पायलट समर्थक विधायकों की सदस्यता का क्या होगा? जानिए कानूनी पहलू क्या है

सचिन पायलट, विश्वेंद्र सिंह, रमेश मीणा, मुरारीलाल मीणा, हरीश मीणा, जीआर खटाणा, सुरेश मोदी, इंद्राज गुर्जर, राकेश पारीक, मुकेश भाकर, रामनिवास गावड़िया, वेद प्रकाश सोलंकी, बृजेंद्र ओला, दीपेंद्र सिंह शेखावत, अमर सिंह जाटव, गजेंद्र सिंह शक्तावत, भंवरलाल शर्मा और हेमाराम चौधरी को नोटिस भेजा गया है.

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सचिन पायलट समेत 18 विधायकों को विधानसभा स्पीकर ने भेजा नोटिस सचिन पायलट समेत 18 विधायकों को विधानसभा स्पीकर ने भेजा नोटिस

जावेद अख़्तर

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 1:52 PM IST

  • पायलट को विधानसभा स्पीकर का नोटिस
  • सचिन समेत 18 विधायकों को नोटिस
  • क्या रद्द होगी विधायकों की सदस्यता?

राजस्थान में एक बार अशोक गहलोत का जादू चल गया है. गहलोत ने एक बार फिर खुद को किंग साबित कर दिया है. गहलोत ने ऐसा जंतर किया है कि सचिन पायलट फिलहाल चारों खाने चित नजर आ रहे हैं. पद जाने के बाद अब पायलट और उनके समर्थक विधायकों की सदस्यता पर भी संकट दिखाई देने लगा है. विधानसभा स्पीकर ने पायलट समेत 18 विधायकों को नोटिस भेजे हैं.

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कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने विधानसभा अध्यक्ष के पास शिकायत दर्ज कराई थी कि सचिन पायलट समेत उनके साथ गए विधायकों ने नियमों का उल्लंघन किया है. दल-बदल कानून के तहत इन विधायकों के खिलाफ एक्शन की मांग की गई है. इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने विधायकों को नोटिस भेजा है.

हालांकि, विधानसभा सचिव के नाम पर ये नोटिस भेजे गए हैं. नोटिस में लिखा गया है, ''राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 191 की दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष के सामने याचिका लगाई है और विधायकों की सदस्या रद्द करने की मांग की है. दल-बदल कानून के तहत यह याचिका स्वीकार की गई है.''

ये कहते हुए सचिन पायलट, विश्वेंद्र सिंह, रमेश मीणा, मुरारीलाल मीणा, हरीश मीणा, जीआर खटाणा, सुरेश मोदी, इंद्राज गुर्जर, राकेश पारीक, मुकेश भाकर, रामनिवास गावड़िया, वेद प्रकाश सोलंकी, बृजेंद्र ओला, दीपेंद्र सिंह शेखावत, अमर सिंह जाटव, गजेंद्र सिंह शक्तावत, भंवरलाल शर्मा और हेमाराम चौधरी को नोटिस भेजा गया है.

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क्या है दल-बदल कानून?

ये कानून मुख्य रूप से विधायकों और सांसदों के दल बदलने पर लगाम लगाने वाला है. 1985 में ये कानून वजूद में आया था. हालांकि, इसके बाद राजीव गांधी सरकार इसके खिलाफ विधेयक लाई और संविधान में 10वीं अनुसूची को जोड़ा गया.

अगर कोई विधायक या सांसद पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, वो इस कानून के दायरे में आता है. इसके अलावा अगर कोई विधायक या सांसद पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है तो भी ये कानून लागू होता है. अगर विधायक या सांसद व्हिप जारी होने के बावजूद वोट न करे या सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करे तो इन सभी स्थिति में दल-बदल कानून लागू हो सकता है और विधायकों या सांसदों की सदस्यता जा सकती है.

कई ऐसी स्थिति हैं जब ये कानून लागू नहीं होता है. मसलन, अगर कोई पूरी पार्टी दूसरी पार्टी में विलय कर ले या निर्वाचित सदस्य कोई नई पार्टी बना लें तो ये कानून लागू नहीं होता है. इसके साथ ही अगर कोई दो पार्टी आपस में मिल जाएं और कोई सदस्य इस विलय का हिस्सा न बनना चाहे तो अलग रह सकता है और उस पर दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकेगी. साथ ही अगर दो तिहाई विधायक सांसद किसी नई पार्टी में शामिल हो जाएं तब भी यह कानून लागू नहीं होता है.

