अभिनय को सुरों से रंगता रंग संगीत... राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की 60 वर्षों की संगीतमय रंग यात्रा

भारतीय रंगमंच की समृद्ध परंपरा में संगीत हमेशा से एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) रंगमंडल के 60 वर्षों की शानदार यात्रा में रंग संगीत ने नाटकों को जीवंत करने में प्रमुख भूमिका निभाई है. विभिन्न शैलियों के नाटकों में लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के मिश्रण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है.

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रंग संगीत नाट्य विद्यालय की 60 वर्षों की संगीतमय यात्रा है रंग संगीत नाट्य विद्यालय की 60 वर्षों की संगीतमय यात्रा है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अगस्त 2025,
  • अपडेटेड 6:48 PM IST

भारतीय रंगमंच ललिता कला का ऐसा अनूठा और अभिन्न हिस्सा है, जिसमें सभी मनमोहक कलाएं आकर समाहित हो जाती हैं. भले ही रंगमंच के प्राण अभिनय कला में बसते हो, लेकिन यह नृत्य-गीत-संगीत, वाद्य, प्रकाश, मंच सज्जा, जरूरत पड़ने पर चित्रकारी और वेश-रूप सज्जा के बिना सिर्फ अधूरी ही नहीं निष्प्राण भी है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, जो बीते कई दशकों से रंगमंच की सेवा और तपस्या में लगा हुआ, जिसके आंगन से प्रख्यात रंगकर्मी विश्व के रंग पटल पर रंगमंच को सजीव बनाए हुए हैं, रंगमंच के इस अनूठे मंच ने इस कला की आत्मा को भी खास तवज्जो दी है.

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भारतीय रंगमंच की समृद्ध परंपरा में संगीत हमेशा से एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) रंगमंडल के 60 वर्षों की शानदार यात्रा में रंग संगीत ने नाटकों को जीवंत करने में प्रमुख भूमिका निभाई है. विभिन्न शैलियों के नाटकों में लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के मिश्रण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है. कई बार दर्शक केवल संगीत और गीतों का आनंद लेने के लिए ही नाटक देखने आए. ये गीत ऐसे प्रसिद्ध और दिल में बस जाने वाले रहे कि नाटक की समाप्ति के बाद जब दर्शकों ने सभागार से निकलकर घर का रुख किया तो उनके रास्ते नाटकों के इन जीवंत गीतों से गुलजार रहे. 

60 वर्षों की अद्भुत विरासत है रंग संगीत
रंगमंडल के असली रंगभरे गीतों को दर्शकों के बीच लाने के लिए दिल्ली स्थित एनएसडी ने 'रंग संगीत' की परिकल्पना की. एक कल्पना हुई तो इसे साकार किया एनएसडी की रंगमंडल कंपनी और इस कड़ी में जो भी प्रमुख नाटककार और उनकी नाट्यकृतियां रहीं, उनके लिए रचे गए गीतों के ही संकलन और उनके खूबसूरत प्रदर्शन का नाम है 'रंग संगीत'. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बीते दिनों हुए ग्रीष्मकालीन नाट्य उत्सव के दौरान 'रंग संगीत' की अद्भुत प्रस्तुति दी गई.  इस दौरान 60 वर्ष तक पुराने नाटकों के दौरान गाए हुए गीतों की प्रस्तुति दी गई. नाट्य कलाकारों ने मंच पर लाइव इन गीतों की प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन मोह लिया. 

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सबसे पहले नाटक मत्तविलास नाटक से गीत की प्रस्तुति दी गई. जिसमें शास्त्रीय और लोक परंपराओं का संगम नजर आया. कोवलम नारायण पणिकर जिन्होंने संस्कृत को आधुनिक रंगकर्म की भाषा में बदला और संस्कृत नाटकों को नई विधा में प्रदर्शन के अनुरूप ढाला, उनके इस नाटक में शास्त्रीय और केरल की लोक परंपराओं का गहरा जुड़ाव देखने को मिलता है. राग भूपाली पर आधारित इसकी संगीत रचना में शंखनाद, बांसुरी की तान, सितार, और सारंगी की धुनें माहौल को जीवंत बनाती हैं. तबले का रेला और चक्करदार तिहाई इस रचना को और भी प्रभावशाली बनाते हैं. गीत के बोल, तराना और तबले की शब्दावली इतनी खूबसूरती से शामिल की गई है जैसे “तक तिक्क ता किटतक तक धीम,” जो दर्शकों को संगीत और नाट्य का अनूठा अनुभव प्रदान करते हैं. पणिक्कर की यह रचना रंगमंडल की संगीतमय शुरुआत का प्रतीक है.

