बेवक्त रोपण और लापरवाही, जानें कैसे किसानों के लिए काली कथा बनी काली मिर्च

काली मिर्च एक ग्लोबल उत्पाद है, जिसकी मांग पूरे विश्व में हैं, या यू कहें कि भारत से ज्यादा उत्तरी व पश्चिमी देशों में इसकी डिमांड है, वहां लाल या हरी मिर्च की अपेक्षा लोग काली मिर्च का उपयोग ज्यादा करते हैं. भारत के केरल राज्य में इसका सबसे ज्यादा उत्पादन होता है, इसके अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र व असम में भी इसकी फसल ली जाती है

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Black Pepper Cultivation Black Pepper Cultivation

धर्मेन्द्र महापात्र

  • बस्तर,
  • 15 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 10:41 AM IST

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर-बस्तर में काली मिर्च की फसल से यहां के किसान मालामाल हो सकते हैं. यहां की जलवायु और हालात काली मिर्च की पैदावार के लिए न सिर्फ उपयुक्त है, बल्कि बंपर पैदावार भी दे सकती है. हालांकि, वन विभाग की लापरवाही के चलते किसानों तक पहुंचने से पहले ही इस योजना ने दम तोड़ दिया. विभाग ने ऐसे समय में पौधों का वितरण और रोपण करवाया जब इसका समय ही नहीं था. इससे पौधे सूख गये और इसे असफल करार दे दिया गया.

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काली मिर्च एक ग्लोबल उत्पाद है, जिसकी मांग पूरे विश्व में हैं. भारत से ज्यादा उत्तरी व पश्चिमी देशों में इसकी डिमांड है, वहां लाल या हरी मिर्च की अपेक्षा लोग काली मिर्च का उपयोग ज्यादा करते हैं. भारत के केरल राज्य में इसका सबसे ज्यादा उत्पादन होता है, इसके अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र व असम में भी इसकी फसल लगाई जाती है. छत्तीसगढ़ के बस्तर में काली मिर्च की फसल के लिए अनुकूल मौसम एवं परिस्थिथियां मौजूद है. इसके बावजूद भी यहां के किसानों को जागरूक करने में शासन-प्रशासन विफल है. आलम यह है कि उन्नत कृषक राजाराम त्रिपाठी के सफल प्रयोग से प्रेरित होकर शासकीय प्रयास किए गये, लेकिन अनभिज्ञता एवं लापरवाही के चलते यह योजना परवान चढ़ने से पहले ही विफल हो गयी.

1000 पौधे बांटे गये थे

कोण्डागांव जिले के कृषकों को करीब 5 वर्ष पूर्व काली मिर्च के करीब 1000 पौधे सब्सिडी में वितरित किये गये थे. इसे लगाने का सही समय मॉनसून से पूर्व अर्थात जून या जुलाई होता है, लेकिन पौधों का वितरण व रोपण अक्टूबर-नवम्बर में किया गया, जिससे पौधे सूख गये, जिसके बाद विभाग ने इसे असफल करार दे दिया. बस्तर अंचल में कोण्डागांव जिले के कई गांव जिसमें पलना, रांधना, जड़कोंगा, काटागांव, माकड़ी व अन्य कुछ गांव शामिल हैं वहां के कृषकों द्वारा काली मिर्च की फसल ली जा रही है, जिसकी क्वालिटी केरल में होने वाली काली मिर्च से कई गुना बेहतर है, जहां उन्हें प्रति वर्ष 2 से 3 लाख रुपये की आमदनी भी हो रही है.

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कमीशनखोरी की गर्त में समा गयी काली मिर्च की कृषि

बस्तर में काली मिर्च की कृषि को बढ़ावा देने के लिए किये गये प्रयास कमीशनखोरी की गर्त में समा गयी. काली मिर्च की कृषि के लिये पांच वर्ष पूर्व कोण्डागांव में वन विभाग ने पौधों का वितरण किया जाना था. तत्कालीन डीएफओ ने इसके लिए आंध्रप्रदेश से करीब 1 हजार पौधे मंगवाये लेकिन ये पौधे गुणवत्ताविहीन थे, आंध्र में काली मिर्च की कृषि नहीं होती और न ही वहां के पौधों में सही फल लग पाते, वातावरण परिवर्तित होने से ये पौधे यहां पनप ही नहीं पाये.

