अब लखनऊ में मिला 150 वर्ष पुराना मंदिर! 30 साल से बेसमेंट में छिपाकर रखने का आरोप, जानिए पूरी कहानी

लखनऊ में एक बिल्डिंग के नीचे शिव मंदिर होने का दावा किया गया है. दावे के मुताबिक, 30 साल से इस मंदिर को कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में छिपाकर रखा गया है. तमाम शिकायतों के बावजूद तत्कालीन प्रशासन और सरकार द्वारा कोई कार्रवाई नहीं हुई. मंदिर 1885 का है, जिसे स्वर्गीय गजराज सिंह ने अपनी कमाई से बनवाया था.

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लखनऊ में कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट मंदिर होने का दावा लखनऊ में कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट मंदिर होने का दावा

समर्थ श्रीवास्तव

  • लखनऊ ,
  • 25 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 2:58 PM IST

यूपी की राजधानी लखनऊ में एक बिल्डिंग के नीचे शिव मंदिर होने का दावा किया गया है. दावे के मुताबिक, 30 साल से इस मंदिर को कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में छिपाकर रखा गया है. तमाम शिकायतों के बावजूद तत्कालीन प्रशासन और सरकार द्वारा कोई कार्रवाई नहीं हुई. इस सिलसिले में अब ब्राह्मण संसद और मीता दास गजराज सिंह मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने लखनऊ कमिश्नर रोशन जैकब से मुलाकात की है. जिसके बाद मामले का संज्ञान लेते हुए कमिश्नर ने इसे डीएम के पास भेज दिया है. 

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इस मामले में हिंदू पक्ष के द्वारा दावा किया गया है कि यह मंदिर 1885 का है, जो स्वर्गीय गजराज सिंह ने अपनी कमाई से अपनी जमीन पर बनवाया था. 1906 में रजिस्टर्ड वसीयत कर उस जमीन पर एक ठाकुरद्वारा और शिवालय का निर्माण कराया. 1918 में पूजा अर्चना के लिए द्वारका प्रसाद दीक्षित को पुजारी के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई और कहा गया कि उनकी पुश्त दर पुश्त यहां पर पूजा पाठ करती रहेंगी. 

द्वारका प्रसाद के बाद लालता प्रसाद फिर उमाशंकर दीक्षित फिर रामकृष्ण दीक्षित और फिर यज्ञ मनी दीक्षित के पास यहां पूजा पाठ का अधिकार था. पर रामकृष्ण दीक्षित जब इस मंदिर में पूजा-पाठ कर रहे थे तब 1993-94 के बीच एक दल से जुड़े हुए नेता डॉक्टर शाहिद ने मंदिर पर कब्जा कर लिया और सरकारी संरक्षण में बिना नक्शा पास कराए भूमि पर अवैध निर्माण करवा दिया. यहां पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स दुकान भी बनवा दी गई. 

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मंदिर पक्ष का दावा है कि इस परिसर में एक राधा रानी का मंदिर, एक शिवालय, एक बरगद का पेड़ और कुछ पुरानी दुकानें थी, जिससे मंदिर का खर्च चलता था, पर उसे धीरे-धीरे हटा दिया गया. मंदिर विधानसभा मार्ग स्थित राणा प्रताप चौराहे के करीब है. 

मंदिर पक्ष से जुड़े हुए लोगों ने कहा कि इस प्रकरण में तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट लखनऊ से शिकायत की गई थी. उन्होंने मामले का संज्ञान लेते हुए 14 जनवरी 1993 को कैसरबाग और चौक सीओ को पत्र लिखकर निर्माण कार्य पर रोक लगाने का आदेश दिया था. साथ ही मजिस्ट्रेट ने मंदिर परिसर में स्थित बरगद का पेड़ जो कि लगभग ढाई सौ साल पुराना था उसको काटने से रोकने का भी आदेश दिया था. लेकिन इस आदेश के बावजूद निर्माण कार्य नहीं रुका. 

इसके बाद पंडित रामकृष्ण दीक्षित ने एक समिति रजिस्टर कराई जिसका नाम मीता दास गजराज सिंह मंदिर एवं भक्ति भावना जनहित एवं कार्य समिति था, जिससे वह जन जागरण कर मंदिर के अस्मिता को बचाने के लिए काम कर सकें. 

