अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - कहो कि लब अब खामोश हैं...

सब्र... खो सा गया है कहीं. जबकि ग़ुस्सा हर मोड़ पर ख़ड़ा है. खाने-पीने पर पिटाई हो रही है. मिलने-जुलने पर कुटाई की जा रही है. लव को जेहाद बना दिया तो सोच को फ़साद. क्या बोलना है.. क्या लिखना है... क्या कहना है... क्या पहनना है... क्या खाना है... क्या पीना है... सब कुछ संभल कर हो रहा है अब.

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अब इस तरह के मामले आए दिन ख़बरों में बने रहते हैं अब इस तरह के मामले आए दिन ख़बरों में बने रहते हैं

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 13 जून 2019,
  • अपडेटेड 12:14 PM IST

किसी ने कभी कहा था कि कहो कि लब आज़ाद हैं. पर आज कहना पड़ रहा है कि कहो कि लब ख़ामोश हैं. हम ख़ामोश हैं. क्योंकि हमारे कहने पर कुछ भी हो सकता है. कुछ लिख दिया.. .कुछ कह दिया... तो जेल तक जाना पड़ सकता है. भले ही हमारा संविधान हमें लिखने, बोलने की आजादी देता हो. एक पत्रकार ने यूपी के मुख्यमंत्री के बारे में कुछ ट्विट कर दिया तो जेल पहुंच गया. एक लड़की ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के बारे में मीम बना दिया तो जेल पहुंच गई. एक पत्रकार ने कुछ पुलिस वालों की पोल खोल दी तो पिटते हुए हवालात गए.

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सब्र... खो सा गया है कहीं. जबकि ग़ुस्सा हर मोड़ पर ख़ड़ा है. खाने-पीने पर पिटाई हो रही है. मिलने-जुलने पर कुटाई की जा रही है. लव को जेहाद बना दिया तो सोच को फ़साद. क्या बोलना है.. क्या लिखना है... क्या कहना है... क्या पहनना है... क्या खाना है... क्या पीना है... सब कुछ संभल कर हो रहा है अब. पर सिर्फ जनता के लिए. ये सारी मजबूरियां और बेबसी बस जनता के लिए है.

नेताओं पर कोई रोक नहीं है. नेताओं के लिए खुली छूट है. वो कुछ भी बोलें. कैसी भी भाषा का इस्तेमाल करें. किसी के कपड़े पर कुछ भी कमेंट करें. किसी को मार-काट डालने की धमकी दे दें. अली-बजरंग अली के नाम पर देश को बांट दें. सब चलेगा. क्योंकि ये हमारे नेता हैं. इनसे ही तो देश चलता है. यही तो देश का कानून बनाते हैं. इन्हीं के हाथों में ही तो कानून का डंडा होता है. डंडा ना भी हो तो कानून के मुहाफिज इन्हीं के ही इशारे पर तो डंडा घुमाते हैं.

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सब्र का आलम देखिए कि कोलकाता में एक लड़की अपनी मुख्यमंत्री का मीम बना देती है, तो जेल पहुंचा दी जाती है. लखनऊ का एक पत्रकार अपने मुख्यमंत्री के बारे में कुछ लिख भर देता है. तो उसे जेल से बाहर निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाना पड़ता है. एक ट्रेन हादसे की रिपोर्टिंग करने जब एक पत्रकार मौके पर पहुंचता है तो उसकी पुरानी खबर से भन्नाए पुलिस वाले उस पर ऐसे पिल पड़ते हैं मानो वो एलओसी पार कर घुसपैठिए के तौर पर पकडा गया हो.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा. मगर जो खा रहे हैं उनकी पोल खोलने वाले डंडे, लात-घूंसे खाएं ये कहां का इंसाफ है. रिश्वतखोर अफसरों की पोल खोली थी इस पत्रकार ने कुछ वक्त पहले. बस उसी के बदले अब लात-घूंसें और थप्पड़ खा रहा है. खैर इस पत्रकार की कहानी आगे. उससे पहले एक हलकी सी नजर अपने ऊपर भी डाल लेते हैं.

मीडिया निशाने पर है. पत्रकार हवालात में. मीडिया को लेकर मज़ाक भी खूब बनाया जा रहा है इधर. पर ईमानदारी से कहें तो कुछ हद तक इसके लिए मीडिया भी जिम्मेदार है. ज्यादातर चैनल पर बहस के नाम पर जो कुछ हो रहा है वो सब्र को बेसब्र बनाने का ही काम कर रहा है. स्टूडियो में लाइव लात, घूंसे, थप्पड़, सब धनाधन चल रहे हैं. बल्कि अकसर तो ये होता है कि जब लाइव में माहौल झगड़ालू हो जाता है तो पीछे से प्रोड्यूसर कहता है बहुत बढ़िया. सही जा रहा है. झगड़ा चालू रखो और लड़ाओ. और भड़काओ. क्लोजअप में दिखाओ, टू विंडो काट लो. नौबत ये आ गई है कि लाइव डिबेट में झगड़ा इस मुकाम तक पहुंच गया है कि कई बार तो स्टूडियो से गेस्ट को सीधे थाने ले जाया गया है.

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