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29 दिन में ढह गया गोपालगंज का पुल, ये 100 साल बाद भी हैं बुलंद!

29 दिन में ढह गया गोपालगंज का पुल, और ये 100 साल बाद भी हैं बुलंद!
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बिहार के गोपालगंज में सत्तरघाट पुल महज 29 दिनों के भीतर ही बारिश की भेंट चढ़ गया. यह पुल गंडक नदी पर बना है, जहां बाढ़ आने से इस पुल की एप्रोच रोड बह गई. इस पुल की लागत करीब 264 करोड़ रुपये है. इस पुल का गिरना देश भर में सुर्खियां बना. लेकिन देश में ऐसे भी पुल हैं जो 100 से 150 साल से ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक चले और कई तो आज भी उपयोग में हैं. आज हम आपको भारत के ऐसे ही टॉप 10 पुलों के बारे में बता रहे हैं, जिन पर समय या प्राकृतिक आपदा की मार का भी कोई असर नहीं पड़ा.

29 दिन में ढह गया गोपालगंज का पुल, और ये 100 साल बाद भी हैं बुलंद!
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द हैवलॉक ब्रिज
द हैवलॉक ब्रिज आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर बना पुल है. इसका एक और प्रसिद्ध नाम ओल्ड गोदावरी ब्रिज है. यह भी एक रेल ब्रिज है. यह पुल 1900 में बना था और इसने करीब 97 साल तक देश की सेवा में योगदान दिया. इसे 1997 में डिकमीशन यानी बंद कर दिया गया था. इसकी लंबाई करीब 2.7 किमी थी. यह हावड़ा से मद्रास को जाने वाली ट्रेनों का रास्ता था. इस पुल की जगह बाद में गोदावरी आर्च ब्रिज ने ले ली. हैवलॉक ब्रिज का नाम मद्रास के तत्कालीन गवर्नर आर्थर ए. हैवलॉक के नाम पर रखा गया था. इसे पत्थरों और स्टील से बनाया गया था. इसमें 56 पिलर थे. इस पुल की उम्र 100 साल आंकी गई थी और यह लगभग अपनी उम्मीदों पर खरा भी उतरा. वैसे यह पुल अब भी सेवारत है. अब इसमें से पानी की पाइपलाइन जा रही हैं. राष्ट्रीय धरोहर घोषित होने के बाद से यह टूरिस्ट स्पॉट भी बन गया है.
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ओल्ड नैनी ब्रिज
ओल्ड नैनी ब्रिज देश के सबसे पुराने और लंबे पुलों में शुमार होता है. यह पुल 1865 में यमुना नदी पर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में बना था. यह भी डबल डेकर स्ट्रील ब्रिज है. इस पुल से भी ट्रेन और गाड़ियां दोनों गुजरती हैं. इसके ऊपरी हिस्से में डबल रेलवे लाइन है. 1927 के बाद से इसके नीचे के हिस्से से सड़क यातायात भी होकर गुजरता है.
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जुबिली ब्रिज
जुबिली ब्रिज पश्चिम बंगाल की हुगली नदी पर बना रेल ब्रिज है. अंग्रेजों के समय में बने इस पुल का नाम पड़ने के पीछे दिलचस्प कहानी है. यह पुल 1885 में खोला गया था, जो कि ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के शासन का 50वां साल यानी जुबिली ईयर था. इसलिए इसका यही नाम रखा गया. इसे पूरी तरह से बनने में 5 साल (1882-1887) लगे थे. इस पुल के चीफ इंजीनियर ले. कर्नल आर्थर जॉन बेरी थे जो प्रसिद्ध लंदन टावर ब्रिज बनाने वाले जॉन वोल्फ बैरी के भतीजे थे. जुबिली ब्रिज की खास बात यह है कि इसे बनाने में किसी भी नट-बोल्ट का इस्तेमाल नहीं किया गया. इस पुल ने देश को करीब 130 साल तक सेवाएं दी और 2016 में इस पर से आवागमन बंद कर दिया गया. तब से यहां का ट्रैफिक समप्रीति ब्रिज पर डायवर्ट कर दिया गया है.
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नैपियर ब्रिज
नैपियर ब्रिज दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के चेन्नई में कूवम नदी पर बना है. यह पुल 151 साल पहले 1869 में बना था. असल में यह सैंट जॉर्ज किले को प्रसिद्ध मरीना बीच से जोड़ता है. इसे मद्रास (अब चेन्नई) के तत्कालीन गवर्नर फ्रांसिस नैपियर ने बनवाया था. इस पुल पर कंक्रीट के छह बड़े आर्च हैं. यह पुल अपने आप में खूबसूरत वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है. 1999 में इसके साथ ही करीब 10 मीटर चौड़ा एक और पुल बनाया गया है. 2010 में इस पुल के आर्च पर लाइट लगाकर इसकी खूबसूरती को बढ़ाया गया है. रात में इसका नजारा देखने के लिए यहां काफी पर्यटक जमा होते हैं. यह चेन्नई शहर के प्रसिद्ध स्थलों में से एक है.
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महानदी रेल ब्रिज