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10वीं अनुसूची के तहत विधानसभा स्पीकर को इस मसले पर अंतिम निर्णय का अधिकार दिया गया है. पैराग्राफ 6 के तहत विधानसभा स्पीकर का फैसला आखिरी माना जाएगा. पैराग्राफ 7 में ये व्यवस्था थी कि कोर्ट इस मामले में दखल नहीं दे सकता, लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने ये व्यवस्था खत्म कर दी. अब स्पीकर के फैसले की समीक्षा की जा सकती है. कर्नाटक से लेकर दूसरे कई राज्यों में जब सियासी संकट आया तो इसका उदाहरण भी देखने को मिला. विधानसभा स्पीकर ने विधायकों की सदस्यता रद्द की लेकिन बाद में कोर्ट से उन्हें राहत दी गई.

फिलहाल, ऐसे ही हालात राजस्थान में पैदा हो गए हैं. सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ पार्टी गतिविधियों से अलग हो गए हैं. 13 और 14 जुलाई को जयपुर में सीएम आवास पर दो विधायक दल की बैठक हुईं, लेकिन इस बैठक में सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायक नहीं पहुंचे. ये तब है जबकि कांग्रेस की तरफ से व्हिप जारी किया गया था.

इसके बाद 14 जुलाई की दोपहर सचिन पायलट पर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश का आरोप लगाते हुए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. इस कार्रवाई के बाद चीफ व्हिप महेश जोशी ने विधानसभा स्पीकर को पत्र लिखकर नियमों के उल्लंघन करने वाले विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग की.

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राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष सीपी जोशी की ओर से सचिन पायलट समेत अन्य 19 कांग्रेसी विधायकों को नोटिस जारी किया गया है. नोटिस में दल-बदल कानून के तहत मिली शिकायत के संबंध में जवाब मांगा गया है. 17 तारीख को दोपहर 1 बजे तक विधायकों से जवाब मांगा गया है.

पायलट व उनके विधायकों का क्या होगा?

राजस्थान की राजनीति के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार श्याम सुंदर शर्मा का कहना है कि जब विधानसभा का सत्र चलता है तभी नोटिस जारी करने का अधिकार होता है. ऐसे में पायलट समर्थक विधायक कोर्ट का रास्ता अपना सकते हैं. अगर ये विधायक कोर्ट में जाकर अपना जवाब दें कि हम पार्टी विरोधी गतिविधियों में नहीं है तो ऐसे में विधानसभा स्पीकर सदस्यता रद्द करने का फैसला टाल भी सकते हैं. पायलट और उनके समर्थकों की तरफ से बार-बार ये कहा भी जा रहा है कि वो बीजेपी में नहीं जा रहे हैं, कांग्रेस में ही हैं. ऐसे में पायलट विधानसभा अध्यक्ष को जवाब भी दे सकते हैं. क्योंकि पायलट अलग दल भी नहीं बना सकते, अगर ऐसा करते हैं तो उनकी सदस्यता चली जाएगी.

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह का कहना है कि स्पीकर हमेशा सत्तापक्ष का भरोसेमंद होता है. जो विधायक बगावत कर रहे हैं वो दूर तक अपना फ्यूचर सोच रहे हैं. गहलोत खेमा ये कोशिश करेगा कि मामला लटके. संख्या चाहे जो भी है, कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि इतने विधायक उनसे नाराज होने के बाद उनकी सरकार लंबे समय तक चल पाए. राम कृपाल सिंह का मानना है कि अगर विधायकों की सदस्यता रद्द की जाती है तो मामला कोर्ट तक ही पहुंचता है और वहीं से फैसला होता है. कर्नाटक में भी ऐसा देखा गया है.

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यानी ताजा हालात के मुताबिक, फैसला स्पीकर के हाथ में ही है. माना जा रहा है कि गहलोत खेमे को अगर पायलट गुट के विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने से फायदा मिलता है तो स्पीकर जरूर इस प्रक्रिया को अंजाम दे देंगे. लेकिन दूसरी तरफ इस एक्शन को प्रेशर पॉलिटिक्स के तौर पर भी देखा जा रहा है. अब देखना होगा कि सचिन पायलट क्या रुख अपनाते हैं.

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