भारत छोड़ो आंदोलन के सोमवार को 75 साल पूरे हो गए और यह वर्षगांठ ऐसे नाजुक मौके पर आई है, जब देश में गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों की मरम्मत करने के बहाने खोजे जा रहे हैं. प्रधानमंत्री ने भले ही मुसलमानों पर फर्जी गोरक्षकों के हमले को अभी तक सार्वजनिक रूप से स्वीकार न किया हो, लेकिन दलितों पर जुल्म को तो उन्होंने आला दर्जे की भावुकता के साथ स्वीकार किया है. इतनी अच्छी भावुकता तो आजकल फिल्मों में भी देखने को नहीं मिलती. बहरहाल इस मौके पर महात्मा गांधी के 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में दिए भाषण को याद कर लेना चाहिए. यही वह भाषण था जिसके अंत में ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा निकला और अंत में आजादी की लड़ाई आजादी की चौखट तक पहुंची.
इस भाषण की शुरुआत अगर कम्युनिस्टों को फटकार के साथ हुई, तो एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों को यह समझाने में हुआ कि यह देश सबका बराबर का देश है, लिहाजा उन्हें पाकिस्तान की नाजायज मांग का समर्थन नहीं करना चाहिए. और मुसलमानों को यह बात समझाने के लिए गांधीजी ने गोरक्षा की मिसाल भी दी. यह उस फरिश्ते की ही सिफत थी कि उसने खिलाफत और गोरक्षा को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया.
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के थे मुस्लिम और पारसी दोस्त
जरा भाषण के इस अंश पर गौर करें, 'हजारों मुसलमान मुझसे कहते हैं कि अगर हिंदू-मुसलमान का सवाल पक्के तौर पर सुलझाया जाना है, तो इसे मेरे जीते जी सुलझा लिया जाना चाहिए. वैसे तो मुझे इस बात पर खुश होना चाहिए, लेकिन मैं ऐसी तजवीज को कैसे मानलूं जिसकी कोई तुक मेरी समझ में नहीं आती? हिंदू-मुस्लिम एकता कोई नई चीज नहीं है. करोड़ों हिंदू-मुसलमान यही चाहते हैं. मैं तो बचपन से ही सोच-विचार कर इस काम में लगा हूं. जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब मैंने इस बात की खास कोशिश की कि मुसलमान और पारसियों से मेरी दोस्ती हो. मुझे उस छोटी उम्र में भी भरोसा था कि अगर भारत के हिंदू अन्य समुदायों के साथ शांति से रहना चाहते हैं तो उन्हें भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी... दक्षिण अफ्रीका में भी मैंने मुसलमान और पारसी दोस्त बनाए. और आखिर में जब भारत लौटा तो वे मेरे जाने से दुखी थे, उनकी आंखों में आंसू थे.
एकता से खिलाफत आंदोलन के लिए हुए प्रेरित
भारत में भी मैंने यही एकता हासिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एकता मेरी जिंदगी भर की अभिलाषा थी और इसी ने मुझे खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों का साथ देने को प्रेरित किया. मुसलमानों ने पूरे देश में मुझे अपना सच्चा दोस्त माना.
गांधीजी ने कहा था- मैं गो पूजक हूं
तो फिर आज ऐसा क्या हो गया कि आज मैं (मुसलमानों के लिए) शैतान और अरुचिकर हो गया. क्या खिलाफत आंदोलन की हिंदू-मुस्लिम एकता मैंने किसी फरसे के जोर पर हासिल की थी. सच्चाई यह है कि मेरा अंतरयामी कहता था कि ऐसा करने से मैं गोरक्षा भी कर सकूंगा. मैं गो-पूजक हूं. मैं यह मानता हूं कि मैं और गाय एक ही ईश्वर की संतान हैं. गाय के प्राणों की रक्षा के लिए मैं अपने प्राण न्योछावार करने को तैयार हूं. मेरा जीवन दर्शन और मेरी परम आशाएं कुछ भी हो सकती हैं, लेकिन खिलाफत आंदोलन से मैं किसी मोल-भाव की मंशा से नहीं जुड़ा था. खिलाफत आंदोलन से मैं इसलिए जुड़ा ताकि संकट की घड़ी में मैं अपने पड़ोसी के साथ खड़ा हो सकूं. अगर आज अली बंधु जीवित होते तो वे मेरी बात की सच्चाई के सबूत देते. और बहुत से लोग यह भी बताते की मैंने यह काम गाय का जीवन बचाने के लिए मोलभाव के तौर पर नहीं किया था. गाय और खिलाफत दोनों का महत्व उनके अपने गुणों के आधार पर है. एक ईमानदार आदमी, सच्चे पड़ोसी और वफादार दोस्त के नाते यह लाजिम था कि गाढ़े वक्त में मैं मुसलमानों के साथ खड़ा होऊं.'
इस सबक में कई सीख
इस भाषण में आगे मोहम्मद अली जिन्ना के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया गया और दलित हितों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई. वैसे गाय को लेकर गांधी जी के ये विचार इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें और साफ करने की कोई जरूरत नहीं है, फिर भी इतना कह लूं तो बहुत ज्यादा बेअदबी नहीं होगी कि बापू यही समझा रहे थे कि अगर वह मुसलमानों को अपना दोस्त बना लेंगे, उनका दिल जीत लेंगे और उनके गाढ़े वक्त में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाएंगे तो आखिर को मुसलमान भी गोसेवा में उनके साथ आ जाएंगे. हां, यह भी याद रखिए कि गांधी गाय की रक्षा के लिए जान दांव पर लगाने की बात कह रहे थे, किसी की जान लेने की नहीं. भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ पर बापू का यह सबक याद रखने में कुछ हर्ज है क्या?
पीयूष बबेले