महानदी रेल ब्रिज भारत के सबसे पुराने पुलों में से एक है. यह ओडिशा के कटक में महानदी पर 1899 में बना था. 64 पिलर पर टिके इस पुल के पिलर पानी में 60 फीट की गहराई तक थे. इस पुल के चीफ इंजीनियर विलियम बेकेट थे. बेकेट ने इस पुल के निर्माण के तरीके पर लंदन में 1901 में एक रिसर्च पेपर भी पेश किया था. इस पर उन्हें इंस्टीट्यूशन ऑफ सिविल इंजीनियर्स की ओर से गोल्ड मेडल भी दिया गया था. 2008 में महानदी पर दूसरा रेल पुल बना जिसकी लंबाई 2.1 किमी है. नए पुल से 160 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से रेल गुजारी जा सकती है.
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कोइलवर ब्रिज
कोइलवर ब्रिज बिहार में सोन नदी पर बना है. समाज सुधारक प्रोफेसर अब्दुल बारी के नाम पर इस पुल का नाम अब्दुल बारी ब्रिज रखा गया था. इसका निर्माण 1856 में शुरू हुआ था, लेकिन अगले ही साल देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ भड़क उठे 1857 के विद्रोह के कारण इसके काम में बाधा पहुंची थी. इसके बाद यह 1862 में जाकर पूरा हुआ था. तब यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा पुल हुआ करता था. 1900 में सबसे बड़े पुल का रिकॉर्ड नेहरू सेतु के नाम हो गया था. कोइलवर ब्रिज भारत का सबसे पुराना रेल ब्रिज है. इसकी उम्र 156 साल हो चुकी है और यह अब भी सेवा में है. इसकी लंबाई करीब 1.5 किमी है.
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गोल्डन ब्रिज
गोल्डन ब्रिज गुजरात में है और यह अंकलेश्वर को भरूच से जोड़ता है. इसका निर्माण 1881 में हुआ था. अंग्रेजों को जब बॉम्बे (अब मुंबई) तक जाने के लिए नर्मदा नदी पर एक पुल की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने इसका निर्माण करवाया. इस पुल को नर्मदा ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है. यह सड़क यातायात का प्रमुख माध्यम है. इसकी लंबाई करीब 1.5 किमी है. इसे बनाने में तब 45.65 लाख रुपये लगे थे और इस महंगी लागत के कारण ही इसे गोल्डन ब्रिज भी कहा जाने लगा. आजादी के बाद इसे नेशनल हाइवे का हिस्सा भी बनाया गया. बाद में इसके पास ही एक नया पुल बनने पर इस पर ट्रैफिक का भार कुछ कम हो गया.
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 एल्गिन ब्रिज
एल्गिन रेल ब्रिज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में घाघरा नदी पर बना है. इसका नाम भारत के नौवें वायसराय एल्गिन के नाम पर रखा गया था. असल में यह पुल शारदा और घाघरा नदी के संगम पर बना है. यह रेल ब्रिज 1896 में बना था. इस पुल को पहले सूखी जमीन पर बनाया गया था और बाद में यहां से नदी का पानी गुजारा गया था. इस वजह से यह पुल अपने आप में बाढ़, नदी, संगम, सिंचाई जैसे विषयों पर शोध के लिए काफी अहम माना जाता है. इस पुल के बनने से पहले यहां का सारा व्यापार जल मार्ग से ही होता था. इसके बनने के बाद से यह व्यापार पुल मार्ग पर निर्भर हो गया. बाद में 1929 में एल्गिन के नाम पर ही सिंगापुर में भी एक ब्रिज बना था, जिसकी खूबसूरती देखते ही बनती है.
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 नेहरू सेतु
नेहरू सेतु एक रेल ब्रिज है. यह बिहार में सोन नदी पर बना है. यह पुल स्टोन पिलर पर स्टील से बना है. इसका निर्माण 1900 में हुआ था. इसकी लंबाई करीब 3 किमी है और इसमें कुल 93 पिलर हैं. इसे अपर सोन ब्रिज भी कहा जाता है. यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा रेल पुल और पांचवां सबसे बड़ा पुल है. करीब 120 साल पहले जब यह बना था तो देश का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पुल था. इस समय देश में इससे बड़ा रेल ब्रिज वेम्बानंद रेल ब्रिज है, जिसकी लंबाई 4.6 किमी है. हालांकि केरल के वेम्बानंद रेल ब्रिज से केवल मालगाड़ियां गुजरती हैं, जबकि नेहरू सेतु से राजधानी समेत कई यात्री ट्रेनें होकर जाती हैं.

मालवीय ब्रिज
मालवीय ब्रिज गंगा नदी पर बने सबसे पुराने पुलों में से एक है. इसका निर्माण 1887 में बनारस में हुआ था. इसका मूल नाम डफरिन ब्रिज था. 1948 में मदन मोहन मालवीय के नाम पर इस पुल का नाम मालवीय ब्रिज रखा गया. यह पुल डबल डेकर शैली में बना है. इसके निचले हिस्से से ट्रेनें होकर जाती हैं और ऊपरी हिस्से से सड़क परिवहन गुजरता है. विश्व प्रसिद्ध ग्रैंड ट्रंक रोड इसी पुल से होकर गंगा के पार जाती है. इस पुल की लंबाई करीब 1 किमी है.