अगर आप थिएटर के शौकीन हैं, और नाटकों की समझ रखते हैं तो श्रीराम सेंटर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट आपके लिए दो बेहतरीन प्रस्तुतियों की सौगात लेकर आया है. 26 व 27 जुलाई को श्रीराम सेंटर की नाट्य मंडली अपने दो बहुचर्चित नाटकों का मंचन कर रही है, जिसे दर्शकों द्वारा काफी सराहना मिली है. इन नाटकों में है 'स्टक' व 'अग्नि और बरखा'.
स्टक रंगमंडल की बिल्कुल ही नई कृति, नई रचना और नई प्रस्तुति है. इसमें आज के दौर की मेट्रो सिटी वाली समस्या है. समस्या जो हमारे संबंधों पर असर डालती है और जिसके बारे में अभी भी खुलकर बात कर पाना शायद मुनासिब नहीं हो पाया है. दूसरी ओर है रंगमंडल की प्रस्तुति अग्नि और बरखा, जो एक पौराणिक आख्यान से निकली है. महाभारत की कथा में वन प्रसंग के बीच आने वाला ऋषि रैभ्य का प्रकरण, देश-काल-समाज की परिस्थितियों का लेखा-जोखा है, जिसे प्रख्यात अभिनेता और रंगकर्मी, नाटककार गिरीश कर्नाड ने लगभग 60 साल पहले लिखा था.
दर्शक 26 जुलाई को शाम सात बजे स्टक और 27 जुलाई को ही शाम सात बजे, 'अग्नि और बरखा' देख सकेंगे. इसकी टिकट बुकिंग ऐप के जरिए या फिर थिएटर विंडो से भी ली जा सकती है.
क्या है स्टक की कहानी?
आज के दौर में कपल्स के बीच जो नया डर उपजा है, वह है प्यार के बावजूद एक-दूसरे को खो देने डर. फिर इसी डर से रिश्तों के बीच होती है झूठ की आमद... दबे पांव, धीरे-धीरे, बेहद आहिस्ता. फिर शुरू होता है टकराव का दौर. एक तरफ होता है सच्चा प्यार और दूसरी ओर झूठ. ऐसी ही कुछ बेसिक सी बातों को लेकर मंच पर उतरता है Stuck नाटक. कलाकार सच-झूठ की ऐसी उलझनों में फंसे नजर आते हैं कि, नाटक का नाम Stuck अपनी इस व्यथा-कथा को सुनाने के लिए सही साबित होता है. मंच पर लगभग 2 घंटे तक छह किरदार, खूबसूरत वादियों के कृत्रिम कैनवस पर अजीब ही मनोवैज्ञानिक उलझन में फंसे दिखते हैं.
ठीक तरीके से कहा जाए, तो जब ईर्ष्या, विश्वासघात और आत्म-संदेह हावी होने लगते हैं, तो "स्टक" यह खोजता है कि क्या रिश्तों में पूरी ईमानदारी टिकाऊ है या रिश्ते में सर्वाइव करने के लिए झूठ भी जरूरी है. हास्य, संघर्ष और कच्ची उम्र की भावनाओं के जरिए से, नाटक नए जमाने के इस दौरा में रिश्तों में सच और छल के बीच नाजुक संतुलन की पड़ताल करता है.
बाकी और बातें समझने के लिए आपको थियेटर का ही रुख करना चाहिए.
अग्नि और बरखाः पौराणिक आख्यान में छिपा सामाजिक सच
अग्नि और बरखा की कहानी सूखे, बारिश के लिए होने वाले यज्ञ, व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और भावनात्मक उथल-पुथल में फंसे लोगों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है. सूखा न केवल भूमि पर असर डालता है, बल्कि सुखा देता है वह मन के भावों को भी, आंसुओं को भी और प्रेम पनपने वाले हृदयों को भी. नाटक के पात्र अपने आंतरिक तूफानों से भी जूझते हैं.
गिरीश कर्नाड के लेखन में इतना विस्तारित आयाम है कि वह अपने नाटक के विषय के तौर पर महाभारत के वनपर्व में शामिल एक कथा को आधार बनते हैं, लेकिन उसे चमत्कार, वरदान और दैवीय कार्यकलापों से दूर रखते हुए इतना सरल और मानवीय बनाते हैं कि जिससे पुराण कथाओं को एक नए संदर्भ में देखने का नजरिया पैदा होता है. साथ ही हम उस सच से रूबरू होते हैं जो इंसान का सच है. हम सवाल पूछते हैं खुद से कि ये तपस्या, कर्मकांड, तमाम विधियां मनुष्य को दुख देकर क्यों पूरी होती हैं. ये कौन से नियम हैं जो मनुष्य को मनुष्यता से दूर कर देते हैं. अगर इन्हीं नियमों से कल्याण होना है तो फिर देवता और राक्षस कहां अलग हुए?
श्रीराम सेंटर परफॉर्मिंग आर्ट्स में होने वाले ये दोनों ही नाटक एक सौगात की तरह हैं, जो मनोरंजन का माध्यम तो हैं, साथ ही नैतिक मूल्यों का भी निर्माण करते हैं.
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