लखनऊ में मरीजों को मिलीं सबस्टैंडर्ड दवाएं, जांच में खुलासा, स्वास्थ्य विभाग ने दोषी कंपनियों पर ठोका जुर्माना

लखनऊ के सिविल अस्पताल में मरीजों को दी जा रही दवाओं पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. चार महीने से इलाज करा रहे शानू को फायदा नहीं हुआ तो परिवार ने दवाओं की जांच कराई. जांच के लिए अलग-अलग सरकारी अस्पतालों से खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग (FSDA) ने दवाइयों के सैंपल लिए.

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समर्थ श्रीवास्तव

  • लखनऊ ,
  • 19 अगस्त 2025,
  • अपडेटेड 10:22 AM IST

आप अक्सर सरकारी अस्पतालों में दवाइयां लेने जाते होंगे, सरकारी निर्देश भी अब ये कहता है कि सरकारी डॉक्टर बाहर की दवाइयां नहीं लिख सकता. कहीं-कहीं लिखी गई तो डॉक्टरों के खिलाफ एक्शन भी हुआ है. लेकिन अगर आपको पता चले कि जिन सरकारी अस्पतालों से आप काउंटर पर लंबी लाइन लगाकर दवाइयां ले रहे हैं, वह गुणवत्ता में फेल हो गई हैं तब क्या?

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उत्तर प्रदेश में पिछले एक साल में यूपी के अलग-अलग सरकारी अस्पतालों से खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने दवाइयों के सैंपल लिए. जब जांच पूरी हुई तब इसमें कुल 51 दवाइयां और इंजेक्शन ऐसे पाए गए जो गुणवत्ता में फेल हो गई, यानि कि सब-स्टैंडर्ड पाई गईं. इसके बाद विभाग ने जून 2025 को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को एक पत्र के माध्यम से गुणवत्ता में फेल दवाइयां की लिस्ट लगाकर उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया. 

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जानिए कैसे होती है दवाओं की टेस्टिंग

इस पूरे मामले को समझने से पहले आजतक मेडिकल लैब पहुंचा. जहां दवाइयों का टेस्ट किस प्रकार हुआ है, उसे लखनऊ यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर फार्मेसी पुष्पेंद्र त्रिपाठी ने समझाया. मशीनों के माध्यम से उन्होंने दवाई कि गुणवत्ता के बारे में सैंपल्स डालकर दिखाया. साथ ही उन्होंने विघटन परीक्षण (Disintegration test) लाइव भी दिखाया.

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विघटन परीक्षण का मतलब है कि टैबलेट बनने के लिए पहले पाउडर होता है. पाउडर से ग्रानूल्स (granules)बनते हैं और ग्रानूल्स से टैबलेट पंच की जाती है. यह टेस्ट 6 टैबलेट से किया जाता है. एक इंस्ट्रूमेंट में उन टैबलेट को 15 मिनट में टूट जाना चाहिए. इसके बाद 6 और ली जाती हैं. जब 12 फेल हो जाती हैं, तब इस टेस्ट के जरिए दवाओं को सब-स्टैंडर्ड कहा जाता है. 

पुष्पेंद्र त्रिपाठी ने बताया सब-स्टैंडर्ड एक कॉमन शब्द है. दवाइयों में अगर पैरासिटामोल है तो उसका पहला टेस्ट यही है कि अगर 500mg की पैरासीटामोल है. अगर उसमें इतना कंटेंट नहीं है तो वह सब-स्टैंडर्ड है. या फिर दवा बॉडी में जाकर न टूटे, ऐसे तमाम चीजों को लेकर टेस्ट होते हैं.

इस लिस्ट में जहां पर विघटन (dissolution) लिखा है, उसका मतलब है यह दावा (ciprofloxacin tablets) पेट में जाकर घुलेगा नहीं. सिप्रोफ्लोक्सासिं (ciprofloxacin) यह दवा लिस्ट के मुताबिक पेट में जाकर घुलेगी नहीं. क्योंकि अगर 30 मिनट में दवा घुल जाती है, तभी फायदा होगा. 

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अगर 500 mg की दवा में जांच में 400mg भी निकलती है तो वह किसी काम की नहीं है, चाहे 5mg भी कम क्यों न हो. लिस्ट में जो ऐजी (assay) लिखा है. इसका मतलब है दवा का कम्पोजिशन ( composition) ही कम है. जितना कंपनी ने दावा किया है. वहीं, पार्टीकुलेट मैटर टेस्ट (Particulate matter test) जो इसमें दिखाया गया है, वह इंजेक्शन का होता है. स्टेरलिटी टेस्ट (Sterility test) और पार्टिकुलेट मैटर टेस्ट ( particulate matter test) होते हैं.

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पीएच का मतलब अलग-अलग होता  है

PH का मतलब है, यहां की हर दवाई का अलग-अलग पीएच होता है. स्टमक (Stomach) में मेडिसिन कुछ एमएम में डिसोलव होनी थी. लेकिन नहीं हो रही. पीएच पर डिजॉल्व (disslove) नहीं हो रही है. जिस पर होनी चाहिए थी. इसलिए यह सब-स्टैंडर्ड है.

टेस्ट में क्लैरिटी एंड पार्टीकुलेट मैटर (Clarity and particulate matter) का मतलब है कि इंजेक्शन पानी जैसा क्लियर दिखना चाहिए. यूनिफॉर्मिटी ऑफ डिस्प्रेन (Uniformity of dispersion) का इसमें मतलब है कि दावा का डिस्प्रेस होना जरूरी  है. अगर वह यूनिफॉर्म डिसप्रेस नहीं हो रही है, मतलब उसमें ड्रग कंटेंट कम है.

इन टेस्ट से यह साबित होता है कि डॉक्टर ने तो दवा लिख दी. लेकिन टेस्ट में यह दवाएं फेल हो गई. सरकार लगातार ऐसे टेस्ट करती है हर राज्य में. जिसके बाद खामियां पाए जाने पर दवाई की कंपनी को बैन कर दिया जाता है.

यूपी सरकार ने की सख्त कार्रवाई

इस पूरे मामले को लेकर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव पार्थ सारथी सेन से संपर्क किया तो उन्होंने जानकारी साझा की. उन्होंने कहा कि UP मेडिकल सप्लाइज कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने प्रत्येक मामले में जुर्माना, स्टॉक वापस लेना, आपूर्तिकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस आदि सहित कार्रवाई की है. 
 

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