जून का आखिरी सप्ताह है. तपती धरती आसमान की ओर टकटकी लगाए निहार रही है. आषाढ़ के दिन हैं और कहीं बारिश हो रही है तो कहीं होनी है. कुल मिलाकर मानसून का समय आने को है और भारतीय ऋतु परंपरा में ये इंतजार भी उत्सव है. जहां एक तरफ ओडिशा में रज पर्व का उत्सव मनाया जाता है और बिहार में आद्रा पूजन की परंपरा है तो इसी तरह देश का नॉर्थ ईस्ट प्रदेश असम अपनी अलग ही परंपरा का पालन करता है.
असम की पहचान यहां के प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या देवी तीर्थ के तौर पर है और इस धरती के उत्सव और त्योहार भी मंदिर की परंपराओं से जुड़े हुए हैं. कामाख्या मंदिर में मानसून के इसी इंतजार वाले दौर में एक प्रसिद्ध उत्सव होता है अंबुवाची. यह असम में कामाख्या देवी मंदिर में लगने वाला सबसे बड़ा मेला है जो न सिर्फ असम की बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान भी है.
मानसून के दौरान हर साल 4 दिनों के लिए आयोजित होने वाला यह उत्सव कामाख्या मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव है. यहां देवी की पूजा योनि रूप में होती है. माना जाता है अंबुबाची उत्सव के दौरान माता रजस्वला होती हैं, इसके लिए हर साल 22 से 25 जून मंदिर बंद रखा जाता है. 26 जून को शुद्धिकरण के बाद मंदिर दर्शन के लिए खोला जाता है. अंबुबाची मेले के दौरान हर साल यहां लाखों की संख्या में लोग आते हैं. मंदिर बंद रहता है, लेकिन बाहर तंत्र और अघोर क्रिया करने वाले साधकों के लिए ये समय काफी महत्त्वपूर्ण होता है, इस समय में वे अपनी साधनाएं करते हैं.
कहां से आया अंबूवाची?
मानसून का उत्सव अंबुबाची संस्कृत शब्द ‘अंबुवाक्षी’ से आया है, जिसे अंबुबोसी भी कहते हैं. इसका अर्थ है धरती के जल का संरक्षण. कामाख्या मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल है, जहां देवी की यौनि भाग गिरा था. पौराणिक कथा है कि सती ने जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अग्नि समाधि ले ली थी और उनके वियोग में भगवान शिव उनका जला हुआ शव लेकर तीनों लोकों में घूम रहे थे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव को काट दिया था. जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए.
मान्यता है कि इस दौरान, देवी कामाख्या अपने वार्षिक मासिक धर्म चक्र से गुजरती हैं, और यह उत्सव महिला प्रजनन शरीर और प्राकृतिक चक्रों के बीच सामंजस्य का जश्न मनाता है. अम्बुबाची मेले के दौरान, भक्त कामाख्या मंदिर और नीलांचल पर्वत के आसपास विभिन्न स्थानों पर साधना करते हैं. यह मेला तांत्रिकों के लिए भी बहुत महत्व रखता है, और देश-विदेश से लाखों भक्त यहां आते हैं. अंबुबाची के दौरान, हिंदू मास 'आषाढ़' के सातवें से दसवें दिन तक मंदिर के द्वार सभी के लिए बंद रहते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कामाख्या अपने वार्षिक रजस्वला चक्र से गुजरती हैं. बारहवें दिन, मंदिर के द्वार औपचारिक रूप से खोले जाते हैं और उस दिन मंदिर परिसर में एक बड़ा मेला आयोजित होता है.
अंबुबाची" का अर्थ है "जल के साथ बोला गया," और यह भी संकेत करता है कि इस महीने में होने वाली बारिश धरती को उपजाऊ बनाती है, जो प्रजनन के लिए तैयार होती है. इस अवधि के दौरान दैनिक पूजा स्थगित रहती है. कृषि कार्य जैसे खोदना, जुताई, बुवाई और फसलों का रोपण पर भी रोक होती है. यह कुछ-कुछ वैसा ही होता है, जैसा कि ओडिशा के रज पर्व के दौरान परंपरा में होता है.
हालाकि आद्रा और रज पर्व से अंबुवाची कुछ मायनों में अलग है. असल में इस दौरान विधवाएं, ब्रह्मचारी और ब्राह्मण पका हुआ भोजन ग्रहण नहीं करते. चौथे दिन, अंबुबाची समाप्त होने पर, घरेलू सामान, बर्तन और कपड़े पवित्र जल छिड़ककर धोए और शुद्ध किए जाते हैं. इसके बाद देवी कामाख्या की पूजा शुरू होती है और अन्य अनुष्ठान किए जाते हैं. इस समय मंदिर में प्रवेश को बहुत शुभ माना जाता है.
वर्तमान मंदिर का निर्माण इतिहास 15वीं शताब्दी का माना जाता है. उत्सव के 5 दिन यहां बड़ी संख्या में साधक मौजूद होते हैं. इस दौरान मंदिर के पास स्थित श्मशान में भी कई तरह की साधनाएं करते हैं. अघोर पंथ और तांत्रिको के लिए कामाख्या मंदिर सबसे बड़े तीर्थों में से एक है. मान्यता है कि यहां इस दौरान पराशक्तियां जागृत रहती हैं और दुर्लभ तंत्र सिद्धियों की प्राप्ति आसानी से होती है. 26 जून को जब मंदिर खुलता है, तो प्रसाद के रूप में सिंदूर से भीगा हुआ वही कपड़ा यहां दिया जाता है, जो देवी के रजस्वला होने के दौरान उपयोग किया गया था. कपड़े में लगा सिंदूर बहुत ही सिद्ध और चमत्कारी माना जाता है.
कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं. यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में टापू पर स्थित है. मान्यता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है.
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