Life: स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था. उनका जन्मदिन हर साल युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. उनका पूरा जीवन और विचार युवाओं के लिए आज भी प्रेरणा हैं. आज युवा दिवस पर आइए जानते हैं, स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी वो घटना जो प्रेरक प्रसंग है, साथ ही उनके शिकागो भाषण का एक अंश पढ़िए.
उनके जीवन काल की वैसे तो कई घटनाएं काफी यादगार हैं. चाहे उनके ब्रह्मचर्य का पालन हो या मां के प्रति अटूट श्रद्धा या सादा जिंदगी, हर घटना युवाओं को प्रेरित करने वाली है. उनके जीवन का एक यादगार किस्सा यह है जब उन्होंने शिकागो में धर्म सम्मेलन में आमंत्रण मिलने के बाद अपनी मां से आदेश मांगा. अपनी मां से उन्होंने कहा कि मां मुझे इजाजत दीजिए. इस पर उनकी मां कुछ नहीं बोलीं. वो रसोई का काम कर रही थीं. तभी उन्होंंने स्वामी विवेकानंद से चाकू मांगा.
मां के आदेश पर स्वामी विवेकानंद ने तुरंत चाकू पकड़ाया. उन्होंने जिस ढंग से चाकू मां को पकड़ाया वो पारंपरिक और सही तरीका था. इस पर मां ने कहा कि अब तुम परिपक्व हो और अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुंचाने के अधिकारी हो, जाओ और जाकर वहां ज्ञान का संचार करो.
शिकागो भाषण के पांच वो बिंदु जो कराते हैं गर्व की अनुभूति
1. उन्होंने अपने भाषण में सबसे पहले अमरीकी भाइयों और बहनों कहकर सभा को संबोधित किया. इसके बाद उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं.
2. मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली.
3. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है.
4. मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं.
5. सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए. यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से हो.
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