Exclusive: कोरोना ने कैसे इंसान के आखिरी सफर को भी बनाया मुश्किल, देखें ग्राउंड रियलिटी

मोर्चरी में आए शवों की रिश्तेदारों से पहचान कराना भी स्टाफ के लिए बड़ी दिक्कत वाला है. बहुत केसों में रिश्तेदार पहचान करने के लिए ही नहीं आ रहे. वे पहले ये जानना चाहते हैं कि मृतक की रिपोर्ट पॉजिटिव है या नेगेटिव.

कोरोना के कारण अस्पतालों की मोर्चरी पर बढ़ता दबाव (Photo- Aajtak)
मौसमी सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2020,
  • अपडेटेड 1:52 PM IST

  • महामारी से मौतों के कारण अस्पतालों की मोर्चरी पर बढ़ रहा दबाव
  • मृतकों के रिश्तेदारों में भी हर एक के पास सुनाने के लिए अपना दर्द

कहते हैं इनसान को मौत के बाद सब झंझटों से छुटकारा मिल जाता है, लेकिन कोरोना वायरस ने मौत के बाद भी बहुत कुछ बदल दिया है. अब मौत के बाद भी इंसान के Covid-19 टेस्ट की रिपोर्ट बहुत मायने रखती है. टेस्ट पॉजिटिव निकलता है, तो अंतिम विदाई के लिए भी सख्त प्रोटोकाल है. संक्रमण रोकने के लिए सरकारी स्तर पर इस तरह के उपाय जरूरी भी हैं, लेकिन कोरोना नाम से जुड़े सोशल स्टिग्मा ने कुछ लोगों का काम बहुत मुश्किल कर दिया है, जैसे कि अस्पताल के मोर्चरी (मुर्दाघर) का स्टाफ.

जैसे-जैसे महामारी से मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है वैसे अस्पतालों की मोर्चरी पर भी दबाव बढ़ रहा है. एक तरफ शव की सही देखभाल से अंतिम संस्कार तक गरिमा बनाए रखनी है. मुर्दाघरों में बड़ी संख्या में शव पहुंचने से स्थिति पर काबू रख पाना मुश्किल हो रहा है. मुर्दाघरों में शव रखने की भी एक सीमा है. आजतक/इंडिया टुडे ने दिल्ली में Covid-19 मरीजों के इलाज के लिए निर्धारित एक अहम अस्पताल की मोर्चरी में पहुंच कर जमीनी हकीकत जानी. यह पता करने की भी कोशिश की कि इंसान के मरने के बाद कितने दिन तक शव पर वायरस का असर बना रहता है.

लगातार काम करने का दबाव

मोर्चरी का स्टाफ दिन-रात इस अभूतपूर्व स्थिति से निपटने में लगा है. खुद की सुरक्षा के लिए PPE सूट हैं. लेकिन बिना खाने, बिना पानी कई कई घंटे लगातार काम करने का दबाव कम नहीं है. केयरटेकर के नाते शवों की सही देखभाल, रिश्तेदारों और करीबियों से शव की पहचान कराना, उनके गुस्से का सामना करना सब मोर्चरी स्टाफ का डेली रूटीन है. वहीं मोर्चरी में पहचान के लिए आए मृतकों के रिश्तेदारों में भी हर एक के पास सुनाने के लिए अपना दर्द है.

नसीम अहमद की मौत के बाद उनके Covid-19 पॉजिटिव होने की रिपोर्ट आई. उनका बेटा अब्बू को रुखसत करने आया है. हर कदम के साथ बेटे के चेहरे पर बेबसी झलक रही है. ना ही कोई जनाजा है ना ही रस्म अदाएगी, ना ही आखिरी बार गले लगाने की मंजूरी.

वो रूआंसे गले से बताता है, “हम रोजा रखे हुए थे. हमने बहुत इंतजार किया. हमारी किसी ने मदद नहीं की. आखिर में बोला गया कि सैंपल खो गया. कल सैंपल लिया और 4 घंटे में रिपोर्ट दे दी कि यह पॉजिटिव है. ना कोई करोना के लक्षण थे. उन्होंने कारण यही बताया कि सांस की दिक्कत से मौत हो गई.”

