Kadambini Ganguly: देश की पहली महिला डॉक्‍टर जिन्‍होंने लड़कियों के लिए खोले मेडिकल कॉलेजों के दरवाजे

कादम्बिनी को मेडिकल की पढ़ाई करने में बहुत संघर्ष करना पड़ा. वह कलकत्ता विश्वविद्यालय (CU) में प्रवेश परीक्षा के लिए उपस्थित होना चाहती थीं, लेकिन विश्वविद्यालय अभी भी छात्राओं को प्रवेश नहीं दे रहा था. ऐसे में द्वारकानाथ गांगुली ने जरूरी अनुमति प्राप्त करने के लिए लड़ाई लड़ी.

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Kadambini Ganguly: Kadambini Ganguly:

aajtak.in

  • नई दिल्‍ली,
  • 03 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 7:25 AM IST

Kadambini Ganguly Death Anniversary: पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में कादम्बिनी गांगुली और चंद्रमुखी बोस पहली महिला ग्रेजुएट्स में से एक थीं, जो न केवल भारत में, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में पहली महिला चिकित्सक बनीं. कादंबिनी बोस के पिता प्रधानाध्यापक ब्रजकिशोर बोस ब्रह्म समाज के आदर्शों के प्रबल अनुयायी भी थे. कादम्बिनी हमेशा महिलाओं की स्वतंत्रता पर उस समय जोर देती रहीं जब बाल विवाह और सती जैसी प्रथाएं समाज में मौजूद थीं.

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उनका जन्म बंगाल के बारीसाल जिले (अब बांग्लादेश में) के चांदसी में हुआ था और उस समय भी उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की. उन्‍होंने पहले ब्रह्मो ईडन महिला स्कूल, ढाका और फिर हिंदू महिला विद्यालय, बालीगंज, कलकत्ता में पढ़ाई की. स्कूल में ही उनकी मुलाकात अपने भावी पति द्वारकानाथ गांगुली से हुई, जिन्‍होंने शायद उनकी पूरी क्षमता का एहसास करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई. उनके गुरु रहे द्वारकानाथ उनसे आयु में 17 वर्ष बड़े थे और ब्रह्म समाज और महिला मुक्ति के प्रबल समर्थक थे.

संघषों के बाद की पढ़ाई
एक महिला के रूप में कादम्बिनी को मेडिकल की पढ़ाई करने में बहुत संघर्ष करना पड़ा. वह कलकत्ता विश्वविद्यालय (CU) में प्रवेश परीक्षा के लिए उपस्थित होना चाहती थी, और ऐसा ही देहरादून की एक बंगाली ईसाई लड़की चंद्रमुखी बसु ने भी किया, लेकिन विश्वविद्यालय अभी भी छात्राओं को प्रवेश नहीं दे रहा था. ऐसे में द्वारकानाथ ने जरूरी अनुमति प्राप्त करने के लिए लड़ाई लड़ी और दोनों लड़कियों को 1877 में सीयू प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई. कादम्बिनी ने प्रथम श्रेणी से केवल एक नंबर कम के साथ परीक्षा उत्तीर्ण की. 

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इंग्‍लैंड जाकर की पढ़ाई
कादम्बिनी ने आगे की मेडिकल पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने का फैसला किया. सभी परंपराओं को तोड़ते हुए, उन्‍होंने अपने बच्चों को अपनी बड़ी बहन की देखभाल में छोड़ दिया और 1893 में इंग्लैंड चली गईं. अपनी अविश्वसनीय इच्छा शक्ति, द्वारकानाथ के अटूट समर्थन और लंदन स्थित बैरिस्टर अपने चचेरे भाई मनमोहन घोष की मदद से, उन्‍होंने एडिनबर्ग के स्कॉटिश कॉलेज में मेडिकल साइंस में ट्रिपल डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया. चूंकि उसके पास पहले से ही CU से BA की डिग्री और सीएमसी से जीएमसीबी की डिग्री थी, उसने बहुत ही कम समय में अपना ट्रिपल डिप्लोमा पूरा कर लिया.

इंग्‍लैंड से लौटकर मिला सम्‍मान
कादंबिनी के जीवन ने इंग्लैंड से लौटने पर एक मोड़ लिया. अंततः उन्हें लेडी डफरिन अस्पताल में एक सीनियर डॉक्‍टर के रूप में स्वीकार कर लिया गया और उन्होंने अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस भी फिर से शुरू कर दी. प्राइवेट प्रैक्टिस तेजी से बढ़ी और जल्द ही उन्हें अस्पताल की नौकरी छोड़नी पड़ी. जब उन्होंने 1895-96 में नेपाल की रानी मां की देखभाल कर उन्‍हें ठीक किया तो तो उन्हें शाही परिवारों द्वारा इलाज के लिए बुलाया जाने लगा. कादम्बिनी बोस की मृत्‍यु आज ही के दिन, 03 अक्‍टूबर 1923 को हो गई.

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क्‍याें मानी जाती हैं पहली भारतीय महिला डॉक्‍टर
वेस्‍टर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस करने वाली भारत की पहली महिला चिकित्सक कौन थी, इस बारे में एक भ्रम है - कादम्बिनी गांगुली या आनंदीबाई गोपाल जोशी. जहां आनंदीबाई ने 1886 में महिला मेडिकल कॉलेज, पेनसिल्वेनिया से MB की डिग्री प्राप्त की, वहीं कादम्बिनी ने भारत में अपनी योग्यता प्राप्त की. आनंदीबाई को कोहलापुर के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल का रेजिडेंट फिजिशियन नियुक्त किया गया था मगर इससे पहले कि वह भारत लौटकर अपनी प्रैक्टिस शुरू कर पातीं, 1887 में तपेदिक से उनका दुखद निधन हो गया.

 

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