लखनऊ में रामचरितमानस की प्रतियां जलाने पर एक दर्जन लोगों पर FIR, स्वामी प्रसाद मौर्य का भी नाम

लखनऊ में रविवार को रामचरितमानस की प्रतियां जलाई गईं, जिसके बाद लगभग एक दर्जन लोगों के ऊपर एफआईआर दर्ज हुई है. इसमें समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य का भी नाम है. लखनऊ में स्वामी प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में ओबीसी सम्मेलन आयोजित किया गया था.

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लखनऊ में जलाई गईं रामचरितमानस की प्रतियां लखनऊ में जलाई गईं रामचरितमानस की प्रतियां

आशीष श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 30 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 2:45 AM IST

बिहार से शुरू हुआ रामचरितमानस विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. यह विवाद बिहार से निकलकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ तक आ गया है. यूपी की राजधानी लखनऊ में रविवार को रामचरितमानस की प्रतियां जलाई गईं, जिसके बाद लगभग एक दर्जन लोगों के ऊपर एफआईआर दर्ज हुई है. समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के ऊपर भी एफआईआर दर्ज की गई है.

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ऐशबाग निवासी सतनाम सिंह ने रामचरितमानस की प्रतियां जलाने वालों के खिलाफ पीजीआई थाने में एफआईआर दर्ज कराई. प्रतियां जलाने में जो लोग शामिल थे सभी को एफआईआर में आरोपी बनाया गया है. 

गौरतलब है कि लखनऊ में स्वामी प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में ओबीसी सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसमें कुछ लोगों ने रामचरितमानस की प्रतियां जलाई थी.

मौर्य के दिए विवादित बयान के समर्थन में ओबीसी महासभा
दरअसल, रामचरितमानस को लेकर समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के दिए विवादित बयान के समर्थन में ओबीसी महासभा उतर आया. ओबीसी महासभा ने लखनऊ में प्रदर्शन किया और रामचरितमानस की प्रतियों को जलाया. समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा था कि कई करोड़ लोग रामचरितमानस को नहीं पढ़ते, सब बकवास है. यह तुलसीदास ने अपनी खुशी के लिए लिखा है.

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स्वामी प्रसाद मौर्य यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा कि सरकार को इसका संज्ञान लेते हुए रामचरितमानस से जो आपत्तिजनक अंश है, उसे बाहर करना चाहिए या इस पूरी पुस्तक को ही बैन कर देना चाहिए. 

मौर्य ने जताई आपत्ति
स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि तुलसीदास की रामचरितमानस में कुछ अंश ऐसे हैं, जिन पर हमें आपत्ति है. क्योंकि किसी भी धर्म में किसी को भी गाली देने का कोई अधिकार नहीं है. तुलसीदास की रामायण की चौपाई है. इसमें वह शुद्रों को अधम जाति का होने का सर्टिफिकेट दे रहे हैं.


बता दें कि इस पूरे विवाद की शुरुआत बिहार के शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर के एक बयान से हुई थी. नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के 15वें दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, 'मनुस्मृति में समाज की 85 फीसदी आबादी वाले बड़े तबके के खिलाफ गालियां दी गईं. उन्होंने कहा था, 'रामचरितमानस के उत्तर कांड में लिखा है कि नीच जाति के लोग शिक्षा ग्रहण करने के बाद सांप की तरह जहरीले हो जाते हैं. यह नफरत को बोने वाले ग्रंथ हैं. एक युग में मनुस्मृति, दूसरे युग में रामचरितमानस, तीसरे युग में गुरु गोलवलकर का बंच ऑफ थॉट. ये सभी देश और समाज को नफरत में बांटते हैं. नफरत देश को कभी महान नहीं बनाएगी. देश को महान केवल मोहब्बत बनाएगी.'
 

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