स्मृतिशेषः गुपचुप चले गए बेबाक बेनी बाबू

अपने बेबाक बोल के लिए मशहूर बेनी प्रसाद वर्मा के अचानक निधन से उत्तर प्रदेश ने एक ऐसा जमीनी नेता खो दिया है जो बाराबंकी के सिरौली गौसपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार मेँ पैदा हुआ लेकिन अपनी शख्सियत ऐसी तैयार कि सभी की जुबान पर बेनी बाबू के नाम से चढ़ गया

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फोटोः इंडिया टुडे फोटोः इंडिया टुडे

आशीष मिश्र

  • लखनऊ,
  • 27 मार्च 2020,
  • अपडेटेड 9:12 PM IST

अपने बेबाक बोल के लिए मशहूर बेनी प्रसाद वर्मा के अचानक निधन से कोरोना के खौफ के बीच एक बड़ी दुखद खबर ने राजनीतिक पटल पर अपनी जगह बनाई है. इनके निधन से यूपी ने एक ऐसा जमीनी नेता खो दिया है जो बाराबंकी के सिरौली गौसपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार मेँ पैदा हुआ लेकिन अपनी शख्सियत ऐसी तैयार कि सभी की जुबान पर बेनी बाबू के नाम से चढ़ गया.

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बेनी प्रसाद वर्मा के पिता बाराबंकी के बड़े गन्ना किसान थे. वर्ष 1970 में बेनी उस वक्त सबकी नजरों में आए जब उन्होंने किसानों की समस्याओं ‌के लिए एक बड़ा आंदोलन किया.

बेनी प्रसाद वर्मा ने वर्ष 1970 में केन यूनियन बुढ़वल रामनगर, बाराबंकी के संचालक एवं उपसभापति पद पर निर्वाचित होकर अपना रजनीतिक सफर शुरू किया था. वह 1974 में भारतीय लोकदल के टिकट पर पहली बार विधायक निर्वाचित हुए.

बेनी प्रसाद को चौधरी चरण सिंह का भी साथ मिला. चौधरी चरण सिंह ने बेनी को भारतीय क्रांति दल का महासचिव बनाया. इसके बाद इमरजेंसी का दौर आया और फिर समाजवादी विचारधारा से जुड़े लोगों की सरकार बनी. वर्ष 1977 में बेनी ने अपनी राजनीतिक शक्ति का लोहा मनवाया जब उन्होंने विधानसभा चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई को बाराबंकी की ‌मसौली विधानसभा सीट से करारी हार दी.

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वर्ष 1977 के चुनाव के बाद बनी समाजवादियों की सरकार में केवल उन्हीं लोगों को मंत्री पद देने की शर्त रखी गई थी जो इमरजेंसी के दौरान काफी दिनों तक जेल में बंद रहे थे. इमरजेंसी में जेल न जाने के बावजूद लखनऊ यूनिवर्सिटी से लॉ ग्रेजुएट बेनी पहली बार 1977 जनता पार्टी की सरकार में गन्ना विकास, चीनी उद्योग एवं कारागार सुधार विभाग के मंत्री बने.

यही वह समय था जब बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव के बीच नजदीकियां बढ़ीं.

1989 में प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनने पर बेनी को सार्वजनिक निर्माण और संसदीय कार्य विभाग के मंत्री के रूप में नंबर दो की हैसियत मिली. 1992 में जब मुलायम सिंह की अध्यक्षता में समाजवादी पार्टी का गठन हुआ तो बेनी प्रसाद वर्मा को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के अलावा विधानमंडल दल के मुख्य सचेतक का जिम्मा भी सौंपा गया.

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार बताते हैं, "समाजवादी पार्टी मुख्यरूप से पिछड़े वर्ग की पार्टी थी. मुलायम को पिछड़े वर्ग में यादवों (19.40 प्रतिशत) का समर्थन था तो बेनी कुर्मियों (7. 46 प्रतिशत) के एकछत्र नेता के रूप में उभरे थे."

1993 में बेनी समाजवादी पार्टी के टिकट पर बाराबंकी के मसौली विधानसभा से विधायक चुने गए. इसी वर्ष यूपी में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार में एक बार फिर बेनी लोक निर्माण विभाग ओर संसदीय कार्य मंत्री के तौर शामिल हुए.

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1996 के लोकसभा चुनाव में बेनी ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर कैसरगंज से चुनाव जीता और मुलायम सिंह यादव के साथ केंद्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी दिखाई. 1996 से 1998 के बीच उन्होंने केंद्र की यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में संसदीय कार्य राज्यमंत्री और उसके बाद कैबिनेट मंत्री के तौर पर संचार मंत्रालय का कार्यभार संभाला.

वर्ष 2004 में बेनी लगातार चौथी बार कैसरगंज से सांसद निर्वाचित हुए. इस दौरान यूपी में मुलायम की सरकार थी और यही वह समय था जब बेनी और मुलायम के रिश्तों में खटास आनी शुरू हुई. बेनी के नजदीकी जे. पी. सिंह बताते हैं, "बेनी और मुलायम के रिश्ते टूटने के पीछे पूर्व एसपी राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह थे. अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को पूंजीवादियों की पार्टी बना दिया था. भ्रष्टाचार और परिवारवाद चरम पर था."

सपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि अमर सिंह बहराइच में वकार अहमद शाह और बाराबंकी में अरविंद सिंह गोप को बेनी के मुकाबले खड़ा कर रहे थे. इससे नाराज होकर बेनी ने 2007 में पार्टी से नाता तोड़ लिया था.