नाटक बाबूजी के गीत ने मोहा मन
अगली कतार में थे बीवी कारंत, जिन्हें भारतीय रंगमंच में नाट्य संगीत के मनीषी का दर्जा प्राप्त है. भारतीय रंगमंच में बी.वी. कारंत का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है. एनएसडी के निदेशक, भारत भवन रंगमंडल, भोपाल और कर्नाटक रंगायन (मैसूर) के संस्थापक निदेशक रहे कारंत ने रंगमंच को नए आयाम दिए. उनके द्वारा संगीतबद्ध नाटकों जैसे तुगलक, छोटे सैयद बड़े सैयद, अग्नि और बरखा, और आनंदमठ का पोथा ने दर्शकों का कई बार दिल जीता. 

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कारंत को संगीत नाटक अकादमी, कालिदास सम्मान, और अमृतलाल नागर जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनकी स्मृति में 'रंग संगीत' के अंतर्गत नाटक 'बाबूजी' का गीत प्रस्तुत किया गया. असल में यह गीत नहीं, गणेश वंदना थी, जिसके शब्द थे,  “गजाननं भूतगणादि सेवितं” इस गीत में गणेश वंदना और नाटक के आनंदमय माहौल का सुंदर चित्रण है.

हबीब तनवीर ने भारतीय रंगमंच में लोक और आदिवासी कलाओं को मजबूती से स्थापित किया. छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को प्रशिक्षित कर उन्होंने चरणदास चोर जैसे नाटकों का मंचन किया, जो विश्व स्तर पर सराहा गया. 1989 में तनवीर ने माक्सिम गोर्की के नाटक दुश्मन का निर्देशन और संगीत रचना की. इस नाटक का गीत “नाव भी है तैयार मुसाफिर” मेघ राग पर आधारित है, जो तूफान और बाढ़ के बीच जीवन के संघर्ष को दर्शाता है. गीत के बोल, जैसे “हवा के झोंके खंजर जैसे, और बोसिदा पार,” दर्शकों को भावनात्मक गहराई तक ले जाते हैं.

लोक विधा के गीत ने किया रोमांचित
कतार में अगले नाम रहे पंचानन पाठक, जिन्हें रंगमंडल ने सराहते हुए उनके विशिष्ट कार्यों पर प्रकाश डाला. रंगमंडल के शुरुआती वर्षों में उन्होंने लहरों के राजहंस, अंधायुग, और द फादर जैसे नाटकों का संगीत तैयार किया. उनके ही संगीत से सजे गीत “पांच रुपैया बारह आना दे दे रे बालम, मेला देखन जाऊंगी” अपनी सादगी और उत्साह के लिए प्रसिद्ध है. इस गीत में मेले की मस्ती और लोक जीवन की जीवंतता झलकती है. 

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उत्तराखंड के मोहन उप्रेती ने रंगमंच में लोक संगीत और लोक धुनों का अनूठा उपयोग किया. रानावि में संगीत के शिक्षक रहे उप्रेती ने सदनगुप्त, मस्जिद वाली हूर, घासीराम कोतवाल, और इंदर सभा जैसे नाटकों का संगीत रचा. इंदर सभा का गीत “जफा ओ सितम की सजावार हूं” अपनी भव्यता और विविधता के लिए प्रसिद्ध हुआ. उप्रेती ने कुमाऊं की लोक धुनों को रंगमंच में जीवंत किया.

रंग संगीत में नाट्य गीतों की प्रस्तुति का ये सिलसिला लंबा चला और फिर जब समापन की वेला आई तो भरत वाक्य से इसका समापन हुआ. इस दौरान प्रो. विदुशी रीता गांगुली के भरत वाक्य “ओ नट देवता” से करते हैं. उनके नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम की प्रस्तुति रंगमंडल की सांगीतिक विरासत का प्रतीक है. रंगमंडल की 60 वर्षों की यात्रा में रंग संगीत ने नाटकों को न केवल जीवंत किया, बल्कि भारतीय लोक और शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपराओं को भी विश्व मंच पर ले गया. ये संगीतकार और उनकी रचनाएं भारतीय रंगमंच की आत्मा हैं, जो दर्शकों को भावनात्मक और सांस्कृतिक यात्रा पर ले जाती हैं.

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