Kanpur Ekta Gupta Murder Mystery: एक भरे पूरे शहर में एक महिला अचानक गायब हो जाती है. अगले चार महीने तक उसका पति अपनी पत्नी की तलाश में शहर और शहर के बाहर भटकता रहता है. स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक फरियाद करता है. पर चार महीने तक उसका कोई सुराग नहीं मिलता है. फिर चार महीने बाद मिलता है तो उस महिला का कंकाल. दो मासूम बच्चों के सिर से उनकी मां का साया छीन लिया जाता है. और जब मामले का खुलासा होता है तो हर कोई हैरान रह जाता है. इस वारदात में सबसे ज्यादा किरकिरी अगर किसी की होती है तो वो है कानपुर पुलिस.
कानपुर पुलिस ने कारोबारी राहुल गुप्ता की जिंदा पत्नी को तो नहीं लौटाया, लेकिन उसी कंकाल की पोटली के साथ झोला भर कर बदनामी और रुसवाई उन्हें जरूर सौंप दी. देखते ही देखते हंसता खेलता परिवार रुसवाई और बदनामी के आगे बर्बाद हो गया. लेकिन शहर के हाकिम साहब को इस परिवार की बर्बादी, एक पत्नी और एक मां के कत्ल से कहीं ज्यादा इस बात की फिक्र थी कि इन सबमें उनके बंगले का नाम क्यों लिया जा रहा है? इन सबमें डीएम परिसर को क्यों बदनाम किया जा रहा है?
कमाल है डीएम साहब! आप कानपुर शहर के हाकिम हैं. शहर में होने वाली एक चप्पल चोरी से लेकर हर क़त्ल के लिए आप जवाबदेह हैं. क्योंकि शहर की पुलिस आपकी मातहत है. पर आपसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है. आप अपने सरकारी बंगले का जरा सा नाम उछलने पर रिपोर्टर को खबर का खंडन करने के लिए पत्र भेज रहे हैं. पर डीएम साहब इसे क्या कहेंगे? चार महीने तक आपकी कानपुर पुलिस जिस कातिल को ढूंढ रही थी, उस कातिल की बाइक तो 6 नवंबर 2024 यानी बुधवार की शाम 4 बजे तक आपके बंगले में ही खड़ी रही और किसी को पता तक नहीं!
अगर आपके बंगले में खड़ी इस लावारिस बाइक के मालिक का पता ऑन स्पॉट हमारा रिपोर्टर लगा सकता है, तो आप और आपकी पुलिस क्यों नहीं लगा पाई? डीएम साहब ये कोई आम लावारिस बाइक नहीं है, बल्कि ये एक किडनैपिंग और मर्डर केस से जुड़ी केस प्रॉपर्टी है, कोई आम सबूत नहीं.
कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट यानी डीएम राकेश कुमार सिंह ने एक पत्र हमारे कानपुर के रिपोर्टर को भेजा है. डीएम साहब उस पत्र के जरिए ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कानपुर की एकता गुप्ता के कत्ल के बाद जिम ट्रेनर विमल सोनी ने जिस जगह लाश दफ्नाई वो डीएम परिसर या डीएम कंपाउंड नहीं है. बल्कि उस जगह का नाम ऑफिसर्स क्लब है, जो डीएम आवास परिसर से कुछ दूरी पर है.
'आज तक' ने भी कभी अपनी रिपोर्ट में ये नहीं कहा कि लाश डीएम आवास के अंदर दफनाई गई थी. बल्कि ये कहा था कि डीएम कंपाउंड में दफनाई गई. डीएम साहब के बंगले के बिल्कुल बराबर में. हमारे रिपोर्टर ने कैमरे के एक ही फ्रेम में ये दूरी भी दिखा दी थी.
वैसे डीएम साहब को अपने जिस सरकारी बंगले का इस के साथ नाम घसीटे जाने पर ऐतराज है तो ये बताते चलें कि अगर आप गूगल के जरिए भी इस इलाके को ढूंढेंगे, तो गूगल भी इस पूरे इलाके का नाम डीएम कंपाउंड ही बताता है. इतना ही नहीं सरकारी कागजों में भी ये पूरा इलाका डीएम कंपाउंड के नाम से ही जाना जाता है. यहां तक कि एकता का कंकाल जब इस जगह से बरामद हुआ तो खुद एकता के पति ने भी इस जगह का पता यही बताया था.