समाजवादी पार्टी छोडऩे के बाद बेनी ने अपनी पार्टी ‘ समाजवादी क्रांति दल’ (एसकेडी) बनाई. 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में बेनी ने अपने बेटे राकेश वर्मा को बाराबंकी के मसौली और दरियाबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया और खुद अयोध्या से लड़े.

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सपा से अलग होकर लड़े इस पहले चुनाव में राकेश वर्मा दोनों सीटों से चुनाव हारे और बेनी तो अयोध्या से जमानत ही गवां बैठे. अभय कुमार कहते हैं, "2007 में बेनी की पार्टी को केवल कुर्मी वोट ही मिले. अन्य तबकों ने इनसे दूरी ही बनाई रखी और इसी वजह से एसकेडी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा."

यह वह समय था जब बेनी यूपी की राजनीति में अलग-थलग हो गए थे. यूपी में पांव मजबूत करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस के पास पिछड़े वर्ग का कोई बड़ा नेता नहीं था और इसी मजबूरी ने कांग्रेस और बेनी का मिलन कराया. 2008 में बेनी कांग्रेस में शामिल हुए. अगले वर्ष 2009 में जब लोकसभा चुनाव आए तो बेनी ने अपनी परंपरागत सीट कैसरगंज को छोडक़र गोंडा चुनाव लडऩे पहुंच गए क्योंकि नए परिसीमन के आधार पर हुए चुनाव में कैसरगंज में कुर्मी बाहुल्य इलाके का एक बड़ा भाग दूसरे संसदीय क्षेत्र में चला गया था.

गोंडा संसदीय क्षेत्र कुर्मियों की खासी तादाद (15 प्रतिशत) थी. गत 40 वर्षों से गोंंडा और आसपास के जिलों की स्थानीय राजनीति पर नजर रखने वाले ‘ शहीद-ए-आजम इंटर कालेज गोंडा’ के रिटायर वरिष्ठ प्रवक्ता 65 वर्षीय एसपी मिश्र बताते हैं ‘ वर्ष 2009 में गोंडा संसदीय क्षेत्र से बेनी की जीत की मुख्य वजह यहां एसपी, बीजेपी और बीएसपी द्वारा उतारे गए ठाकुर उम्मीदवारों के विरोध में ब्राह्मणों द्वारा बेनी को समर्थन और पीस पार्टी द्वारा मुसलिम मतों में सेंध लगाया जाना था. ’

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वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में 22 सीटें जीतकर अप्रत्याशित प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव में बेनी प्रसाद वर्मा को आगे करने का निर्णय किया ताकि समाजवादी पार्टी के परंपरागत पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके. इसी रणनीति के तहत वर्ष 2011 में पहले बेनी को इस्पात मंत्रालय का राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया और अगले ही साल 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले इनका कद बढ़ाकर इन्हें इस्पात मंत्रालय का कैबिनेट मंत्री बना दिया गया.

बेनी के रूप में कांग्रेस का पिछड़ा कार्ड विधानसभा चुनाव में फ्लाप साबित हुआ. गोंडा, बाराबंकी जैसे कुर्मी बाहुल्य और बेनी की पकड़ वाले इलाकों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली. बेनी के पुत्र राकेश वर्मा को भी दरियाबाद से मुंह की खानी पड़ी. यही नहीं वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में बेनी प्रसाद को भी गोंडा संसदीय क्षेत्र से बुरी हार मिली.

इसके बाद बेनी प्रसाद कुछ दिनों के लिए राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए. ऐसी हालत में इनके पुराने मित्र और समाजवादी पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव आगे आए. मुलायम सिंह और इनके छोटे भाई तथा तत्कालीन सपा सरकार में मंत्री शिवपाल यादव समय समय पर बेनी को फोन करके उनका हालचाल लेते रहे.

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एक बार तो खुद बेनी ने शिवपाल को अपनी कार में बिठाकर काफी लंबी बातचीत की. हालांकि बेनी प्रसाद ने सपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए कभी भी कड़े शब्दों का प्रयोग नहीं किया. बेनी अखिलेश को हमेशा अपना भतीजा बताते रहे. मुलायम बेनी प्रसाद की सपा में वापसी की नींव तैयार कर रहे थे. अखिलेश मुलायम से सहमत थे लेकिन दिक्कत आजम खान और प्रोफेसर राम गोपाल यादव को लेकर थी. दोनो बेनी प्रसाद को कतई नहीं पसंद करते थे.

हालांकि मुलायम सिंह यादव ने सबको अलग-अलग समझाया और सब मान गए. इसके बाद 13 मई 2016 को बेनी की सपा में वापसी हुई. खास बात यह थी ज्वायनिंग के समय मुलायम सिंह यादव के एक तरफ बेनी तो दूसरी तरफ इनके विरोधी आजम खान खड़े थे.

बाद में मुलायम सिंह की पहल पर बेनी प्रसाद वर्मा को सपा ने राज्यसभा में भेजा. बेनी प्रसाद वर्मा की सपा में ज्वायनिंग के समय मुलायम सिंह का कहना था “पुरानी किताबें, पुरानी शराब और पुराने दोस्त भुलाए नहीं जा सकते.” वक्त का तकाजा है कि अब मुलायम को अपने पुराने दोस्त बेनी बहुत याद आएंगे.

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