मंदिर पक्ष का कहना है कि 14 अगस्त 1994 को थाना कैसरबाग में मंदिर समिति ने एक एफआईआर भी दर्ज कराई थी, जिसमें मंदिर से अष्टधातु की राधा कृष्ण की मूर्ति, सोने के आभूषण और कई सामान चोरी होने के साथ ही मंदिर प्रांगण में तोड़फोड़ किए जाने की बात कही गई थी. पर इस प्रकरण में भी तत्कालीन थाने की पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई. मंदिर समिति से जुड़े हुए लोगों ने तत्कालीन जिलाधिकारी को शिकायत करते हुए मुख्यमंत्री और राज्यपाल को भी पत्र भेजा था, फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई. 

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आखिरकार मंदिर की जगह एक बड़ा कॉम्प्लेक्स बना दिया गया. इसे रोकने के लिए रामकृष्ण दीक्षित ने लंबा संघर्ष किया था. बाद में बीमारी के चलते 2020 में उनकी मृत्यु हो गई. इस प्रकरण में अब उनके बेटे यज्ञ मनी दीक्षित लड़ाई लड़ रहे हैं. हाल ही में यज्ञ मनी और ब्राह्मण संसद के अध्यक्ष पंडित अमरनाथ मिश्रा ने लखनऊ मंडल की कमिश्नर रोशन जैकब से मुलाकात कर उन्हें केस से अवगत कराया. जिसपर उन्होंने मामले को जिलाधिकारी के पास भेज दिया. 

पंडित अमरनाथ मिश्रा कहते हैं कि वह इस पूरे प्रकरण में संबंधित लोगों को अवगत कराएंगे साथ ही सभी से अपील करेंगे कि उनको बाबा भोलेनाथ की पूजा-पाठ करने का अधिकार दिया जाए. उन्होंने कहा कि खरमास तक का प्रशासन को समय दे रहे हैं, नहीं तो उसके बाद हम लोग खुद ही पूजा-पाठ शुरू कर देंगे. 

'आजतक' ने मौके पर जाकर मंदिर की पड़ताल की. देखने में मंदिर काफी प्राचीन नजर आ रहा है. इसके अलावा अगल-बगल कूड़ा और गंदगी का ढेर दिखा. मंदिर के गुंबद में जाले लगे हुए हैं. हालांकि, मंदिर में दीवाली वाली झालर लगी हुई है और कुछ फूल भी चढ़े हुए हैं. ऐसा लगता है कि हाल फिलहाल में कुछ लोग यहां आए थे. जब अमरनाथ मिश्रा से यह सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि संभल की घटना के बाद वहां समुदाय विशेष के लोगों ने जानबूझकर झालर लगा दी और फूल डाल दिए जिससे ऐसा लगे कि पूजा-पाठ हो रहा है. 

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बिल्डिंग के मालिक का बयान 

वहीं, लखनऊ के हुसैनगंज स्थित बिल्डिंग जिसके बेसमेंट में प्राचीन मंदिर होने का दावा किया गया उस बिल्डिंग के मालिक सैयद हुसैन ने 'आजतक' से बातचीत में कहा कि जो भी आरोप लगाए जा रहे हैं वह सभी निराधार हैं. उन्होंने कहा कि हम लोग खुद इस मंदिर की सालों से रखवाली कर रहे हैं. मंदिर के गुंबद के ऊपर के फ्लोर पर लगी नेट दिखाते हुए बताया कि पहले दुकानदार ऊपर से सिगरेट या कुछ सामान नीचे फेंक देते थे जो मंदिर के गुंबद पर गिर जाता था इस वजह से हमने ऊपर नेट लगवा दिया. यहां हिंदू दुकानदार काम शुरू करने से पहले माथा टेकते हैं. 

सईद के बेटे ने प्रॉपर्टी के कागज दिखाते हुए बताया कि लखनऊ विकास प्राधिकरण ने नक्शा पास किया था. साथ ही यह कहा गया था कि मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचाना है, जिसका ख्याल हमने रखा है. जब बरगद के पेड़ गिरने को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने कहा हमारे पास भी मजिस्ट्रेट के आदेश हैं, जिसमें पेड़ के कमजोर होने की वजह से गिर जाने के डर से हटाने की परमिशन ली गई है. उसके बाद ही उसे हटाया गया. 

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