अमेरिका के ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ की दुनियाभर में चर्चा है. इस ऑपरेशन को जहां अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन बताया जा रहा है, वहीं वॉशिंगटन इसे स्पेशल फोर्सेस की असाधारण सफलता और ट्रंप प्रशासन की ताकत का प्रदर्शन मान रहा है.
3 जनवरी की रात अमेरिका ने वह कर दिखाया, जिसे अब तक लगभग असंभव माना जाता था. अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने रातोंरात काराकस के भीतर घुसकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ लिया और देश से बाहर निकाल लिया. यह कार्रवाई ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत की गई.
इस ऑपरेशन को दो नजरियों से देखा जा रहा है. एक तरफ इसे किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति का अपहरण बताते हुए अंतरराष्ट्रीय नियमों और तथाकथित ‘रूल्स-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर’ की धज्जियां उड़ाने वाला कदम कहा जा रहा है. दूसरी ओर, इसे हालिया इतिहास के सबसे सटीक और हाई-रिस्क स्पेशल फोर्सेस मिशनों में से एक बताया जा रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अपने संबोधन से पहले फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि इस तरह का ऑपरेशन अंजाम देने की क्षमता सिर्फ अमेरिका के पास है. हालांकि सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि इजरायल भी ऐसा दूसरा देश है जो ऐसी कार्रवाई कर सकता है.
इतिहास गवाह है कि अमेरिका की ऐसी कोशिशें हमेशा सफल नहीं रहीं. 1980 में ईरान में बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों को छुड़ाने के लिए चलाया गया ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ हेलिकॉप्टर हादसे के बाद बुरी तरह नाकाम हो गया था. 1993 में सोमालिया में ‘ऑपरेशन गॉथिक सर्पेंट’ के दौरान 18 अमेरिकी सैनिक मारे गए और ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर गिरा. 2011 में ओसामा बिन लादेन को मारने वाला ‘ऑपरेशन नेप्च्यून स्पीयर’ सफल तो रहा, लेकिन उसमें अमेरिका का एक गुप्त स्टेल्थ हेलिकॉप्टर पाकिस्तान में गिर गया था.
मादुरो की गिरफ्तारी को इन तमाम असफल और विवादित अभियानों के ‘भूतों से मुक्ति’ के तौर पर देखा जा रहा है.
टारगेट कैसे चुना गया
2019 तक मादुरो और उनकी पत्नी काराकस के मिराफ्लोरेस पैलेस में रहते थे. लेकिन राजनीतिक संकट के बाद उन्होंने राजधानी के भीतर स्थित फुएर्ते टिउना सैन्य छावनी में शिफ्ट कर लिया. यह इलाका रक्षा मंत्रालय, मिलिट्री अकादमी और सैनिक बैरकों से घिरा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक मादुरो एक भारी सुरक्षा वाले निजी बंकर ‘ला रोका’ में रहते थे और उनकी सुरक्षा में क्यूबा के कर्मी भी तैनात थे.
महीनों की तैयारी
अमेरिकी ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के मुताबिक यह ऑपरेशन महीनों की खुफिया तैयारी का नतीजा था. CIA और NSA ने मादुरो की हर गतिविधि का पैटर्न तैयार किया. वह कहां रहते हैं, कैसे चलते हैं, क्या खाते हैं, यहां तक कि उनके पालतू जानवरों तक की जानकारी जुटाई गई. फोर्ट टिउना के बंकर और इमारतों के सटीक नक्शे स्पेशल ऑपरेशंस कमांड को दिए गए.
अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने अमेरिका में फोर्ट टिउना जैसी संरचनाएं बनाकर बार-बार अभ्यास किया. स्टील के दरवाजे काटने तक के विकल्प तैयार रखे गए. ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी. माना जा रहा है कि एक बड़े अखबार को इस मिशन से जुड़ी खबर रोकने को कहा गया था.
हेलिकॉप्टर और फोर्स
इस मिशन के लिए अमेरिकी सेना की 160वीं स्पेशल ऑपरेशंस एविएशन रेजिमेंट यानी ‘नाइट स्टॉकर्स’ को चुना गया. ये यूनिट रात में उड़ान और हाई-रिस्क मिशनों के लिए जानी जाती है. ऑपरेशन में CH-46 चिनूक और HH-60 पावे हॉक जैसे हेलिकॉप्टरों के साथ भारी हथियारों से लैस MH-60 गनशिप तैनात किए गए.
ग्राउंड ऑपरेशन के लिए डेल्टा फोर्स को चुना गया, जो अमेरिकी सेना की टियर-वन यूनिट मानी जाती है.
जब हमला हुआ...
माना जा रहा है कि ऑपरेशन तब शुरू किया गया जब मादुरो ने एक चीनी प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की थी और अमेरिका का ध्यान ईरान संकट की ओर बताया जा रहा था. आधी रात के बाद अमेरिकी सेना ने काराकस में गोला-बारूद डिपो, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य ठिकानों पर हमले किए. इससे वेनेजुएला की सेना को लगा कि पूर्ण अमेरिकी हमला शुरू हो गया है.
इन हमलों का मकसद हेलिकॉप्टरों के लिए सुरक्षित एयर कॉरिडोर बनाना था. USS इवो जीमा से उड़ान भरने वाले हेलिकॉप्टर करीब 1.01 बजे रात फोर्ट टिउना की इमारतों की छतों पर उतरे. छतों का चयन इसलिए किया गया ताकि जमीन से होने वाली फायरिंग से बचा जा सके.
स्पेशल फोर्सेस ने बेहद कम समय में दरवाजे तोड़े, सुरक्षा बलों को काबू में किया और मादुरो व उनकी पत्नी को कब्जे में लिया. माना जा रहा है कि हेलिकॉप्टरों पर फायरिंग भी हुई, जिसका जवाब भारी ताकत से दिया गया.
180 मिनट में मिशन खत्म
पूरी कार्रवाई तीन घंटे से भी कम समय में पूरी कर ली गई. हेलिकॉप्टर पहाड़ी रास्तों से होते हुए समुद्र की ओर निकल गए. मादुरो और उनकी पत्नी को पहले क्यूबा और फिर न्यूयॉर्क ले जाया गया.
इस ऑपरेशन ने न सिर्फ वेनेजुएला की राजनीति को झकझोर दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और अमेरिका की भूमिका को लेकर पूरी दुनिया में बहस छेड़ दी है.
संदीप उन्नीथन