निदा फाजली साहब कह गए हैं...
'हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिस को भी देखना हो कई बार देखना.'
बताइये इतनी फुरसत भी है क्या आम आदमी के पास कि वह किसी आदमी को कई-कई बार देखने लग जाए. फिर ये भी भला कोई बात हुई कि आदमी, एक ही आदमी को कई बार देखे. अजीब नहीं लगेगा इतना देखना.
ऐसा हो सकता है कि निदा साहब ने आमों को बहुत करीब से न जाना होगा, वरना वो कहते कि हर 'ठेले पर होते हैं दस-बीस तरह के आम, जिसको भी खरीदना तो चख कर खरीदना.' हालांकि उन्होंने एक कविता में कुछ ऐसा कहा-
'नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम,
सूरज ठेकेदार सा, सबको बांटे काम.
अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गई धूप.'
तो उन्होंने आम को दो नजर से देखा है. उनका एक नजरिया तो रहा कि आम लापरवाही का प्रतीक हो सकता है, जिसे बड़ी आसानी से तोता कुतर दे रहा है. दूसरा ये कि आम की संगत में जो आता है वो भी अपना काम भूल-भाल जाता है. आप बताइए, धूप का काम मीठा होना है क्या? धूप तो होती है तेज, तीखी, गर्म, झुलसाने वाली, जलाने वाली लेकिन निगोड़ी आम के संग मिलकर मीठी हुई जा रही है. जैसे खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है, जैसे बुरी टोली की संगत में बच्चे बिगड़ जाते हैं, वैसे ही आम की संगत में धूप मीठी हो गई है.
आम आदमी और आम को एक पायदान पर ला खड़ा करती हैं दोनों के बीच कुछ समानताएं. एक समानता तो यही है कि जैसे एक आदमी में दस-बीस आदमी होते हैं वैसे ही एक आम कई-कई नामों से पुकारा जा सकता है. अब सफेदा को ही ले लीजिए. रंग है पीला, इसका गूदा केसरिया, स्वाद ऐसा मीठा जैसे चाशनी या शहद लेकिन नाम है सफेदा. 'यथा नाम ततो गुणः' वाली भीड़ में बिल्कुल विरोधाभासी.
न बहुत बड़े और न ही छोटे, थोड़े अंडाकार और गोल ऊपरी सिरे पर बीच का हिस्सा नोंकदार और पतले पीले छिलके को काटो तो भीतर नजर आती हैं सफेद धारियां. कहते हैं कि इन्हीं सफेद धारियों ने इसे सफेदा नाम दिलवाया, लेकिन ये पूरा सच नहीं है.
आमों के मामले में उनसे जुड़ी अपनी खास किताब (मैग्निफेरा इंडिका) में लेखक सोपान जोशी इस आम के बारे में बहुत विस्तार से लिखते हैं. उनका ये लेख एक तरीके का यात्रा संस्मरण है जिसके केंद्र में आम है और यहां इसका नाम है बंगनपल्ली. क्यों चौंक गए न? ये मत सोचिए कि सफेदे की बात करते-करते बंगनपल्ली पर आ गिरे हैं. असल में यही सफेदा देश की दक्षिणी दिशा में बंगनपल्ली आम कहलाता है.
इसका सफेदा नाम भी इसके ही एक और नाम से पड़ा है, जहां इसे बेनिशां कहते हैं. बेनिशां... मतलब बेदाग. साफ-सुंदर और निष्कलंक. हरे रंग से पक कर पीले होने की प्रक्रिया में ये आम बेहद खूबसूरत हो जाता है. इसका निर्दोष पीला रंग, मलाई जैसा स्पर्श और काटने पर रस की तरह बहने वाला बिना रेशे वाला गूदा. सोपान जोशी तो लिखते हैं कि पहले मैंने कुछ गलत जगहों पर बंगनपल्ली आम खाए और इन्हें फीका बता दिया. तब तक मैंने तटीय आंध्र प्रदेश के बेहतरीन आम नहीं चखे थे. तटीय आंध्र में भी कुछ अच्छे आम मिले, जैसे चिन्नारसालु (छोटा रसीला), पेद्दारसालु (बड़ा रसीला), चेरुकुरसम (गन्ने जैसा रसीला), और पंचधारा कलसा (शहद भरा घड़ा).
इसी जगह वह यह भी बताते हैं कि बंगनपल्ली को ही उत्तर भारत के बाजारों में सफेदा कहते हैं. पश्चिम भारत में यही बादाम कहलाता है, लेकिन आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे बेनिशान कहते हैं, जिसका उर्दू में मतलब है बेदाग. (हालांकि, आंध्र में इसे बनेशान कहते हैं.)
वह लिखते हैं कि 'अब मेरी तलाश शुरू हुई सबसे अच्छे बेनिशान आम की और इसी तलाश में हैदराबाद से 65 किमी दूर सांगारेड्डी पहुंचा. यहां भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) का एक शोध फार्म है. यह पहले हैदराबाद के निजाम के शासनकाल में घोड़ों का अस्तबल और बाग था.
यहां वरिष्ठ वैज्ञानिक किरण कुमार ने उन्हें डाल पर पका हुआ और तुरंत ही पेड़ से तोड़कर लाया फल खिलाया. जैसे ही इसे काटा गया, कमरा तेज सुगंध से भर गया. यह बिना रेशों का और पहले खाए गए बेनिशां की तरह सख्त नहीं था. इसकी मिठास के आखिरी में एक हल्की खटास थी. यह बंगनपल्ली या बेनिशां या सफेदा के पहले असली स्वाद का सुंदर अनुभव था.'
हालांकि अभी भी सोपान जोशी को बंगनपल्ली आमों का सबसे सुंदर स्वाद नहीं मिला था.
ये चाहत पूरी हुई, उस बाग में जहां बेनिशां आमों का जन्म हुआ था. यह बाग कभी बंगनपल्ली के नवाब का था. इसका नाम कौसर बाग था और ये नवाब का पुराना-पसंदीदा आम था. ठेकेदार ने आम खाने की पेशकश की और सोपान जोशी ने कहा- इसके लिए ही तो मैं यहां आया हूं. वह लिखते हैं कि 'इसके बाद पानी की बाल्टी से एक मीडियम साइज का गहरा पीला आम निकाला गया. पानी में पड़े होने के बावजूद इसकी सुगंध में कोई कमी नहीं थी. मैंने अपनी जेब से चाकू निकाला और इस आम की नाजुक त्वचा को काटा, रस का एक सोता मेरी बांह पर बहने लगा. गूदा गहरे नारंगी रंग का था, मीठा और मलाईदार, बिना किसी रेशे के और जब पहला कौर मेरे गले से नीचे उतरा और मेरे पूरे शरीर में खुशी की लहर दौड़ गई. सच्चे बेनिशान की सुगंध बेजोड़ थी. यह मेरे शरीर में बिल्कुल बस गई. मेरे कपड़े, जूते, नोटपैड, पेन, फोन, बैकपैक... सब कुछ आम की महक से भर गया. (दो दिन बाद भी, मेरे पसीने और यहां तक की यूरिन में भी बंगनपल्ली की खुशबू थी.)
तो बात ऐसी है कि आम आदमी को आप बेशक कई बार देख-परख कर पहचानें, लेकिन आम के मामले में जल्दबाजी नहीं करनी है और तमाम नामों से कनफ्यूज भी नहीं होना है. क्योंकि आप भले आम आदमी हों, लेकिन आम, आम नहीं है, बेहद खास है.
विकास पोरवाल