वैसे आपकी जानकारी के लिए ये भी बता दें डीएम साहब कि ये जो डीएम आवास है, ये कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है. ये एक सरकारी आवास है. इस डीएम आवास में या डीएम कंपाउंड में आपसे पहले भी बहुत सारे डीएम रहे और आपके बाद भी यहां रहेंगे. काश.. जो गंभीरता आपने अपने इस सरकारी बंगले की तथाकथित बदनामी को लेकर दिखाई, अगर वैसी ही थोड़ी सी गंभीरता चार महीने पहले एकता केस में दिखा देते, तो क्या पता एकता के बच्चों के सिर से मां का साया छिनने से बच जाता और अगर छिन भी जाता, तो कम से कम कंकाल की बजाय अंतिम संस्कार के लिए पूरी लाश तो होती.
पर आपको तो अपने बंगले और अपनी इमेज की फिक्र थी. डीएम साहब आप ही के बंगले के अंदर न जाने कब से पड़ी उस लावारिस बाइक के बारे में आप क्या कहेंगे? बाइक की हालत और पंक्चर हो चुका पिछला पहिया ये चुगली खा रहा है कि आप ही के घर के अंदर वो एक अर्से से यूं ही खड़ी है. ये सुरक्षा में एक घोर लापरवाही का भी मामला है कि एक लावारिस बाइक कानपुर शहर के सबसे बड़े अफसर के घर के अंदर महीनों से खड़ी है और किसी को इसकी सुध तक नहीं. सुरक्षा में लापरवाही के मामले की तो फिर भी लीपापोती हो जाएगी.
पर ये बताइए डीएम साहब कि जिस एकता केस में एकता की गुमशुदगी के अगले ही दिन यानी 25 जून को एकता के पति राहुल ने बाकायदा विमल सोनी का नाम लेकर पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी, उसकी बाइक आप के घर के अंदर पार्क क्यों थी? चार महीने तक आपकी कानपुर पुलिस विमल सोनी को न जाने कितने ही शहरों में ढूंढने का दम भरती रही. पर आपकी उसी पुलिस को आप ही के घर में रखी विमल की बाइक क्यों नजर नहीं आई? डीएम आवास के स्टाफ ने इस बाइक की सूचना क्या आपको या पुलिस को दी थी?
कमाल तो ये है डीएम साहब कि आप ही के घर की दीवार के बराबर से एकता को कंकाल की शक्ल में बाहर आए 12 दिन हो चुके हैं. एकता के कत्ल के इल्जाम में पकड़े गए विमल सोनी की गिरफ्तारी को भी 12 दिन हो चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद आपकी पुलिस को आप ही के घर में खड़ी विमल सोनी की बाइक के बारे में छह नवंबर तक भनक नहीं लगी?
डीएम साहब चूंकि बाइक आपके सरकारी बंगले के अंदर पार्क है, इससे इतना तो साफ है कि विमल सोनी आपके बंगले के स्टाफ से परिचित होगा. आपके स्टाफ की मर्जी से ही उसने ये बाइक पार्क की होगी. तो क्या आपकी पुलिस को आपके बंगले के बराबर में मिली लाश और आपके बंगले के अंदर बरामद इस बाइक को लेकर आपके स्टाफ से पूछताछ नहीं करनी चाहिए? यही कोई आम आदमी होता, तो पूछताछ छोड़िए वो कब का थाने या हवालात में होता.
खैर, बाइक को भी हटाइए डीएम साहब. कानपुर के हाकिम हैं आप. हर सरकार बार-बार ये कहती है कि सुरक्षा के मद्देनजर खास-खास जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं. कैमरे खराब हों, तो ठीक किए जाएं. लेकिन यहां तो चराग तले ही अंधेरे का मामला है. अब अगर आपके बंगले के आस-पास के ही सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे हों, तो बाकी शहर के कैमरों की क्या ही बात होगी. जिस दिन विमल सोनी ने एकता गुप्ता की लाश आपके बंगले के बराबर दफ्नाई थी, अगर उस रोज सीसीटीवी कैमरा काम कर रहा होता, तो क्या ही बात थी. कम से कम इस बात का कनफ्यूजन तो न रहता कि विमल सोनी लाश वाली अपनी आईटेन कार किस गेट से अंदर ले गया था?