नसीम अहमद को 11 मई को सांस लेने में दिक्कत होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया. कुछ ही घंटों में उन्होंने दम तोड़ दिया. Covid-19 का शक होने की वजह सैंपल जांच के लिए भेजा गया. 5 दिन बाद पता चला कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित थे.

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नसीम अहमद के बेटे ने कहा, “मुस्लिम धर्म में तफसील करना बहुत जरूरी है और हमें लग रहा था कि कहीं बॉडी ना खराब हो जाए. इसलिए हमने सोचा था कि जो Covid-19 मृतकों के लिए जो गाइडलाइंस (प्रोटोकॉल) हैं उसके हिसाब से ही रुखसती कर देंगे. टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आए या नेगेटिव वो बाद की बात है.”

सामाजिक तौर पर कोरोना को लेकर इतनी दहशत है कि कोई भी नहीं चाहता कि अपने किसी की मौत से इस महामारी का नाम जुड़े. इसलिए मुर्दाघरों में शव का इंतजार करने वाले लोग कभी इस स्थिति के लिए किस्मत को कोसते हैं तो कभी अस्पतालों की बेहाली को.

गाइडलाइंस का पालन

फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के हेड की पोस्ट वाले एक अधिकारी कहते हैं, “मृतक के रिश्तेदारों को हम बॉडी देना चाहते हैं कि वो सीधे अंतिम संस्कार कर दें. इसके लिए गाइडलाइंस का पालन करें. छूने से लेकर बॉडी के संपर्क में किसी तरह भी नहीं आना है. कई लोग इस पर अड़ जाते हैं कि हमें तो पहले रिपोर्ट ही चाहिए, उसी के बाद बॉडी को लेंगे. सोशल स्टिग्मा जुड़ गया है. जिसकी वजह से उन्हें ये दिक्कत होती है कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो पड़ोसी क्या बोलेंगे. बहुत बड़ा इशू चल रहा है कि लोग नेगेटिव बॉडी ही लेना चाहते हैं. उसकी वजह से भी हमें कई बार फोन करना पड़ता है, बुलाना पड़ता है रिश्तेदार को.”

आइए अब एक बूढ़ी मां के मन की व्यथा को जानने की कोशिश करते हैं. इस मां का 48 साल का बेटा देवेंद्र दुनिया को अलविदा कह गया. यही मातम कम नहीं है कि बेटे के डेथ सर्टिफिकेट पर कोरोना पॉजिटिव का ठप्पा और लग गया. ये मां दूसरे रिश्तेदारों से बात करते वक्त ये मानने को तैयार नहीं कि उसका बेटा कोरोना वायरस से संक्रमित था. उसका यही कहना है कि बेटे को डायबिटीज थी और उसे सिर्फ जुकाम हुआ था.

ये मां कहती है, “मेरा बेटा अकेला कमाने वाला था. वही हमारा सहारा था, कैसे तबीयत बिगड़ गई. उसको सिर्फ जुकाम हुआ था और कुछ नहीं हुआ था.”

ये एक पेचीदा स्थिति है. अक्सर मोर्चरी के स्टाफ को रिश्तेदारों के गुस्से का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा शव की गरिमा के साथ सही देखभाल का दबाव अलग. साथ ही शवों के आने का सिलसिला कहीं थमने का नाम नहीं ले रहा.

सीनियर टेक्नीशियन राघव (बदला हुआ नाम) का कहना है, “हमारा काम है हम कर रहे हैं. हमारी ड्यूटी बहुत कठिन हो गई है लेकिन हम घबरा नहीं रहे. हर किसी को तसल्ली रहे, इसलिए समय से हर काम कर रहे हैं.”

मोर्चरी में संक्रमण का खतरा

रेड जोन होने की वजह से का जोखिम भी अधिक रहता है. सरकार की ओर से Covid-19 पॉजिटिव बॉडी की हैंडलिंग और पर्यावरण में संक्रमण रोकने के लिए साफ गाइडलाइंस हैं. बॉडी को खास शीट से लपेट कर बैग्स में सील किया जाएगा. अंतिम संस्कार के वक्त मोर्चरी के दो अटैंडेंट मौजूद रहेंगे. ऐसे में स्टाफ किस मानसिक और शारीरिक दबाव से गुजर रहा होगा, समझा जा सकता है.

