कभी पिता तो अब बेटा दिखा रहा सख्त तेवर, भारत से क्यों बेरुखी दिखाता रहा है ट्रूडो परिवार!

कनाडा के 15वें प्रधानमंत्री के तौर पर जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे एलिएट ट्रूडो जनवरी 1971 में भारत आए थे. वह भारत के पांच दिन के दौरे पर थे. इस दौरान उन्होंने भारत में ऊंट की सवारी से लेकर गंगा घाट तक का दौरा किया था. इतना ही नहीं वह ताजमहल का दीदार करना भी नहीं भूले थे. लेकिन भारत और कनाडा के संबंधों के बीच कड़वाहट की वजह खालिस्तानी मुद्दा नहीं बल्कि एक परमाणु परीक्षण था. 

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भारत-कनाडा संबंधों में तल्खी बढ़ी भारत-कनाडा संबंधों में तल्खी बढ़ी

युद्धजीत शंकर दास

  • नई दिल्ली,
  • 22 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 7:28 PM IST

कनाडा, जस्टिन ट्रूडो, खालिस्तानी आतंकी और हरदीप सिंह निज्जर... ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो बीते कुछ दिनों से देशभर में सुनाई दे रहे हैं. कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के निज्जर को लेकर दिए गए बयान के बाद दोनों देशों के बीच तल्खी चरम पर पहुंच गई है. लेकिन इतिहास गवाह है कि दोनों देशों के रिश्तों पर जमी यह बर्फ आज की नहीं है. यह मामला उस समय का है जब जस्टिन ट्रूडो के पिता कनाडा के प्रधानमंत्री थे. 

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कनाडा के 15वें प्रधानमंत्री के तौर पर जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे एलिएट ट्रूडो जनवरी 1971 में भारत आए थे. वह भारत के पांच दिन के दौरे पर थे. इस दौरान उन्होंने भारत में ऊंट की सवारी से लेकर गंगा घाट तक का दौरा किया था. इतना ही नहीं वह ताजमहल का दीदार करना भी नहीं भूले थे. लेकिन भारत और कनाडा के संबंधों के बीच कड़वाहट की वजह खालिस्तानी मुद्दा नहीं बल्कि एक परमाणु परीक्षण था. 

यह वह समय था, जब भारत सरकार ने कनाडा से कनाडा ड्यूटेरियम यूरेनियम रिएक्‍टर यानी CANDU Reactor मंगाया था. ये रिएक्‍टर शांतिपूर्ण न्‍यूक्लियर एनर्जी हासिल करने के लिए मंगाया गया था. बाद में यही मशीन दोनों देशों के बीच कड़वाहट की वजह बनी.

कनाडा और भारत के बीच हुई थी डील?

CANDU Reactor के जरिए यूरेनियम से परमाणु ऊर्जा उत्पन्न की जाती थी. यह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए बहुत लाभकारी था लेकिन भारत में इसके लिए उत्पादन इकाइयां नहीं थी. ऐसे में यूरेनियम के अलावा प्लूटोनियम को हरी झंडी दी गई. इस तरह अमेरिका और कनाडा सस्ती परमाणु ऊर्जा के लिए भारत के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम में भागीदार बने. इसके अलावा कनाडा-भारत रिएक्टर, यूएस या CIRUS न्यूक्लियर रिएक्टर में भी साझेदारी हुई. 

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CIRUS रिएक्टर को जुलाई 1960 में शुरू किया गया था और इसे कनाडा के सहयोग से होमी जहांगीर भाभा की अगुवाई में तैयार किया गया था. इस दौरान  कनाडा के प्रधानंमत्री पियरे ने कहा था कि यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए है और अगर भारत किसी तरह का परमाणु परीक्षण करता है तो कनाडा उसके परमाणु सहयोग कार्यक्रम को सस्पेंड कर देगा. 

पोखरण परमाणु परीक्षण बना था गले की फांस

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी रिसर्च पेपर के मुताबिक, पियरे के भारत दौरे के तीन साल बाद 1974 में भारत ने प्लूटोनियम का इस्तेमाल कर पोखरण में परमाणु परीक्षण किया. 