बस्तर में काली मिर्च की खेती की अपार संभावनाएं है, जिसके सफल प्रयोग के बाद इसके विस्तार को लेकर प्रयास किये गये, पर कमीशनखोरी और गलत नीतियों के कारण योजना सफल नहीं हो सकी.बताया जाता है कि कोण्डागांव के नारियल विकास बोर्ड में काली मिर्च की सफल कृषि को देख तत्कालीन कलेक्टर धनंजय देवांगन ने योजना बनायी थी कि जिले के किसानों को काली मिर्च की कृषि के लिए प्रेरित किया जाये,जिसे  तत्कालीन डीएफओ से चर्चा की, डीएफओ ने इसके लिए आंध्रप्रदेश से पौधे मंगवाने की बात कही उस दौरान यहां की मां दंतेश्वरी महिला स्व सहायता समूह के माध्यम से पौधों का वितरण करवाया गया, लेकिन पौधे पनप नहीं पाये, क्योंकि आंध्रप्रदेश और बस्तर की जलवायु में काफी अंतर है. यही नहीं वहां के पौधे भी केरल या कर्नाटक की अपेक्षा गुणवत्तापूर्ण नहीं थे.

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विधि के विपरीत लगाये गये पौधे

हर फसल या पौधों की बागवानी या कृषि के लिए एक विधि होती है जो पारंपरिक हो सकती हैं या आधुनिक भी. इस विधि के विपरीत यदि रोपण किया जाये तो उसके पनपने की संभावनाएं कम ही होती हैं. यहां भी जब ग्रामीणों व कृषकों को पौधे दिये गये उन्हें ठीक ढंग से विधि से अवगत नहीं कराया गया, जिसके चलते पौधे पनप नहीं पाए.

सही पेड़ों का चयन भी जरूरी

काली मिर्च की लताओं को पनपने के लिए सहारे की जरूरत होती है, ज्यादातर पौधों को दूसरे पेड़ों के सहारे ही चढ़ाया जाता है, जिसमें कटहल, आम, साल, नारियल, अकेसिया के पेड़ उपयुक्त होते हैं, इन पेड़ों से भी उन्हें बाहरी पोषण प्राप्त होते हैं. लेकिन यहां इसका भी ध्यान नहीं रखा गया, जिससे भी यह योजना असफल हो गयी.

बस्तर में काली मिर्च की काली कथा

बस्तर में वन और उद्यान विभाग ने जिस काली मिर्च की कृषि को असफल करार दिया, कुछ कृषकों द्वारा उसकी बंपर पैदावार की जा रही है. बस्तर में बहुतायत में मौजूद साल के पेड़ों पर काली मिर्च की लताएं लिपटाकर उससे प्रति वर्ष हजारों-लाखों की आमदनी हो रही है, यदि शासकीय स्तर पर प्रयास किये जाते तो बिना किसी परिश्रम के बस्तर के ग्रामीण व कृषक लखपति बन सकते हैं, क्योंकि यहां हर जगह साल के पेड़ मौजूद हैं. ज्ञात हो कि काली मिर्च को मसालों का राजा या काला सोना भी कहा जाता है.

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काली मिर्च की सफल कृषि कर आमदनी प्राप्त कर रहे उन्नत कृषक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि यह प्रयोग कोण्डागांव के केन्द्रीय नारियल विकास बोर्ड में किया था, जहां नुकसान से उबरने के लिए नारियल के पेड़ों पर काली मिर्च की लताएं चढ़ाये जाने की सलाह दी, जिसके बाद वहां अच्छी पैदावार होती देख उन्होंने इसका प्रयोग साल वृक्षों पर किया, यहां भी बेहतर पैदावार हो रही है. वर्तमान में ग्राम पलना में राजकुमार साहू, ग्राम मरका में संतूराम, ग्राम माकड़ी में मिट्ठूराम सहित कई कृषक साल वृक्षों के नीचे काली मिर्च के पौधे लगाकर उससे आमदनी प्राप्त कर रहे हैं, क्वालिटी अच्छी होने की वजह से उन्हें बाजार भी अच्छा मिल रहा है. लेकिन अन्य कृषकों को प्रोत्साहित नहीं किये जाने से वे लखपति बनने से वंचित हैं.