एक नर्सिंग स्टाफ ने इन शब्दों में अपनी परेशानी बताई- “कोई टाइम नहीं है ड्यूटी का... न खाने का, न नहाने का, न जाने का...घरवाली चिंतित है...बार-बार फोन करती है- कहां हो, कब छुट्टी होगी? कुछ पता नहीं है कब आएंगे, कब जाएंगे?”

मोर्चरी में आए शवों की रिश्तेदारों से पहचान कराना भी स्टाफ के लिए बड़ी दिक्कत वाला है. बहुत केसों में रिश्तेदार पहचान करने के लिए ही नहीं आ रहे. वे पहले ये जानना चाहते हैं कि मृतक की रिपोर्ट पॉजिटिव है या नेगेटिव. ये जान लेने के बाद ही वो तय करते हैं कि मोर्चरी आना है या नहीं. उन्हें डर है कि कहीं वो यहां आकर खुद ही संक्रमित ना हो जाएं.

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मोर्चरी में एक शव राजरानी का भी है. उनके परिवार की खुशियों को कोरोना वायरस ने ऐसा डसा कि पहले बेटा दुनिया चला गया, संक्रमित पति का अस्पताल में इलाज चल रहा है. मोर्चरी में राजरानी के शव को अंतिम संस्कार का इंतजार है. राजरानी के रिश्तेदारों को ढ़ूढने में अधिकारियों और पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी.

दिल्ली पुलिस के जांच अधिकारी (IO) ने बताया, “दो दिन लगे पता लगाने में...थोड़ी इंफॉर्मेशन मिली थी... उनके जो ससुर हैं, देवर हैं, उनको संपर्क किया. फिर पहचान कराने के लिए लेकर आए.’’

सीनियर टेक्नीशियन ने बताया, “मैंने कॉल किया, IO को कॉल किया, अब घरवालों के पहचान करने के बाद डेड बॉडी हैंड ओवर कर रहे हैं.”

वहीं राजरानी के रिश्तेदार ने कहा, “हमें सिर्फ इतना पता चला था कि हमारी भाभी सीरियस है..अब जानकारी मिली तो आए.”

रिश्तेदारों को ट्रैक ओर ट्रेस करने में जहां वक्त लगता है, वहीं टेस्ट का रिजल्ट आने का भी इंतजार करना पड़ता है. ऐसे में मोर्चरी में शवों का बैकलॉग बढ़ता जा रहा है.

मोर्चरी में दो कोल्ड स्टोरेज हैं और कुल 45 शवों को रखने की क्षमता है, हर दिन नए शव आने से मोर्चरी में अब करीब हाउसफुल सी स्थिति है.

एक समय में 45 शव

टेक्नीशियन ने बताया, “यहां सामान्य दिनों में खाली ही रहता था. ज्यादा से ज्यादा 8 से 10 शव ही होते थे. अब ये पूरी तरह भरा है. हमें बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. अगर शव यहां से साथ-साथ जाते नहीं रहेंगे तो हमें नए आने वाले शवों के लिए कोई और जगह तलाश करनी पड़ेगी. हम यहा ज्यादा से ज्यादा एक वक्त में 45 शव ही रख सकते हैं.”

यहां एक अहम सवाल उठता है कि इंसान के मरने के बाद उसके शव पर कब तक वायरस का असर रहता है. मोर्चरी से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर कहा, ‘’ऐसी भी कोई खास स्टडी ज्यादा नहीं हुई है कि कब तक वायरस डेड बाडी में पॉजिटिव रहेगा. हमने चार-पांच दिन बाद एक बॉडी पर टेस्ट किया और वह पॉजिटिव आया. 5 दिन का ऑन रिकॉर्ड रिजल्ट मेरे पास है कि वायरस बॉडी में रहता है. ये नहीं कह सकते हैं वायरस मरने के बाद मर जाता है. हम इस पर आगे भी टेस्ट करेंगे ताकि स्थिति साफ हो.”

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ऐसे हालात में कहना पड़ेगा कि इस महामारी ने मौत के बाद के अंतिम सफर को भी मुश्किल बना दिया है. ये वायरस पहले इंसान को अपनों से अलग कर देता है. फिर मौत के बाद भी कुछ दिन तक उसका पीछा नहीं छोड़ता. जबकि हर कोई इंसान की अंतिम विदाई के बाद उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है.

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