कोरोना से जुड़ी बड़ी ख़बर, वैक्सीन का बंदरों पर ट्रायल सफल

किसी भी वैक्सीन या दवा को इंसानों पर इस्तेमाल करने से पहले इन्हीं बंदरों पर उसे आजमाया जाता है. ये इनकी मजबूरी भले हो. मगर मजबूरन ही सही इंसानों पर आने वाले खतरे को पहले इन बेज़ुबानों ने अपने ऊपर लिया है. ताकि इंसान महफूज़ रह सके.

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कोरोना की दवा बनाने के लिए कई देशों के वैज्ञानिक और डॉक्टर रात दिन रिसर्च कर रहे हैं कोरोना की दवा बनाने के लिए कई देशों के वैज्ञानिक और डॉक्टर रात दिन रिसर्च कर रहे हैं

शम्स ताहिर खान / परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2020,
  • अपडेटेड 4:43 PM IST

  • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में चल रहा परीक्षण
  • टीका लगने के बाद बंदरों में नहीं फैला वायरस

उन्हें इंसानों का पूर्वज भी कहा जाता है. उनकी बहुत सी चीजें, हरकतें, हाव-भाव भी इंसानों से मिलती हैं. मगर इंसान ना होते हुए भी कोरोना के खिलाफ इस वक्त जारी दुनिया की सबसे बड़ी जंग में वो भी हिस्सा ले रहे हैं. जी हां, दुनिया के दो देशों से दो अच्छी खबरें आई हैं. खबर ये कि कोरोना वायरस को मारने वाली वैक्सीन बंदरों पर ट्रायल के दौरान कामयाब रही हैं. इस कामयाबी का मतलब ये है कि अब इंसानों पर इसका ट्रायल किया जा सकता है.

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किसी भी वैक्सीन या दवा को इंसानों पर इस्तेमाल करने से पहले इन्हीं बंदरों पर उसे आजमाया जाता है. ये इनकी मजबूरी भले हो. मगर मजबूरन ही सही इंसानों पर आने वाले खतरे को पहले इन बेज़ुबानों ने अपने ऊपर लिया है. ताकि इंसान महफूज़ रह सके. आज फिर कोरोना महामारी के इस दौर में इन बंदरों ने हम पर करम किया है. और ये कोरोना वायरस से मायूस होती दुनिया के लिए राहत की खबर लाए हैं.

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कोरोना वायरस के ऊपर इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में ट्रायल चल रही है. दुनिया में अब तक की सबसे महंगी. सबसे ज़्यादा डॉक्टरों की टीम वाली और सबसे बड़े रिकवरी ट्रायल के महज़ एक महीने के अंदर के नतीजों ने दुनिया को हैरान कर दिया है. चूहे की प्रजाति के गिनी पिग पर ट्रायल के बाद जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में बन रही वैक्सीन का, बंदरों के एक ग्रुप पर ट्रायल किया गया तो नतीजे चौकाने वाले थे.

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रिपोर्ट में बताया गया है कि बंदरों में कोरोना वायरस छोड़े जाने से पहले वैक्सीन का टीका लगाया गया था. इस दौरान पाया गया कि 14 दिनों के अंदर वायरस के खिलाफ छह बंदरों के शरीर में एंटी बॉडी विकसित हो गए. जबकि कुछ बंदरों को एंटी बॉडी विकसित होने में 28 दिन लगे. वैज्ञानिकों के मुताबिक कोरोना वायरस के संपर्क में आने के बाद इस वैक्सीन ने उन बंदरों के फ़ेफड़ों को नुक़सान से बचाया और वायरस को शरीर में ख़ुद की कॉपियां बनाने और बढ़ने से रोका.

यकीनन बंदरों पर हुए इस ट्रायल को बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. क्योंकि लैब से निकलकर बाज़ार पहुंचने के बीच एक वैक्सीन को तमाम ट्रायल से होकर गुजरना पड़ता है. इनमें से एक अहम हिस्सा है जानवरों पर ट्रायल. किसी भी दवा के क्लिनिकल ट्रायल के लिए सबसे पहला प्रयोग गिनी पिग चूहे पर किया जाता है. और अगर वो कामयाब हो जाता है तो फिर ये ट्रायल बंदरों पर होता है और उसमें कामयाबी मिलने के बाद ही इसे इंसानों पर टेस्ट किया जाता है. फिर कहीं जाकर कोई दवा या वैक्सीन बाज़ार में आती है. अच्छी बात ये है कि इंग्लैंड में चल रहा ये ट्रायल में कई चरणों को पार कर चुका है. और अब इंसानों पर इसका टेस्ट किया जा रहा है.

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ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में चल रहे रिकवरी ट्रायल के अलावा चीन में भी बन रही वैक्सीन का ट्रायल इंसानों से पहले रीसस मकाक नाम की प्रजाति के बंदरों पर किया जा रहा है. चीन कौन सी वैक्सीन तैयार कर रहा है. ये वैक्सीन किस स्टेज पर है और इसे बाज़ार में आने में अभी कितना वक्त है, ये हम आपको आगे बताएंगे. मगर उससे पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बंदरों पर किए गए इस कामयाब टेस्ट की बारीकियों को समझ लेते हैं. क्योंकि यहां हुए इस ट्रायल में बेहद पॉज़िटिव नतीजे सामने आए हैं. जिसके बाद ये उम्मीद जताई जा रही है कि कोरोना की वैक्सीन सितंबर से लेकर दिसंबर तक बाज़ार में आ सकती है. और दुनिया को इस जानलेवा वायरस से मुक्ति भी मिल सकती है.

कुछ खास प्रजाति में खास वायरस होते हैं. यानी ये किसी एक खास सेल में ही रह सकते हैं. आमतौर पर ये एक प्रजाति से दूसरे में नहीं जाते हैं. अगर जाते भी हैं तो उसके जिस्म के सेल के हिसाब से खुद को बदलना पड़ता है. साथ ही एक ऐसी आबादी खोजनी होती है जिसमें वायरस से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता न हो. जैसे अभी कोरोना वायरस का इंसानों में इन्फेक्शन.

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दरअसल, किसी भी वैक्सीन या दवा को बनाने के लिए आपको बीमारी का मॉडल बनाना पड़ता है. वैक्सीन के केस में प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने और इन्फेक्शन के लिए मॉडल बनाए जाते हैं. और दोनों में ही इम्यून सिस्टम अहम होता है. इंसानों से सबसे नजदीकी संरचना चिंपान्जी, बंदर, बबून की होती है. और इसलिए रीसर्चर्स का मानना है कि दवा की टेस्टिंग के लिए ये सबसे अच्छे मॉडल होते हैं.

माना जाता है कि कुछ जानवरों में जेनेटिकली इंसानों जैसा ACE-2 रिसेप्टर होता है. यानी जहां से शरीर में वायरस की एंट्री होती है और ऐसे जानवरों में बाहर से भी इन्फेक्शन को डाला जा सकता है. ताकि उनसे लड़ने वाली वैक्सीन का उन पर टेस्ट किया जा सके. आपको बता दें कि ज़्यादातर जानवरों पर इंसानों में होने वाले इंफेक्शन बेअसर होते हैं. मगर बंदर इनसे प्रभावित हो जाते हैं क्योंकि इनके शरीर हमसे मिलते जुलते हैं. और अब इसीलिए माना जा रहा है कि ऑक्सफोर्ड में बंदर पर हुए सफल ट्रायल के बाद उनकी वैक्सीन इंसानों पर भी असर दिखानी शुरू करेगी.

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