बस्तर में संभावनाएं कई गुना

बस्तर अंचल में हर ओर साल के पेड़ मौजूद है, और साल वन में काली मिर्च की अच्छी फसल ली जा सकती है. ग्रामीणों और स्व सहायता समूहों को प्रोत्साहित कर विशेषज्ञों की देख-रेख में हर वर्ष अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन शासकीय तौर पर इसके लिए प्रयास शून्य है. 

उन्नत कृषक एवं कृषि विशेषज्ञ डॉ राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि काली मिर्च की कृषि के लिए बस्तर उपयुक्त इसलिए है क्योंकि बस्तर समुद्री तल से ऊंचाई में होने के कारण यहां का वातावरण अनुकूल है, काली मिर्च की खेती के लिए 23 से 32 डिग्री सेल्सियस के बीच औसत तापमान अधिक उपयुक्त है, और बस्तर का यह औसत तापमान है, यही नहीं यहां की मिट्टी भी उपजाऊ है.

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वन विभाग का दावा, काली मिर्च के सवा लाख पौधे किये वितरित

काली मिर्च की कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रशासनिक पहल पर कोण्डागांव जिले में शुरू की गयी योजना आम ग्रामीण और किसानों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ चुकी है. वन विभाग का दावा है कि इस योजना के तहत करीब 1 लाख 27 हजार पौधों का वितरण किया गया था, लेकिन इनमें से कितने जीवित बचे हैं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. डीएफओ ने दावा किया कि कुछ जगहों पर साल के वृक्षों पर पौधों के बेल लगे हुए हैं जिनमें अब फल आने लगे हैं. डीएफओ दक्षिण कोण्डागांव रमेश कुमार जांगड़े ने कहा कि दक्षिण कोण्डागांव वनमंडल में वर्ष 2006 से 2009 के बीच दहीकोंगा परिक्षेत्र अंतर्गत वन कक्षों के साल वनों में वनौषधि पादप बोर्ड के सहयोग से प्रयोगात्मक कृषि के रूप में साल वृक्षों में काली मिर्च के 7000 और 15000 बेल चढ़ाये गये थे.

वर्ष 2014-15 में पुनः आईएपी योजनांतर्गत कालीमिर्च के 1 लाख पौधों को कोपाबेड़ा नर्सरी में विकसित कर पंचायतों के माध्यम से ग्रामीणों को वितरित किये गये. इस हिसाब से वर्ष 2009 में रोपण पश्चात 13 वर्ष में कोण्डागांव जिले में काली मिर्च का उत्पादन 8 वर्ष पूर्व से ही हो जाना चाहिए था. काली मिर्च के पौधे विकसित होने के बाद 3 से 4 साल में फल देने शुरू कर देते हैं, लेकिन वन विभाग का दावा है कि अब इन पौधों में फल लगने लगे हैं, इन फलों की गुणवत्ता का भी परीक्षण होनी चाहिए.

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अब तक 30 लाख रुपये किये खर्च

वन विभाग के मुताबिक प्रथम चरण में वर्ष 2006 से 2009 में 8.80 लाख और 7.90 लाख रुपये तथा उसके बाद वर्ष वर्ष 2014-15 में पुनः आईएपी योजनांतर्गत इस तरह कुल 29.7 लाख रुपये की लागत से काली मिर्च के पौधों को तैयार करवाकर उसे वितरित किये गये. इतनी राशि खर्च किये जाने के बाद भी लाभ के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है.

निजी तौर पर लगाये पौधे बेहतर

उल्लेखनीय है कि कोण्डागांव के कोपाबेड़ा स्थित नारियल विकास बोर्ड के अलावा उत्कृष्ट कृषक डॉ राजाराम त्रिपाठी द्वारा काली मिर्च की फसल ली जा रही है, लेकिन वन विभाग द्वारा जिन साल वृक्षों पर काली मिर्च का रोपण कर लताएं चढ़ायी गयी है उसमें लग रहे फल और निजी तौर पर लगाये पौधों से मिल रहे फल में काफी फर्क है. हमें सिर्फ एक वर्ष ही काली मिर्च के पौधों को वितरित किये जाने प्रोजेक्ट दिया गया था, जिसके हमने पूरा कर दिया, अब इनमें फूटिंग होने लगी है, उसके बाद से कोई दिशा निर्देश हमें नहीं मिला.

 

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