बैंक की नौकरी छोड़ पति-पत्नी बने किसान, अपने साथ 2000 लोगों की करा रहे कमाई

कभी बैंकर रहे प्रतीक और प्रतीक्षा आज जैविक खेती से बढ़िया मुनाफा कमा रहे हैं. अब वह अपनी सब्जियां देश के कई हिस्सों में निर्यात करते हैं. इसके अलावा बढ़िया बाजार उपलब्ध करा अन्य किसानों की आमदनी भी बढ़ाने का काम कर रहे हैं.

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Bankers turned in to farmers Bankers turned in to farmers

मनीष चौरसिया

  • भोपाल,
  • 26 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 7:18 PM IST

बैंकिंग सिस्टम के कभी टॉप मैनेजमेंट में काम करने वाले भोपाल के प्रतीक और प्रतीक्षा आज ऑर्गेनिक खेती के भी मास्टर हो चुके हैं. 10 साल बैंकिंग सेक्टर में काम करने के बाद दोनों पति-पत्नी ने नौकरी छोड़ जैविक खेती की शुरुआत की.अब वह इससे उन्होंने बढ़िया मुनाफा कमाने लगे हैं. प्रतीक की मानें तो 2 हज़ार किसानों से जुड़कर उनकी आमदनी बढ़ाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई है.

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प्रतीक कहते हैं कि ऑर्गेनिक फार्मिंग ट्रेडिशनल फार्मिंग से थोड़ी ज्यादा महंगी होती है.  किसान ऑर्गेनिक फार्मिंग करने से इसलिए बचता था क्योंकि उसकी पहुंच सीधे ग्राहक तक नहीं थी. उसे नहीं पता था कि ऑर्गेनिक सब्जियों को कहां बेचना है. बिचौलिए उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा रख लेते थे. यही वजह है कि किसान ऑर्गेनिक फार्मिंग में इंटरेस्ट नहीं ले रहे थे. 

'घरवालों से मांगे दो साल'

प्रतीक बताते हैं की ऑर्गेनिक फार्मिंग करने की शुरुआत तब महसूस हुई जब हमारी बेटी हुई. हम चाहते थे कि बेटी को सब कुछ शुद्ध खिलाएं. जब हमने खेती करने का फैसला लिया तो घर में सब परेशान हो गए. सभी ने इस काम में हाथ न आजमाने की बात कही. प्रतीक ने घर वालों से 2 साल का वक्त मांगा.  हालांकि इन 2 साल में वो ठीक तरह से पैर नहीं जमा पाए थें. वह कई बार यह सोचते थे कि बिजनेस बंद करते हैं और दोबारा बैंकिंग सेक्टर में लौट जाते हैं.

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'शादी रुकते रुकते बची'

प्रतीक की पत्नी प्रतीक्षा के पिता रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर है प्रतीक्षा बताती हैं कि प्रतीक शुरू से ही फार्मिंग को लेकर काफी पैशनेट था. प्रतीक्षा बताती है कि जब प्रतीक और उनकी फैमिली की फर्स्ट मीटिंग हुई तो इस मीटिंग में बातों बातों में प्रतीक ने बोल दिया कि अगर नौकरी नहीं करूंगा तो मैं खेती करूंगा. इस बात पर मेरे पिता थोड़ा नाराज हो गए और उन्होंने हमसे कहा कि तुम्हें इतना पढ़ाया-लिखाया इसलिए नहीं कि तुम कल को खेती करो. प्रतीक्षा कहती हैं इस बात से एक वक्त तो ऐसा लगा कि हमारी शादी नहीं हो पाएगी लेकिन फिर बाद में सब कुछ ठीक हो गया. 

'जब कैंसर पेशेंट के पिता ने कहा थैंक्यू'

प्रतीक्षा बताती है कि इस पूरी जर्नी में कई बार ऐसा हुआ जब हमें बिजनेस बंद करने का ख्याल आया लेकिन अक्सर किसान या फिर कस्टमर का रिएक्शन देखकर हमें काम करने की प्रेरणा मिलती थी. प्रतीक्षा बताती हैं कि हमारे बताए गए तरीकों की वजह से कई किसानों की आय में इजाफा हुआ. वहीं एक बार हमारे एक कस्टमर ने बताया कि उनके बच्चे को कैंसर हो गया और डॉक्टर ने उसे सिर्फ ऑर्गेनिक फूड ही खिलाने की सलाह दी है. उन्हें मार्केट में कहीं भी अच्छा ऑर्गेनिक फूड नहीं मिल रहा था. प्रतीक और प्रतीक्षा के जरिए उन तक वह ऑर्गेनिक फूड पहुंचने लगा. प्रतीक्षा बताती हैं कि उसके कैंसर पेशेंट के पिता ने हमें थैंक्यू बोला. ऐसे लोगों की बातों से हमें आगे बढ़ने में प्रेरणा मिली.

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'मम्मी-पापा से भी सब्जियां बिकवाई'

प्रतीक्षा बताती है कि जब हमने ऑर्गेनिक फार्मिंग में कदम रखने के बाद अपने घर वालों को बताई तो मेरे घर वाले बहुत नाराज हो गए. पापा ने मुझसे कहा कि तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. हालांकि जैसे जैसे हमारा काम आगे बढ़ा तो उनको भी एहसास हुआ कि हम कुछ अच्छा काम कर रहे हैं.  शुरुआत में हमारे कस्टमर हमारी सोसायटी में रहने वाले लोग ही थे. यहां तक कि मैंने अपने मम्मी पापा से भी उनकी सोसाइटी में अपनी सब्जियां बिकवाई हैं.

प्रतीक और प्रतीक्षा बताते हैं कि बिजनेस में एक वक्त ऐसा भी आया कि हमने सब कुछ पैक करने की सोच ली हमें लगा कि अब ये काम हमसे नहीं हो पाएगा. हम फाइनेंशली भी बहुत दिक्कतों में थे लेकिन तभी कोरोना आ गया. कोविड में लोग इम्यूनिटी की बात करने लगे और इम्यूनिटी के जरिए ऑर्गेनिक फूड की बात होने लगी इसके बाद ऑर्गेनिक फूड का चलन बढ़ा और हमारी दुकान चल पड़ी.

 

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