का बताईं भइया... आज त्रिवेणी घाट पे गंगा मइया, यमुना जी औ सरस्वती के संगम पे कुंभ का मेला ऐसा जम गवा कि आंखन के आगे बस भीड़ औ भक्ति नाचत हौ.
भोरहे में सूरजवा निकलते ही सधुअन-संतन का रेला लग जात बा.
ढोल-मजीरा, शंख-घंटा की आवाज से कानन में रस घुल गवा. कोउनो नहात हय, कोउनो मंत्र जपत हय, औ पूरा माहौल गंगा मइया की कृपा से सराबोर बा.
ए भइया त्रिवेणी घाट देख के आज हमार माथा चकराई गया.
हजारों हजार गंजी-जाघियां, चप्पल-जूता सब छूट गवा, लोग गंगा मइया में डुबकी लगाइ के आपन पाप धोवे जाथिन, एही बिना ई सब छोड़ देहन कि अब नई जिंदगी शुरूआत करब.
एकरे बारे में कुछ पता नई, पर ई परंपरा बन गई.
20 रुपया वाली पन्नी संगम तट पे बिछ जात बा, ओकरे ऊपर तीर्थाटन के सारा संसार पसर जात बा.
मोबाइल-पर्स तहिया के रखो, कपड़ा में लपेट के नीचे दबावा.
एक मनई पहरा देत अहई, बाकी नहात अहैन – ई सब त श्रद्धालुओं के आपसी भरोसा और मजबूरी के खेल अहई.
लेकिन, गंगा तट पे भी ठग लोग बहुत गलत करत हैन और चोरी-चकारी करते हैं. ऐनकर लोग के हिसाब त गंगा मइया और महादेव ही करिहीं.
ऐ भइया, ई बात इंही नाही खत्म होत बा. मेला में कछु ठग्गू-लफंगन भी घूमत हैंन, जवन जेब काटई औ लूटपाट के चक्कर में हैंन.
एक बुढ़उव चैतावत हैं, "बेटवा, भीड़ में आंख खोल के रखा, नहीं त गंगा में पाप धोअत-धोअत जेबउ भी धुल जाई.
भींगी मिट्टी, कीचड़, रेत अउर रेत में पैर फंस जात बा, तबऊ लोग चलत जात हैन. भीड़ में टक्कर होई जात बा, लहालोट होई जात हैंन, लेकिन श्रद्धा नाही रुकत बा.
सब बढ़त जात हैंन, संगम की तरफ, मोक्ष की आस में.
संगम में डुबकी की ऐसी मारामारी है कि कुछ लोग तो एक-दूसरे पे चढ़े जात हैंन, पर पास में ही कछु साधु लोग शांति से आंख बंद किए ध्यान लगावत हउवन.
विदेशी लोग भी संगम नहाई खोब आवत हैन. एक जॉन भइया, अमेरिका से आई हैन, अपन कैमरा लिए फोटो खींचत अंग्रेजी में बकेती करते हैन, "इतना बड़ा मेला, लाखों भीड़, फिर भी शांति औ ठाठ से चलत हैन, गजब हैन! प्रयागराज वालेन"
त्रिवेणी की आरती देख के तो बिल्कुले मंत्रमुग्ध होई जात बा.
अरे भाई, ये का हो गवा! राम प्यारी चाची मेला में कहीं भूला गयीं.
खोया-पाया केंद्र से माइक पे ऐलान होत बा- "राम प्यारी चाची, जल्दी से टावर के नीचे चली आवा, पतोह तोहार तोहका खोजत बा और रोई-रोई के परेशान हो गई बा."
आगे घाट पे सेल्फी और वीडियो की धूम मची बा. नया-नया लौंडा-लइकियां पोज़ दे-देकर गंगा स्नान करत हैन. फोटो खिंचवावत हैन और स्टाइल मारत हैन.
माइक से बार-बार ऐलान होत बा- श्रद्धालुजन, दो डुबकी लगाके निकल जा, घाट पे भीड़ न लगावा. पर के सुनत बा? सब अपने मस्त हैन.
घाट से ऊपर संगम की रेती पे स्नान निपटाये लोगन का मजमा लाग बा.
अरे भइया, 20 रुपया का भुंजा लादो, खाये के तो इहां कुछो ठीक से मिलत ना बा.
तुरंते एक डांट परत बा- "गंगा मैया के घर खाना खाये आये हो कि स्नान-दान करई?
जनता सूखी पूरी से काम चलावत बा, स्नान का संतोष मन में बा, थकान भरा चेहरा शाम की रोशनी में चमक जात बा.
दिल से बोल पड़त हौ- न आते, तो न जाने कित्ता पछताते.
अरे भाई, शौचालय की लाइन देखो! का गजब व्यवस्था हौ. एक लाइन में दो सौ, तीन सौ लैट्रीन.
सब साफ-सुथरा, बड़े मग्गा में पानी लादो, और खुदे जाओ.
सच में सफाई वाले भइयों का कमाल हौ, शाबासी के हकदार हैन ऊ सब.
मेला घूमने निकलो तो मानो विविधता और संस्कृति का पूरा संसार खुल जात बा.
नागा बाबा लोग की तो अलग्गे दुनिया अहई. शरीर पे भभूत मले, हाथ में त्रिशूल थामे, कोई भविष्य देखत बा, कोई "हर हर महादेव" का नारा लगावत बा.
थोड़ा नजर का मिलल तुरंत बोले- बच्चा यहां सुनो, सेल्फी लेने का 50 रुपया ले लिए.
जनता कनखियों से देखत हौ, मन में सवाल- "ये बाबा लोग कउन हैन, कहां से आई हैन?"
सब हैरान-परेशान, भौचक्का होके ताकत हैन- कहां रहत हैन ये लोग?
देख के मन में रोमांच भर जात बा. एक बाबूजी, रामलाल, जो संगम के पास ही के हउवन, बतावत हउवन, "इहा डुबकी लगावे से पाप कट जात हौ, औ आत्मा चमक उठत हौ. हम तो हर कुंभ में जरूर आवत हईं. पास में खड़े एक चचा हंस के बोल पडे, "अरे, गंगा मइया तो सबके दुख हर लेत हउवन, बस श्रद्धा चाहिए."
पुलिसन के कड़ा इंतजाम हौ. ड्रोन ऊपर से निगरानी करत हौ, औ खाकी वालों के साथ-साथ गोताखोरन की टीम भी पानी में नजर रखत हैन.
मेला में ठेले-दुकनवन पे रौनक छाई बा. केउ प्रसाद बेचत बा, केउ फूल-माला, अउर किनारे पे ठीक वही पुराना चाय-पकौड़ा वाला ठिया देख के मन खुश होई गवा.
श्याम सुंदर, एक दुकानदार हैन, ओं कहेन, भइया, कुंभ हमरे लिए आस्था और कमाई दुनऊ के जरिया अहई . इहां कमाई भी हो जात हौ औ पुन्न भी मिल जात है.
दरअसल, कुंभ बस धरम की बात नइ हौ, इहां तो हमरे पुरखन की परंपरा, संस्कृति औ इंसानियत का पूरा मेला हौ. सूरज ढलते ही संगम के किनारे दीया जल गवा, आरती की गूंज उठी, औ पूरा इलाका गंगा मइया के जयकारे से थर्रा उठल.
ऐसा लागत हौ कि प्रयागराज सतयुग में चल गइळ रहे. जय गंगा मइया, जय प्रयागराज!
पन्ना लाल