आपकी पुलिस की दलील है कि विमल सोनी ने जिस ऑफिसर्स क्लब के अंदर एकता की लाश दफनाई थी, उस ऑफिसर्स क्लब में वो इसी गेट से अपनी आईटेन कार ले गया था. लेकिन इस गेट की चौड़ाई देख कर पुलिस पर भरोसा नहीं आता. आपकी पुलिस का सच जानने के लिए हमारे रिपोर्टर को इस ऑफिसर्स क्लब के गेट तक को नापना पड़ा था. नाप तौल कर जब हमने यही सच्चाई आपकी पुलिस को बताई तब भी वो अपना राग छोड़ने को तैयार ही नहीं थी.
डीएम साहब आपके पड़ोस की इस गेट की नपैया बहुत जरूरी थी. क्योंकि ये गेट पुलिस की कहानी का एक अहम सबूत है. सवाल ये भी है कि अगर इस गेट से विमल सोनी एकता की लाश अपनी आईटेन कार में लेकर अंदर नहीं गया तो फिर वो ऑफिसर्स क्लब के अंदर किस रास्ते से गया? तो अगर इस गेट को छोड़ दें, तो फिर अंदर जाने के या फिर बगैर कार के अंदर जाने के दो ही रास्ते बचते हैं. पहला रास्ता ये कि विमल सोनी डीएम कंपाउंड तक अपनी कार में आया. फिर डीएम कंपाउंड के बाहर ही कार पार्क की. कार के अंदर से एकता की लाश निकाली और गोद में या कंधे पर रखकर ऑफिसर्स क्लब के अंदर गया.
पर इस थ्योरी में दम नजर नहीं आता. आपका ये पूरा कंपाउंड आपके शहर का सबसे सुरक्षित इलाका है. ऐसे में कोई कातिल खुलेआम लाश हाथ में लेकर घूम नहीं सकता. बचा दूसरा रास्ता तो बहुत मुमकिन है कि कातिल ने लाश अंदर ले जाने के लिए उसी रास्ते का इस्तेमाल किया हो और ये दूसरा रास्ता है इसी ऑफिसर्स क्लब के अंदर जाने का वो दूसरा गेट. वो गेट बड़ा भी है. कार क्या इस गेट से ट्रक भी घुस जाए. लेकिन इस गेट तक पहुंचने के लिए जरूरी ये है कि विमल सोनी डीएम साहब के बंगले के अंदर अपनी कार ले जाए और फिर वहां से इस दूसरे गेट तक पहुंचे. तो क्या विमल सोनी डीएम साहब के बंगले के अंदर अपनी वो कार लेकर गया था, जिसमें एकता की लाश थी?
हालांकि इस गेट को देख कर पहली नजर में ऐसा ही लगता है कि अर्से से ये दरवाजा खुला ही नहीं है. गेट के अंदर इर्द गिर्द और नीचे घास और झाड़ उग आई है. पर बहुत मुमकिन है चार महीने पहले ये झाड़ ना हो. पुलिस वालों को हमेशा पहला सबक यही सिखाया जाता है कि शक पर शक करो. वैसे असली कहावत तो ये है कि बाप पर भी शक करो. तो इसी सबक के हिसाब से शक इस बात पर भी होता है कि जिस ग्रीन पार्क स्टेडियम की पार्किंग में बकौल आपकी पुलिस विमल सोनी ने एकता का कत्ल किया, उस पार्किंग का सीसीटीवी कैमरा ठीक उसी वक्त 15 मिनट के लिए क्यों और कैसे बंद हो गया था? और 15 मिनट के बाद फिर वो चालू भी हो गया.
यानी अगर पुलिसिया तफ्तीश के हिसाब से इस केस को देखें, तो यहां तीन ऐसी चीजें हैं जिसकी ढंग से तफ्तीश होनी चाहिए. पहली ग्रीन पार्क की पार्किंग का सीसीटीवी कैमरा ऐन वक्त पर कैसे और क्यों बंद और चालू हुआ? दूसरा डीएम कंपाउंड के इर्द गिर्द के सीसीटीवी कैमरे के साथ कोई छेड़खानी तो नहीं हुई? और तीसरा विमल सोनी का डीएम हाउस के स्टाफ के साथ क्या कनेक्शन है? क्या कानपुर पुलिस एकता केस में डीएम कंपाउंड के स्टाफ से पूछताछ करेगी? अब तक ऐसा नहीं हुआ.
रंजय सिंह / सिमर चावला