इस पर भारत ने कहा ता कि यह शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण था और उसने कनाडा के साथ समझौते का उल्लंघन नहीं किया है. लेकिन पियरे की अगुवाई में कनाडा ने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को दिया समर्थन वापस ले लिया और भारत में अन्य रिएक्टर पर काम कर रहे अपने अधिकारियों को वापस बुला लिया. 

अमेरिका के विदेश विभाग की फरवरी 1972 की रिपोर्ट में कहा गया कि कनाडा और अमेरिकी समझौतों की शर्तें स्पष्ट रूप से शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटों के लिए रिएक्टरों के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाली नहीं थी. लेकिन इस घटना के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलने में सालों लग गए. 2010 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कनाडा दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए. 

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लेकिन यह सिर्फ पोखरण परमाणु परीक्षण नहीं था, जिसकी वजह से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी आई. खालिस्तानी तत्वों के खिलाफ कदम उठाने से इनकार करने के फैसले को दोनों देशों के रिश्तों को सबसे अधिक झटका लगा था.

ओटावा में कनाडा विदेशी सेवा के एक रिटायर्ड अधिकारी गैर पार्डी ने 2018 में कहा था कि 19वीं सदी से सिख कनाडा की राजनीति में बहुत अहमियत रखते हैं. 1970 के दशक से सिखों की संख्या कनाडा में तेजी से बढ़ी है. 

कनाडा की सिख राजनीति और खालिस्तानी कनेक्शन

कनाडा में सिखों की आबादी उसकी कुल आबादी का लगभग दो फीसदी है और इनका राजनीति में बहुत प्रभाव है. 1980 के दशक में उग्रवाद के खिलाफ भारत सरकार की कार्यवाही के बाद पंजाब के खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में शरण लेनी शुरू कर दी. इनमें से एक आतंकी तलविंदर सिंह परमार था. वह 1981 में पंजाब के दो पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद कनाडा फरार हो गया था.

परमार खालिस्तानी संगठन बब्बर खालसा का सदस्य था, जिसने विदेशों में इंडियन मिशन पर हमले की बात कही थी. भारत सरकार ने कनाडा से गुहार लगाई थी कि परमार को भारत प्रत्यर्पित किया जाए लेकिन पियरे ट्रूडो की अगुवाई में सरकार ने इस आग्रह को ठुकरा दिया था.

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की खुफिया एजेंसियों ने एक जून 1985 को कनाडा प्रशासन को एक आपातकाल संदेश भेजा था, जिसमें खालिस्तानी आतंकियों द्वारा एक विमान पर संभावित हमले को लेकर सुरक्षा कदम उठाने की मांग की गई थी. 

लेकिन भारत सरकार की बातों पर गौर नहीं किया गया और फिर वही हुआ, जिसका डर था. 23 जून 1985 को एयर इंडिया के कनिष्क विमान में दो सूटकेस में बम ब्लास्ट हुआ. यह विमान टोरंटो से लंदन जा रहा था. इस हमले में 329 यात्रियों की मौत हो गई थी. इनमें अधिकतर कनाडा के नागरिक थे.

परमार को इस ब्लास्ट का मास्टरमाइंड बताया गया. लेकिन कहा गया कि ट्रूडो एक तरह से परमार का रक्षाकवच बन गए थे. हालांकि, बाद में 1992 में पंजबा में पुलिस ने परमार को मार गिराया था. 

जस्टिन ट्रूडो में पिता की झलक

खालिस्तानी मामले में जस्टिन ट्रूडो में अपने पिता ट्रूडो की झलक देखने को मिलती है. उनकी सरकार को न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के अगुवा जगमीत सिंह का समर्थन हासिल है.

कनाडा के पूर्व मंत्री उज्जवल दोसांझ बताते हैं कि लेकिन जस्टिन ट्रूडो में अपने पिता जैसी राजनीतिक प्रतिबद्धता का अभाव है. ट्रूडो सीनियर एक वकील, संवैधानिक विद्वान और कार्यकर्ता थे. इस तरह से दोनों में कोई तुलना नहीं हो सकती. जस्टिन ट्रूडो का एक तरह से पहचान की राजनीति की ओर अधिक झुकाव है. गैर पार्डी कहते हैं कि आज, जस्टिन ट्रूडो जिस राजनीतिक बिसात पर खड़े है, उसकी जड़े कनिष्क विमान ब्लास्ट पर टिकी है. 

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